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जब बिना वाजपेयी के सरकार बनाने की उठी थी मांग, और बीजेपी ने दिया था उन्हें राष्ट्रपति बनाने का सुझाव

| Updated: December 18, 2025 14:23

वाजपेयी के मीडिया प्रभारी रहे अशोक टंडन की किताब 'अटल संस्मरण' में दावा- ममता बनर्जी और वाइको ने खारिज किया था पीएम बदलने का प्रस्ताव; सोनिया गांधी के साथ हुआ था 'विश्वासघात', जिस कारण नहीं बन पाई थी विपक्ष की सरकार।

नई दिल्ली: भारतीय राजनीति के इतिहास में अप्रैल 1999 की वह घटना आज भी याद की जाती है, जब अटल बिहारी वाजपेयी की 13 महीने पुरानी सरकार महज एक वोट से गिर गई थी। उस दौरान सियासी गलियारों में क्या कुछ घटा, इसे लेकर वाजपेयी के पीएमओ (PMO) का हिस्सा रहे और मीडिया प्रभारी अशोक टंडन ने अपनी नई किताब ‘अटल संस्मरण’ में कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं।

अशोक टंडन ने लिखा है कि सरकार गिरने के बाद एनडीए (NDA) के भीतर से ही दबी जुबान में यह मांग उठने लगी थी कि गठबंधन को बचाने के लिए वाजपेयी की जगह किसी और को नेता चुनकर सरकार बनाने का दावा पेश किया जाए। लेकिन इस विचार को तुरंत खारिज कर दिया गया।

ममता बनर्जी और वाइको ने कहा- ‘वाजपेयी नहीं तो एनडीए नहीं’

किताब के मुताबिक, एनडीए के कुछ घटकों ने तर्क दिया था कि “अगर संयुक्त मोर्चा (United Front) की सरकार एच.डी. देवेगौड़ा को हटाकर आई.के. गुजराल को प्रधानमंत्री बना सकती है, तो एनडीए भी वैकल्पिक सरकार बनाने के लिए ऐसा क्यों नहीं कर सकता?”

लेकिन तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी और एमडीएमके (MDMK) नेता वाइको ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया। बीजेडी (BJD) प्रमुख नवीन पटनायक ने भी उनका साथ दिया। इन नेताओं ने साफ शब्दों में कह दिया कि “वाजपेयी के बिना कोई एनडीए सरकार नहीं बनेगी।”

टंडन लिखते हैं, “ममता बनर्जी और वाइको वाजपेयी के बचाव में किसी भी हद तक जा सकते थे, चाहे वह एनडीए का कोई मंच हो या कोई जनसभा। ममता उन्हें पिता तुल्य मानती थीं और उनसे बात करते समय अपना दिल खोलकर रख देती थीं।” हालांकि, पीएमओ में यह किसी को स्पष्ट नहीं था कि वाजपेयी को हटाने की इस मुहिम के पीछे असल में कौन था।

सोनिया गांधी को महसूस हुआ ‘धोखा’, विपक्ष नहीं बना सका सरकार

वाजपेयी सरकार गिरने के बाद विपक्ष के पास बहुमत के आंकड़े होने के बावजूद वैकल्पिक सरकार क्यों नहीं बन पाई, इस पर भी टंडन ने विस्तार से लिखा है। उनके अनुसार, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कोशिश की थी, लेकिन उन्हें लेफ्ट पार्टियों से ‘विश्वासघात’ का अहसास हुआ, जिसके बाद उन्होंने किसी भी ‘तीसरे मोर्चे’ (Third Front) की पार्टी का समर्थन करने से इनकार कर दिया।

टंडन बताते हैं कि सीपीएम (CPI-M) नेता हरकिशन सिंह सुरजीत एक तरफ सोनिया गांधी को सरकार बनाने का दावा पेश करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे, तो दूसरी तरफ उन्होंने समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव को यह कहने के लिए उकसाया कि वे सोनिया को पीएम के रूप में समर्थन नहीं देंगे।

वह ‘प्लान-बी’ और 272 का जादुई आंकड़ा

किताब में आई.के. गुजराल की पुस्तक ‘मैटर्स ऑफ डिस्क्रीशन’ (Matters of Discretion) का हवाला देते हुए लिखा गया है कि सुरजीत चाहते थे कि ज्योति बसु प्रधानमंत्री बनें। गुजराल ने 20 अप्रैल, 1999 को सोनिया गांधी को आगाह भी किया था कि वे “भोलेपन” में न रहें और लेफ्ट पर भरोसा न करें, क्योंकि वे आखिरी समय में धोखा दे सकते हैं।

सुरजीत ने सोनिया गांधी को 288 सांसदों की एक सूची दिखाई थी, जो कथित तौर पर कांग्रेस का समर्थन करने को तैयार थे। इसी आधार पर सोनिया गांधी ने 21 अप्रैल, 1999 को राष्ट्रपति के.आर. नारायणन से मुलाकात की और दावा किया कि उनके पास 272 सदस्यों का समर्थन है और अन्य भी साथ आएंगे।

लेकिन अगले ही दिन, मुलायम सिंह यादव, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (RSP) और फॉरवर्ड ब्लॉक ने सोनिया के नाम पर वीटो लगा दिया। इससे साफ हो गया कि उनके 28 सांसद कांग्रेस का समर्थन नहीं करेंगे। टंडन के अनुसार, सुरजीत का ‘प्लान-बी’ यह था कि अगर ज्योति बसु मना करते हैं, तो राष्ट्रपति के.आर. नारायणन को पीएम पद का उम्मीदवार बनाया जाए, क्योंकि दलित होने के नाते और उनके कद को देखते हुए उन्हें मना करना मुश्किल होता।

सोनिया गांधी को लगा कि वाजपेयी सरकार गिराने और तीसरे मोर्चे की सरकार थोपने के लिए उनका “इस्तेमाल” किया गया है। अंततः उन्होंने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि वे ऐसी किसी सरकार को स्वीकार नहीं करेंगी जिसका नेतृत्व कांग्रेस न कर रही हो। इस गतिरोध के कारण देश को दोबारा चुनावों में जाना पड़ा और वाजपेयी पांच साल के पूर्ण कार्यकाल के लिए सत्ता में लौटे।

जब वाजपेयी ने ठुकराया राष्ट्रपति बनने का प्रस्ताव

किताब में एक और महत्वपूर्ण किस्सा साझा किया गया है। जब वाजपेयी अपने पहले पूर्ण कार्यकाल में थे, तब बीजेपी ने सुझाव दिया कि वे राष्ट्रपति का पद संभाल लें और प्रधानमंत्री का पद अपने डिप्टी, लाल कृष्ण आडवाणी को सौंप दें। लेकिन वाजपेयी ने इसे मानने से साफ इनकार कर दिया।

अशोक टंडन लिखते हैं, “वाजपेयी इसके लिए तैयार नहीं थे। उनका मानना था कि किसी भी लोकप्रिय प्रधानमंत्री का बहुमत के आधार पर राष्ट्रपति बनना भारतीय संसदीय लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं होगा। यह एक बहुत गलत परंपरा (Precedent) स्थापित करेगा और वे ऐसे किसी कदम का समर्थन करने वाले आखिरी व्यक्ति होंगे।”

सोनिया और मनमोहन के सामने रखा अब्दुल कलाम का नाम

राष्ट्रपति चुनाव के मुद्दे पर वाजपेयी ने आम सहमति बनाने के लिए कांग्रेस नेताओं को आमंत्रित किया। टंडन याद करते हैं, “सोनिया गांधी, प्रणब मुखर्जी और डॉ. मनमोहन सिंह उनसे मिलने आए। वाजपेयी ने पहली बार आधिकारिक तौर पर खुलासा किया कि एनडीए ने डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को अपना उम्मीदवार बनाने का फैसला किया है।”

वहां एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। फिर सोनिया गांधी ने चुप्पी तोड़ी और कहा कि वे इस पसंद से हैरान हैं। उन्होंने कहा कि उनके पास कलाम का समर्थन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, लेकिन वे इस प्रस्ताव पर चर्चा करके निर्णय लेंगी।

टंडन ने अपनी किताब में वाजपेयी और आडवाणी के रिश्तों पर भी रोशनी डाली है। उन्होंने लिखा है कि कुछ नीतिगत मुद्दों पर मतभेद होने के बावजूद, दोनों नेताओं के रिश्तों में कभी खटास नहीं आई।

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