संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण से जुड़े संशोधित कानून, लोकसभा के विस्तार और नए सिरे से परिसीमन को लेकर सरकार को शुक्रवार को एक बड़ा झटका लगा। लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 यानी महिला कोटा बिल गिर गया है। इस विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े। संविधान संशोधन के लिए सदन में जरूरी दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े से यह काफी पीछे रह गया।
इस संशोधित महिला कोटा बिल (2023 का महिला आरक्षण कानून अभी भी लागू है) पर दो दिनों तक लंबी बहस चली। इसके बाद ही इसे मतदान के लिए रखा गया था। चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने सभी सदस्यों से इस प्रस्तावित कानून का समर्थन करने की अपील की थी। उन्होंने विपक्ष को आगाह भी किया था कि देश की महिलाएं उनकी नीयत देख रही हैं और अगर उन्हें आरक्षण से वंचित रखा गया तो वे उन्हें कभी माफ नहीं करेंगी।
परिसीमन और दक्षिण भारत के प्रतिनिधित्व पर विपक्ष की चिंता
दूसरी ओर, विपक्ष ने सरकार पर तीखा पलटवार किया। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि सरकार महिला आरक्षण के मुद्दे की आड़ में परिसीमन थोपना चाहती है। उनका दावा था कि भाजपा चुनावी मानचित्र को अपने पक्ष में करने और लोकसभा में दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व को कम करने की राजनीतिक साजिश रच रही है।
महिला कोटा बिल के गिरने के तुरंत बाद, केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा अध्यक्ष से बाकी दो विधेयकों पर विचार न करने का आग्रह किया। ये दोनों बिल लोकसभा के आकार को बढ़ाने और परिसीमन से जुड़े थे, जो सीधे तौर पर संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 से ही जुड़े हुए थे।
पिछले 12 सालों में यह पहली बार है जब मोदी सरकार द्वारा पेश किया गया कोई संविधान संशोधन विधेयक सदन में पास होने में विफल रहा है। इस बिल को पारित कराने के लिए दोनों सदनों में विशेष बहुमत की दरकार थी, जिसका मतलब है कि उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई हिस्सा पक्ष में हो, जो सदन की कुल संख्या के आधे से कम नहीं होना चाहिए।
लोकसभा में फिलहाल 540 सदस्य हैं, इसलिए बिल को पास कराने के लिए 360 वोटों की जरूरत थी, लेकिन इसके समर्थन में सिर्फ 298 वोट ही पड़े।
पीएम मोदी और अमित शाह की अपील रही बेअसर
इससे पहले तीनों विधेयकों पर हुई बहस का जवाब देते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष पर महिला आरक्षण को रोकने की नीयत से बहानेबाजी करने का आरोप लगाया था। वहीं, मतदान से कुछ घंटे पहले प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (X) पर एक पोस्ट लिखकर अपनी बात रखी थी।
प्रधानमंत्री ने लिखा था कि सरकार ने तथ्यों और तर्कों के साथ इस कानून से जुड़ी सभी आशंकाओं और गलतफहमियों को दूर कर दिया है। सूचनाओं के अभाव को भी भर दिया गया है। उन्होंने कहा कि करीब चार दशकों से विधायी निकायों में महिला आरक्षण का मुद्दा बिना वजह लटका हुआ था और अब समय आ गया है कि देश की आधी आबादी को निर्णय लेने में उसका उचित हक मिले।
उसी पोस्ट में पीएम मोदी ने सभी राजनीतिक दलों से अपील की थी कि वे संवेदनशीलता के साथ विचार करें और महिला आरक्षण के पक्ष में वोट दें। उन्होंने ‘नारी शक्ति’ की ओर से सदस्यों से ऐसा कुछ भी न करने का अनुरोध किया था जिससे महिलाओं की भावनाओं को ठेस पहुंचे। उन्होंने चेताया था कि करोड़ों महिलाएं हमारे इरादों और फैसलों को देख रही हैं।
पर्दे के पीछे की राजनीतिक रणनीतियां
वोटिंग से पहले सरकार ने बिल पास कराने के लिए रणनीति बनाने की कोशिश की, लेकिन विपक्ष की एकजुटता को देखते हुए उसने वोटिंग के साथ ही आगे बढ़ने का फैसला किया। सूत्रों के मुताबिक, दिन के समय समाजवादी पार्टी और कुछ अन्य विपक्षी दलों से संपर्क साधने की आखिरी कोशिश भी की गई, ताकि विधेयकों को बचाया जा सके, लेकिन ये प्रयास विफल रहे।
संसद में अमित शाह ने आगे की रणनीति पर विचार करने के लिए प्रमुख भाजपा नेताओं और मंत्रियों के साथ एक अहम बैठक भी की। एक वरिष्ठ भाजपा नेता के अनुसार, जब उनके पास पर्याप्त संख्या बल नहीं था, तो उन्होंने तय किया कि विपक्ष को बिल गिराने दिया जाए, जिसके लिए उन्हें जनता को जवाब देना होगा। एक अन्य मंत्री ने शाम 6 बजे तक इस मुद्दे को लेकर सीधे जनता के बीच जाने की योजना का भी संकेत दिया।
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के एक नेता ने संभावित रणनीति की ओर इशारा करते हुए कहा कि मूल विचार यही था कि बिलों को गिरने दिया जाए और फिर महिला अधिकारों के मुद्दे पर विपक्ष को घेरा जाए।
नेता ने कहा कि विपक्ष एकजुट है और वे बिल पास नहीं होने देना चाहते। ऐसे में सरकार के पास शहीद होने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। बिल वापस लेने से काफी गलत संदेश जाता, इसलिए अब बिलों की इस हार को विपक्ष के खिलाफ राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
वहीं, एक वरिष्ठ विपक्षी नेता ने इस बात की पुष्टि की कि कुछ दलों को लुभाने की कोशिशें की गई थीं, लेकिन विपक्ष पूरी तरह एकजुट रहा। विपक्षी नेता ने स्पष्ट किया कि यह तय हो चुका है कि परिसीमन को टालना जरूरी है, इसलिए इन विधेयकों पर सहमत होने का कोई सवाल ही नहीं उठता।
उन्होंने साफ कहा कि भले ही परिसीमन बिल में राज्यों के बीच बढ़ी हुई सीटों के आनुपातिक वितरण का वादा किया गया हो, लेकिन विपक्ष भली-भांति जानता है कि सरकार असल में परिसीमन क्यों चाहती है।
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