प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों और निजी कंपनियों से एक बार फिर ‘वर्क फ्रॉम होम’ (WFH) संस्कृति को पुनर्जीवित करने का आग्रह किया है। ईंधन की आसमान छूती कीमतों और विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव के बीच की गई इस अपील ने कॉर्पोरेट जगत में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या नियोक्ता अपने कर्मचारियों को कानूनी तौर पर कार्यालय आने के लिए बाध्य कर सकते हैं।
वडोदरा और तेलंगाना में आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों के दौरान प्रधानमंत्री ने सुझाव दिया कि वर्तमान वैश्विक आर्थिक अस्थिरता से निपटने के लिए हमें कोविड काल की आदतों की ओर लौटना चाहिए।
उन्होंने कंपनियों को ऑनलाइन मीटिंग, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और रिमोट वर्किंग जैसे विकल्पों को बढ़ावा देने की सलाह दी ताकि ईंधन की खपत और अनावश्यक यात्राओं को कम किया जा सके। पश्चिम एशिया के मौजूदा संकट को दशक की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बताते हुए उन्होंने विश्वास जताया कि देश इस स्थिति से भी सफलतापूर्वक बाहर निकल आएगा।
अपनी अपील के दौरान प्रधानमंत्री ने नागरिकों से सार्वजनिक परिवहन और इलेक्ट्रिक वाहनों को प्राथमिकता देने का भी अनुरोध किया। उन्होंने विदेशी मुद्रा बचाने की दृष्टि से लोगों को अनावश्यक विदेश यात्राएं टालने और सोने की खरीदारी में देरी करने का सुझाव भी दिया।
मोदी का मानना है कि आयातित उत्पादों पर निर्भरता कम करके और व्यक्तिगत विदेशी खर्चों को नियंत्रित करके देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी जा सकती है।
हालांकि प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक रूप से रिमोट वर्क का पुरजोर समर्थन किया है, लेकिन कानूनी विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि भारतीय श्रम कानूनों के तहत कर्मचारियों के पास वर्क फ्रॉम होम का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।
कानूनी ढांचे के अनुसार, जब तक रोजगार अनुबंध या कंपनी की आंतरिक नीति में इसका स्पष्ट प्रावधान न हो, तब तक कार्यस्थल पर उपस्थिति का अंतिम निर्णय नियोक्ता के विवेक पर निर्भर करता है।
भारत में वर्तमान में ऐसा कोई समर्पित कानून अस्तित्व में नहीं है जो कर्मचारियों को घर से काम करने का सार्वभौमिक कानूनी हक प्रदान करता हो। दफ्तर में उपस्थिति और कार्यस्थल का निर्धारण मुख्य रूप से व्यक्तिगत रोजगार अनुबंधों, एचआर नीतियों और संबंधित राज्यों के ‘शॉप्स एंड एस्टेब्लिशमेंट एक्ट’ के नियमों के अधीन आता है।
यद्यपि भारत के नए श्रम कोड में पहली बार वर्क फ्रॉम होम और हाइब्रिड कार्य मॉडल को औपचारिक रूप से मान्यता दी गई है, लेकिन ये प्रावधान भी पूरी तरह से नियोक्ता और कर्मचारी के बीच ‘आपसी समझौते’ पर आधारित हैं।
इसका अर्थ यह है कि बिना सहमति के इसे कानूनी अधिकार के रूप में लागू नहीं किया जा सकता है। दिल्ली, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों के स्थानीय श्रम कानून भी कार्य के घंटों और छुट्टियों का नियमन तो करते हैं, लेकिन रिमोट वर्क की अनिवार्य अनुमति नहीं देते।
कोविड महामारी के दौर में सरकारों ने आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 और महामारी रोग अधिनियम, 1897 के तहत प्राप्त आपातकालीन शक्तियों का उपयोग करके रिमोट वर्क को अनिवार्य बनाया था। उ
स समय गृह मंत्रालय ने कार्यालयों को घर से संचालित करने के स्पष्ट निर्देश जारी किए थे, लेकिन वर्तमान में ऐसी कोई बाध्यकारी अधिसूचना प्रभावी नहीं है।
भारतीय अनुबंध कानून और श्रम न्यायशास्त्र के तहत, प्रबंधन को यह अधिकार प्राप्त है कि वह कार्यस्थल और उपस्थिति के नियम निर्धारित कर सके।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक किसी कर्मचारी के पास अनुबंध में रिमोट वर्क की लिखित गारंटी न हो, तब तक कानूनी रूप से नियोक्ता का पक्ष ही भारी रहता है। इसी कानूनी स्थिति के कारण आईटी, बैंकिंग और मीडिया जैसे क्षेत्रों की कई बड़ी कंपनियों ने पिछले दो वर्षों में अपने कर्मचारियों को वापस दफ्तर बुलाना शुरू कर दिया है।
कानून में इसके कुछ बहुत ही सीमित अपवाद उपलब्ध हैं। ‘दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016’ कार्यस्थल पर विशेष व्यवस्था की मांग करता है, जबकि ‘मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961’ प्रसव के बाद घर से काम की अनुमति दे सकता है, बशर्ते काम की प्रकृति इसकी अनुमति देती हो। इन मामलों में भी अंतिम निर्णय अक्सर आपसी सहमति और कार्य की अनुकूलता पर ही टिका होता है।
प्रधानमंत्री की भावनात्मक अपील के बावजूद, कई कंपनियां उत्पादकता, साइबर सुरक्षा और टीम वर्क के तालमेल जैसे कारणों से पूर्णकालिक वर्क फ्रॉम होम को लेकर आशंकित हैं। इसके अलावा, कार्यालयों के बुनियादी ढांचे में किए गए निवेश और प्रत्यक्ष निगरानी की कमी भी कंपनियों को हिचकिचाने पर मजबूर करती है।
भविष्य में यदि ईंधन का संकट गहराता है या परिवहन व्यवस्था में कोई बड़ा व्यवधान आता है, तो सरकार एक बार फिर आपदा प्रबंधन शक्तियों का सहारा ले सकती है।
ऐसी आपातकालीन स्थिति में ही उन क्षेत्रों के लिए अनिवार्य रिमोट वर्क के निर्देश जारी किए जा सकते हैं, जहाँ डिजिटल रूप से काम करना संभव है। फिलहाल, यह पूरी तरह से कॉर्पोरेट जगत की इच्छाशक्ति और सरकारी अपील के प्रति उनकी संवेदनशीलता पर निर्भर है।
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