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सुप्रीम कोर्ट के रडार पर NCERT: 8वीं कक्षा की किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ के चैप्टर पर भड़का कोर्ट

| Updated: February 26, 2026 14:56

गहरी साजिश या अनजाने में हुई गलती? 8वीं कक्षा की किताब में 'जजों के भ्रष्टाचार' का जिक्र होने पर भड़का सुप्रीम कोर्ट, NCERT पर लिया बड़ा एक्शन।

हाल ही में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) द्वारा जारी की गई कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की एक नई किताब बड़े विवाद का कारण बन गई है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत पेश की गई इस किताब में “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” पर एक छोटा सा हिस्सा शामिल किया गया था, जिसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है।

कोर्ट ने इसे एक ‘गहरी साजिश’ करार देते हुए न केवल किताब की सामग्री को साझा करने पर रोक लगा दी है, बल्कि इसके प्रकाशन और वितरण पर भी पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया है।

आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर यह पूरा विवाद क्या है और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर क्या कदम उठाए हैं।

क्या है पूरा विवाद?

24 फरवरी को जारी हुई 8वीं कक्षा की इस नई किताब में ‘हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका’ (The Role of the Judiciary in Our Society) नाम का एक चैप्टर है। इस अध्याय में जजों की अपर्याप्त संख्या, मुकदमों के भारी बैकलॉग और मुख्य रूप से ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ का जिक्र किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी का मुख्य कारण यह था कि 13-14 साल के छोटे बच्चों (युवा मस्तिष्कों) के सामने न्यायपालिका की एक ऐसी छवि पेश की जा रही है, जो उसे आंतरिक रूप से भ्रष्ट और कमजोर दिखाती है।

वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल द्वारा इस मामले को सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में लाया गया। इसके बाद मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने तुरंत मामले का स्वत: संज्ञान (suo motu) लिया और स्पष्ट किया कि अदालत किसी को भी “संस्थान को बदनाम करने” की अनुमति नहीं देगी।

सुप्रीम कोर्ट के 5 बड़े और सख्त आदेश

इस मामले को महज एक पाठ्यक्रम का विवाद न मानते हुए, सीजेआई सूर्यकांत ने इसे व्यक्तिगत जवाबदेही और अनुपालन का मुद्दा बना दिया है। कोर्ट ने NCERT और राज्य के शिक्षा विभागों को सख्त निर्देश दिए हैं:

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि किताब की हार्ड कॉपी या डिजिटल कॉपी को रिटेल स्टोर, स्कूलों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म सहित हर जगह से तुरंत हटा लिया जाए। इस काम में कोई भी देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

कुल 2.25 लाख किताबें छापी गई थीं, जिनमें से केवल 38 प्रतियां ही बिकी थीं। कोर्ट ने NCERT के निदेशक डॉ. दिनेश प्रसाद सकलानी को निर्देश दिया है कि स्कूलों या बाजार में भेजी गई सभी प्रतियों को तुरंत जब्त किया जाए (NCERT ने 38 बिकी हुई किताबों को वापस मंगाना शुरू कर दिया है)। सभी राज्यों के प्रमुख शिक्षा सचिवों को दो सप्ताह के भीतर अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) सौंपनी होगी।

अदालत ने स्पष्ट किया है कि विवादित किताब के भौतिक या डिजिटल, किसी भी संस्करण से कक्षाओं में कोई निर्देश या पढ़ाई नहीं करवाई जानी चाहिए।

अतिरिक्त सावधानी बरतते हुए, कोर्ट ने किताब के उत्पादन और वितरण पर ‘ब्लैंकेट बैन’ लगा दिया है। इस आदेश के उल्लंघन को अदालत की अवमानना (wilful breach) माना जाएगा, जिसके गंभीर कानूनी परिणाम हो सकते हैं।

कोर्ट ने उस नेशनल सिलेबी बोर्ड (National Syllabi Board) के सदस्यों के नाम और जानकारी मांगी है, जिन्होंने यह चैप्टर तैयार किया था। साथ ही, उन बैठकों के मूल मिनट्स (minutes) भी मांगे गए हैं जहां इस अध्याय को अंतिम रूप दिया गया था।

इसके अलावा, स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव और NCERT निदेशक को ‘कारण बताओ’ नोटिस जारी कर पूछा गया है कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न की जाए।

अदालत की सख्त टिप्पणियां और वकीलों की दलीलें

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा, “हमें एक गहरी जांच की आवश्यकता है। हमें यह पता लगाना होगा कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है… दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी (Heads must roll)! हम यह मामला बंद नहीं करेंगे।”

हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके इन निर्देशों का उद्देश्य न्यायपालिका की “वैध आलोचना” (legitimate criticism) को दबाना नहीं है।

NCERT ने अपनी गलती मानते हुए माफी मांगी और कहा कि यह “अनजाने” में हुई गलती थी और इस हिस्से को फिर से लिखा जाएगा। लेकिन कोर्ट ने इस स्पष्टीकरण पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किताब में इस्तेमाल किए गए शब्द कोई “अनजाने में हुई गलती” (bonafide error) नहीं लगते। अदालत ने इसे संस्थागत अधिकार को कमजोर करने और न्यायपालिका की गरिमा को कम करने की एक सोची-समझी चाल बताया।

सुनवाई के दौरान सामने आए अन्य अहम तथ्य:

केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से माफी मांगी। उन्होंने भरोसा दिलाया कि जिन दो अधिकारियों ने यह चैप्टर तैयार किया है, वे अब भविष्य में UGC या किसी भी मंत्रालय के साथ काम नहीं करेंगे।

इस दौरान केंद्र ने यह भी खुलासा किया कि 2016 से 2025 के बीच CJI कार्यालय को सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों के खिलाफ लगभग 7,500 शिकायतें मिली हैं।

वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने इस पर इशारा करते हुए कहा कि यह चुनिंदा निशाना (selectivity) है, क्योंकि भ्रष्टाचार अन्य क्षेत्रों में भी मौजूद है। वहीं, कपिल सिब्बल ने सवाल उठाया, “नेताओं और राजनेताओं के बारे में क्या?”

इस बेहद अहम मामले की अगली सुनवाई अब चार सप्ताह बाद होगी।

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