भारत के स्मारकों को नई पहचान देने वाले और दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ के रचयिता, प्रख्यात मूर्तिकार राम वनजी सुतार अब हमारे बीच नहीं रहे। गुरुवार की सुबह नोएडा स्थित उनके आवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली। वे 100 वर्ष के थे और पिछले कुछ समय से उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रहे थे। उनके निधन से कला जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
गुजरात से असम तक छोड़ी अपनी अमिट छाप
राम वनजी सुतार का काम केवल पत्थरों को तराशने तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने भारत के परिदृश्य को विशालकाय स्मारकों से सजाया। गुजरात में नर्मदा के तट पर खड़ी 522 फीट ऊंची ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ हो या फिर नई दिल्ली में पुरानी संसद के बाहर ध्यानमग्न महात्मा गांधी की शांत प्रतिमा, हर जगह उनकी कला का जादू बोलता है।
इसके अलावा, बेंगलुरु के कैंपेगौड़ा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर 108 फीट ऊंची ‘स्टैच्यू ऑफ प्रोस्पेरिटी’, 45 फीट ऊंचा चंबल स्मारक और महाराष्ट्र के राजकोट किले में छत्रपति शिवाजी महाराज की 91 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा उनके बेहतरीन कार्यों की गवाही देती है। शिवाजी महाराज की यह प्रतिमा उन्होंने अपने बेटे अनिल राम सुतार के साथ मिलकर तैयार की थी, जिनके साथ वे 1994 से लगातार काम कर रहे थे।
पीएम मोदी ने जताया दुख: ‘इतिहास और संस्कृति को जीवंत रखा’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर राम सुतार को श्रद्धांजलि अर्पित की। पीएम ने उन्हें एक असाधारण मूर्तिकार बताया, जिनकी महारत ने भारत को कई प्रतिष्ठित लैंडमार्क दिए हैं। अपने संदेश में प्रधानमंत्री ने कहा कि सुतार के कार्य हमेशा भारत के इतिहास, संस्कृति और सामूहिक चेतना को जीवंत रूप में प्रदर्शित करते रहेंगे।
बचपन में देखा था दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति बनाने का सपना
राम सुतार का जन्म 19 फरवरी 1925 को महाराष्ट्र के धुले जिले में हुआ था। बचपन में जब उन्होंने ‘स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी’ की तस्वीरें देखी थीं, तभी उन्होंने दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति बनाने का सपना संजो लिया था। अपनी प्रतिभा के दम पर वे मुंबई के सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट पहुंचे, जहां से उन्होंने गोल्ड मेडल के साथ अपनी पढ़ाई पूरी की।
वर्ष 1954 में उन्हें पुरातत्व विभाग में मॉडलर के रूप में नियुक्त किया गया, जहां उन्होंने अजंता-एलोरा गुफाओं की कई मूर्तियों के जीर्णोद्धार (restoration) में मदद की। हालांकि, अपने आधिकारिक वेबसाइट पर उल्लेखित उनके सिद्धांत के अनुसार, वे “विशालकाय मूर्तियां” बनाने में विश्वास रखते थे। इसी जुनून को पूरा करने के लिए उन्होंने 1959 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की नौकरी छोड़ दी और पूर्णकालिक रूप से मूर्तिकला में जुट गए।
एक युग का अंत: साथी कलाकारों ने किया याद
राम सुतार का व्यक्तित्व नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए भी प्रेरणादायी था। ललित कला अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. नंद लाल ठाकुर ने उनके स्टूडियो के दौरे को याद करते हुए बताया, “वे अपनी कलाकृतियां किसी छोटे बच्चे की तरह उत्साह के साथ दिखाते थे। वे अपने बचपन से लेकर कला के क्षेत्र में प्रवेश तक की पूरी यात्रा सुनाते थे।”
इसी वर्ष उनकी शताब्दी पर ललित कला अकादमी में एक बड़ी प्रदर्शनी आयोजित की गई थी, जिसमें वे रोज आते थे और छात्रों व कलाकारों से बड़े आत्मीय भाव से मिलते थे।
मानेसर स्थित मूर्तिकार नरेश कुमार कुमावत, जिन्होंने नाथद्वारा (राजस्थान) में भगवान शिव की 369 फीट ऊंची प्रतिमा बनाई है, ने सुतार के निधन को कला और मूर्तिकला की दुनिया के लिए अपूरणीय क्षति बताया। उन्होंने कहा, “उनके जाने से भारतीय स्मारक कला के एक गरिमामय युग का अंत हो गया है।”
कुमावत ने 1996-97 का एक भावुक किस्सा साझा किया। उन्होंने बताया, “टी-सीरीज स्टूडियो में वे मेरे पिता श्री मातु राम जी से मिलने आए थे। जब मेरे पिता ने सम्मान में उनके पैर छुए, तो सुतार जी ने तुरंत पलटकर मेरे पिता के पैर छू लिए और कहा, ‘सबसे अच्छा तब होता है जब एक कलाकार दूसरे कलाकार का सम्मान करता है।’ यह एक इशारा उनके चरित्र की गहराई को दर्शाता है।”
26 वर्षीय युवा कलाकार मोहित जांगड़ा ने पिछले साल की मुलाकात को याद करते हुए बताया कि 100 वर्ष की उम्र में भी सुतार जी उनकी प्रदर्शनी में आए थे। उन्होंने कहा, “स्वास्थ्य ठीक न होने के बावजूद वे आए, शांति से पेंटिंग्स देखीं और मुझसे करीब आधे घंटे तक बातें कीं। वे हमेशा हम जैसे युवाओं के साथ अपना ज्ञान साझा करने के लिए उत्सुक रहते थे।”
पुरस्कार और सम्मान
कला के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए राम वनजी सुतार को देश के कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। उन्हें 1999 में पद्म श्री और 2016 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। अक्टूबर 2018 में उन्हें टैगोर सांस्कृतिक सद्भावना पुरस्कार मिला। इसके अलावा, नवंबर 2025 में उन्हें उनकी आजीवन कलात्मक उपलब्धियों के लिए महाराष्ट्र के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘महाराष्ट्र भूषण’ से सम्मानित किया गया था।
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