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अर्थव्यवस्था को बड़ा बूस्टर डोज़: मोदी सरकार ने सरकारी बॉन्ड पर खत्म किया कैपिटल गेन्स टैक्स

| Updated: June 5, 2026 14:00

विदेशी निवेशकों (FIIs) को लुभाने और रुपये को मजबूती देने के लिए मोदी सरकार का बड़ा कदम; वहीं RBI ने बिना बदलाव के 5.25% पर बरकरार रखा रेपो रेट।

विदेशी पूंजी के प्रवाह को रफ्तार देने के लिए भारत सरकार ने एक बेहद अहम कदम उठाया है। शुक्रवार को जारी एक अध्यादेश के जरिए सरकार ने सरकारी प्रतिभूतियों (गवर्नमेंट सिक्योरिटीज) में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) के निवेश पर लगने वाले लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स को पूरी तरह से खत्म कर दिया है।

इस बड़े फैसले का मुख्य उद्देश्य भारतीय डेट मार्केट को विदेशी निवेशकों के लिए और अधिक आकर्षक बनाना है। इसके साथ ही, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच रुपये को मजबूती देना भी सरकार का लक्ष्य है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आयकर अधिनियम में संशोधन करने वाले इस अध्यादेश को अपनी आधिकारिक मंजूरी दी। मौजूदा समय के नियमों के अनुसार विदेशी निवेशकों को एक साल से अधिक समय तक रखे गए लिस्टेड शेयरों और बॉन्ड पर 12.5 प्रतिशत का लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स देना पड़ता है।

इसके अलावा, सरकारी प्रतिभूतियों से मिलने वाले ब्याज पर भी 20 प्रतिशत का विदहोल्डिंग टैक्स लागू होता है।

एक आधिकारिक राजपत्र के अनुसार, सरकार ने अब FIIs को सरकारी प्रतिभूतियों से होने वाली किसी भी ब्याज आय के साथ-साथ उनकी बिक्री, विनिमय या हस्तांतरण से होने वाले कैपिटल गेन्स पर टैक्स से पूरी तरह छूट दे दी है। निवेशकों को बड़ी राहत देने वाली यह टैक्स छूट 1 अप्रैल, 2026 से पूर्वव्यापी (रेट्रोस्पेक्टिव) प्रभाव से लागू मानी जाएगी।

सरकार के इस कड़े लेकिन जरूरी फैसले के पीछे मुख्य वजह विदेशी पूंजी को भारत की तरफ आकर्षित करना और रुपये को स्थिर करना है। हाल के दिनों में तेल की ऊंची कीमतों और शेयर बाजार से FII की लगातार हो रही निकासी के कारण भारतीय मुद्रा पर काफी दबाव देखने को मिला है।

दूसरी तरफ, मौद्रिक नीति समिति (MPC) के फैसलों का ऐलान करते हुए भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) का निवेश बढ़ाने के लिए कई शानदार उपायों की घोषणा की। इनमें 15, 30 और 40 साल के नए सरकारी बॉन्ड को पूरी तरह से सुलभ मार्ग (Fully Accessible Route या FAR) के दायरे में लाना प्रमुख रूप से शामिल है।

आरबीआई गवर्नर ने यह भी बताया कि सेबी (Sebi) पंजीकरण के बिना इक्विटी उपकरणों में अनिवासी भारतीयों (NRIs) और भारत के विदेशी नागरिकों (OCIs) के निवेश की सीमा बढ़ाई जा रही है। इस कदम से वे बिना किसी नियामक पंजीकरण के कहीं अधिक बड़ी राशि का निवेश कर सकेंगे।

इस सुविधा को भारत के बाहर रहने वाले सभी व्यक्तियों (PROIs) तक विस्तारित करने का भी प्रस्ताव रखा गया है, जिससे वे भी विदेशी निवेश के मामले में NRI और OCI के समकक्ष आ जाएंगे।

मौद्रिक नीति के मोर्चे पर बात करें तो, उभरती व्यापक आर्थिक और वित्तीय स्थितियों का गहराई से आकलन करने के बाद आरबीआई ने लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी के तहत रेपो रेट को बिना किसी बदलाव के 5.25% पर बरकरार रखा है। ब्याज दरों पर यह फैसला एमपीसी द्वारा सर्वसम्मति से लिया गया।

इसके साथ ही स्थायी जमा सुविधा (SDF) दर 5.00% पर बनी हुई है, जबकि सीमांत स्थायी सुविधा (MSF) दर और बैंक दर 5.50% पर स्थिर हैं। केंद्रीय बैंक ने अपना मौद्रिक रुख भी ‘न्यूट्रल’ बनाए रखा है।

गौरतलब है कि साल 2026 में शेयर बाजार में FIIs द्वारा भारी बिकवाली देखी गई है। इस दौरान एआई (AI) रैली से प्रेरित होकर दक्षिण कोरिया और ताइवान के बाजारों में तकनीकी क्षेत्र ने शानदार बढ़त दर्ज की, जिसने निवेशकों को अपनी ओर खींचा। वहीं मध्य पूर्व में चल रहे भू-राजनीतिक तनावों ने तेल की कीमतों को ऊपर धकेल दिया।

इन सभी बाहरी कारकों से रुपये में भारी गिरावट आई और भारतीय शेयरों के प्रति निवेशकों की धारणा काफी कमजोर हुई। इसी का नतीजा है कि निफ्टी 50 इंडेक्स इस साल अब तक लगभग 10% गिर चुका है, जिसके चलते भारत दुनिया के शीर्ष पांच शेयर बाजारों की सूची से भी बाहर हो गया है।

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