तमिलनाडु में पिछले कुछ दिनों से भारी राजनीतिक उथल-पुथल देखने को मिल रही है। हाल ही में राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर ने अभिनेता से राजनेता बने विजय को बहुमत साबित करने के लिए कहा था।
विजय की पार्टी ‘तमिझगा वेत्री कड़गम’ (TVK) सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है। शुरुआत में ऐसा लगा कि उनके पास पर्याप्त समर्थन है, लेकिन बाद में समीकरण बिगड़ने लगे। इस वजह से राज्यपाल को शनिवार सुबह होने वाले विजय के शपथ ग्रहण समारोह को टालना पड़ा। हालांकि, शनिवार रात तक टीवीके ने जरूरी आंकड़े जुटा लिए।
दिलचस्प बात यह है कि करीब 75 साल पहले इसी क्षेत्र में बिल्कुल ऐसा ही राजनीतिक संकट पैदा हुआ था। तत्कालीन मद्रास राज्य में 1952 के विधानसभा चुनाव हुए थे, जिसमें आज का तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश शामिल था। उस समय आज़ाद भारत ने अपना पहला त्रिशंकु विधानसभा या खंडित जनादेश देखा था।
इस गतिरोध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को हस्तक्षेप करना पड़ा था। इसी घटनाक्रम के चलते दिग्गज राजनेता सी. राजगोपालाचारी (राजाजी) ने अप्रैल 1952 से अप्रैल 1954 के बीच राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में कमान संभाली। यह उस नए बने गणतंत्र की कहानी है, जिसने फरवरी से अप्रैल के बीच अपने पहले गंभीर संवैधानिक परीक्षण को सफलतापूर्वक पार किया था।
मद्रास राज्य के 1951-52 विधानसभा चुनाव का घटनाक्रम
आज़ादी के बाद मद्रास राज्य में पहली बार 2 जनवरी से 25 जनवरी के बीच 375 विधानसभा सीटों के लिए मतदान हुआ था। जब नतीजे आने शुरू हुए, तो यह स्पष्ट हो गया कि किसी भी राजनीतिक दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है।
चुनाव में कांग्रेस ने 152 सीटों पर जीत दर्ज की। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) 62 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही। इसके बाद जेबी कृपलानी द्वारा स्थापित किसान मजदूर प्रजा पार्टी (KMPP) को 35 सीटें मिलीं, जबकि 63 निर्दलीय उम्मीदवार भी जीतकर आए।
कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी जरूर थी, लेकिन इस प्रदर्शन को उसकी करारी हार के रूप में देखा गया। तत्कालीन कांग्रेस मुख्यमंत्री पीएस कुमारस्वामी राजा और उनके मंत्रिमंडल के पांच सदस्यों को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था।
इतिहासकार राजमोहन गांधी ने अपनी किताब ‘राजाजी: ए लाइफ’ में कांग्रेस के इस खराब प्रदर्शन के कई कारण बताए हैं। इनमें खाद्यान्न संकट, जनता से दूरी, कम्युनिस्टों का बढ़ता प्रभाव और तेलुगू भाषी आंध्र क्षेत्र में एक पूर्व कांग्रेसी नेता को मिल रहा भारी समर्थन शामिल था।
वह नेता टी. प्रकाशम थे, जो 1946 से 1947 तक कांग्रेस के सदस्य के रूप में मद्रास प्रेसीडेंसी के प्रीमियर (मुख्यमंत्री के समकक्ष) रहे थे। कांग्रेस नेतृत्व से मतभेदों के कारण प्रकाशम 1951 में कृपलानी की केएमपीपी में शामिल हो गए थे।
राजमोहन गांधी लिखते हैं कि प्रकाशम अपना चुनाव हार गए थे, लेकिन उन्होंने कम्युनिस्टों और निर्दलीयों सहित 166 विधायकों के समर्थन का दावा पेश कर दिया। दूसरी ओर सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के नेता के. कामराज का दृढ़ दावा था कि सत्ता में केवल कांग्रेस ही आएगी।
इन दावों ने मद्रास राज्य के तत्कालीन राज्यपाल महाराजा कृष्णकुमारसिंहजी को धर्मसंकट में डाल दिया। सेवानिवृत्त होने वाले राज्यपाल ने यह मामला सीधे राष्ट्रपति को सौंप दिया। कांग्रेस नेतृत्व भी इस मुद्दे पर असमंजस में था और वे समझ नहीं पा रहे थे कि नेहरू को क्या सलाह दी जाए।
त्रिशंकु विधानसभा पर जवाहरलाल नेहरू का रुख
प्रधानमंत्री नेहरू राष्ट्रपति शासन लागू करने के बजाय एक चुनी हुई सरकार के पक्ष में थे। उन्होंने 3 फरवरी 1952 को राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को एक पत्र लिखा। इसमें उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति शासन पर केवल तभी विचार किया जाना चाहिए जब किसी भी पार्टी या गठबंधन के लिए स्थिर सरकार बनाने की कोई संभावना न बचे।
नेहरू का मानना था कि मौजूदा परिस्थितियों में राष्ट्रपति शासन को सामान्य या लंबे समय तक नहीं खींचा जा सकता। इसे या तो संविधान के अनुसार चुनी गई सरकार को जगह देनी चाहिए या फिर नए सिरे से चुनाव होने चाहिए।
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कांग्रेस के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है। इसलिए वह चाहते थे कि पार्टी सत्ता की भूखी नज़र न आए। हालांकि, इसके साथ ही उन्होंने राज्य के प्रशासनिक कामकाज को सुचारू रूप से चलाने के महत्व पर भी जोर दिया।
राजाजी के नाम पर बनी आम सहमति
सी. राजगोपालाचारी या ‘सीआर’ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण चेहरों में से एक थे। साल 1948 में वह गवर्नर-जनरल बने और इस प्रकार स्वतंत्र भारत के पहले भारतीय राष्ट्राध्यक्ष कहलाए।
जैसे-जैसे मद्रास में राजनीतिक संकट गहराता गया, कांग्रेस के भीतर 73 वर्षीय राजाजी के नाम पर सहमति बनने लगी। नेताओं का मानना था कि उनका सम्मान और प्रतिष्ठा सरकार के लिए पर्याप्त समर्थन जुटाने में मदद करेगी। मद्रास राज्य के नए राज्यपाल श्री प्रकाश ने भी राजाजी को मुख्यमंत्री बनाने का समर्थन किया।
राजमोहन गांधी के अनुसार, राज्यपाल श्री प्रकाश ने राष्ट्रपति प्रसाद को लिखा था कि लंबी बातचीत के बाद हर कोई एक ही समाधान पर पहुंचा है कि केवल राजाजी ही इस स्थिति को संभाल सकते हैं।
इसके बाद 4 मार्च 1952 को नेहरू ने राजाजी को पत्र लिखकर मद्रास में राष्ट्रपति शासन से बचने के महत्व को रेखांकित किया। उसी दिन कामराज को लिखे एक पत्र में नेहरू ने बताया कि मद्रास के लोगों ने उनसे राजाजी को कांग्रेस विधायक दल का नेतृत्व सौंपने का आग्रह किया है और उन्हें 62 नवनिर्वाचित विधायकों के हस्ताक्षर वाला एक टेलीग्राम भी मिला है।
फिर 29 मार्च को मद्रास के कांग्रेस नेता कुमारस्वामी राजा ने नेहरू को राज्य विधायक दल के प्रस्ताव की जानकारी दी, जिसमें राजाजी को नेतृत्व सौंपने का समर्थन किया गया था। नेहरू ने यह फैसला स्वीकार कर लिया, लेकिन उनके मन में एक संदेह अभी भी बाकी था।
एक गैर-निर्वाचित मुख्यमंत्री की नियुक्ति
नेहरू किसी ऐसे व्यक्ति को सीधे मुख्यमंत्री पद पर बिठाने से हिचकिचा रहे थे, जिसे जनता ने नहीं चुना था। वह चाहते थे कि राजाजी विधानसभा का चुनाव लड़ें। यहीं पर पेंच फंस गया, क्योंकि 31 मार्च को राजाजी ने साफ कर दिया कि वह मुख्यमंत्री बनने के लिए तैयार हैं, लेकिन चुनाव नहीं लड़ेंगे।
राज्यपाल श्री प्रकाश, कुमारस्वामी राजा और राजाजी के बीच हुई चर्चा के बाद एक रास्ता निकाला गया। तय हुआ कि राजाजी को राज्य विधानमंडल के उच्च सदन (विधान परिषद) के लिए नामित किया जाएगा। 1 अप्रैल को राष्ट्रपति प्रसाद को इस योजना की जानकारी दे दी गई।
कुमारस्वामी राजा ने राज्यपाल के सहयोग से राजाजी को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने की प्रक्रिया तेजी से पूरी की। यह सब नेहरू को राजाजी की अटूट शर्त का पता चलने से पहले ही कर लिया गया। जब नेहरू को इस बात की जानकारी मिली, तो वह स्पष्ट रूप से नाखुश थे।
नेहरू ने 3 अप्रैल को राज्यपाल को लिखे पत्र में अपनी नाराजगी जाहिर की। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि उनके पास कोई दूसरा बेहतर विकल्प नहीं था। 7 अप्रैल को राजाजी को लिखे एक अन्य पत्र में नेहरू ने उन्हें अपनी तरफ से पूरी मदद का आश्वासन दिया।
आज के राजनीतिक परिदृश्य से समानताएं
वर्तमान में विजय भी छोटी पार्टियों के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बनाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि विरोधी गठबंधनों को सत्ता से दूर रखा जा सके। यह रणनीति 1952 में राजाजी द्वारा लिए गए फैसले से काफी मिलती-जुलती है।
उस समय कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाले विपक्ष को सत्ता से बाहर रखने के लिए राजाजी ने भी बड़ा कदम उठाया था। उन्होंने अपने मंत्रिमंडल में कॉमनवील पार्टी के नेता माणिकवेलु नायकर, एनजी रंगा के नेतृत्व वाले कृषक लोक पार्टी के सदस्यों और बड़ी संख्या में निर्दलीय विधायकों को शामिल किया था।
उच्च सदन के रास्ते मुख्यमंत्री बनने पर नेहरू की चिंता जायज थी। उनके अनुसार, राष्ट्रपति प्रसाद ने राजाजी के मनोनयन को संविधान की भावना और उसके अक्षरों दोनों के खिलाफ बताया था। 7 अप्रैल को राज्यपाल को लिखे पत्र में नेहरू ने चिंता जताई थी कि यह एक गलत मिसाल कायम कर सकता है।
हालांकि, नेहरू ने यह भी स्वीकार किया कि गंभीर परिस्थितियों में कठोर उपायों की आवश्यकता होती है। मद्रास की स्थिति शायद ऐसी ही थी। दिलचस्प बात यह है कि वर्तमान तमिलनाडु की अन्य दिग्गज राजनीतिक हस्तियों ने भी सीएम की कुर्सी तक पहुंचने के लिए इसी रास्ते को अपनाया।
राज्य के पहले मुख्यमंत्री सीएन अन्नादुरई ने भी पहले विधान परिषद सदस्य के रूप में और फिर सीएम के रूप में शपथ ली थी। इसके अलावा पांच बार सीएम रहे द्रमुक के कद्दावर नेता एम. करुणानिधि ने भी 1980 के दशक में विधानसभा चुनाव लड़ने से पहले कुछ समय के लिए विधान परिषद का रुख किया था।
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