अहमदाबाद: विदेश में पढ़ाई करने के इच्छुक गुजरात के छात्रों के बीच अब अमेरिका और कनाडा के बजाय यूरोपीय देश पहली पसंद बनते जा रहे हैं। छात्रों के इस बदलते रुझान का सीधा असर एजुकेशन लोन (शिक्षा ऋण) पर पड़ा है, जिसके वितरण में पिछले दो वर्षों के दौरान भारी गिरावट दर्ज की गई है।
188वीं राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति (SLBC) गुजरात की रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि जहां दिसंबर 2023 की तिमाही में 595 करोड़ रुपये का एजुकेशन लोन बांटा गया था, वहीं दिसंबर 2024 में यह आंकड़ा घटकर 459 करोड़ रुपये और 2025 में और भी नीचे गिरकर मात्र 377 करोड़ रुपये रह गया।
क्यों बदल रही है छात्रों की पसंद?
बैंकिंग विशेषज्ञों और फॉरेन एजुकेशन कंसल्टेंट्स का मानना है कि लोन वितरण में आई इस कमी के पीछे मुख्य वजह छात्रों की बदलती प्राथमिकताएं हैं। एक समय था जब विदेश जाने वाले करीब 60% गुजराती छात्र अमेरिका और कनाडा का ही रुख करते थे। लेकिन अब सख्त वीजा नियमों, पढ़ाई के बाद रोजगार (पोस्ट-स्टडी वर्क) की अनिश्चितता और बढ़ती महंगाई के कारण छात्रों ने या तो अपनी योजनाएं टाल दी हैं या फिर वे यूरोप जैसे उन गंतव्यों की ओर मुड़ रहे हैं, जहां पढ़ाई का खर्च तुलनात्मक रूप से कम है।
अहमदाबाद के एक विदेशी शिक्षा सलाहकार भाविन ठाकर बताते हैं, “यूरोपीय देशों, विशेषकर ब्रिटेन और जर्मनी में पढ़ाई का खर्च काफी कम है। अमेरिका और कनाडा के विश्वविद्यालयों में जहां सालाना औसत खर्च लगभग 23 लाख रुपये आता है, वहीं यूरोपीय विश्वविद्यालयों में यह खर्च 3 लाख रुपये से 15 लाख रुपये के बीच होता है। विदेश जाने वाले छात्रों की कुल संख्या में 50-60% की गिरावट आई है, और इसके साथ ही अमेरिका और कनाडा जाने वालों का प्रतिशत भी काफी कम हुआ है।”
नए लोन खातों में भी कमी
एसएलबीसी (SLBC) की रिपोर्ट यह भी दर्शाती है कि नए लोन खातों की संख्या में तेज गिरावट आई है।
- दिसंबर 2023: 6,505 नए खाते
- दिसंबर 2024: 3,481 नए खाते
- दिसंबर 2025: 4,081 नए खाते (मामूली सुधार, लेकिन 2023 के उच्चतम स्तर से अब भी काफी नीचे)
इस रुझान पर भाविन ठाकर आगे कहते हैं, “सालों से, स्टेम (STEM), मैनेजमेंट और एप्लाइड साइंसेज जैसे कोर्सेज के लिए गुजरात के ज्यादातर छात्रों की पहली पसंद अमेरिका और कनाडा ही थे। लेकिन अब वीजा जांच की सख्ती, पढ़ाई के बाद काम के अवसरों पर लगी पाबंदियों और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं ने इन देशों में पढ़ाई को महंगा और जोखिम भरा बना दिया है। यही कारण है कि अब कई छात्र या तो विदेश जाने की अपनी योजना टाल रहे हैं या फिर यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और यहां तक कि दक्षिण पूर्व एशियाई देशों जैसे नए विकल्पों को चुन रहे हैं।”
बजट और बेहतर भविष्य बन रहा है बड़ा फैक्टर
छात्र भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि अब फैसला लेने में ‘खर्च का गणित’ एक बहुत बड़ा फैक्टर बन गया है। अहमदाबाद की रहने वाली छात्रा खुशी पटेल, जिन्होंने जर्मनी में ‘इंटरनेशनल बिजनेस’ में बैचलर डिग्री के लिए एडमिशन लिया है, अपना अनुभव साझा करती हैं।
उन्होंने बताया, “मेरी बहन इस समय अमेरिका में पढ़ रही है और उसकी सालाना फीस व रहने का खर्च करीब 50 लाख रुपये बैठता है। कनाडा में भी हाल ही में बनी अप्रवासन विरोधी (एंटी-इमिग्रेशन) नीतियों और अनिश्चितता को देखते हुए, मुझे वे देश अब ज्यादा आकर्षक नहीं लगे।”
खुशी आगे कहती हैं, “जब मैंने दूसरे विकल्पों की तलाश शुरू की, तो मुझे आर्थिक और बेहतरीन करियर के लिहाज से जर्मनी सबसे सही लगा। वहां मेरा सालाना खर्च लगभग 3.5 लाख रुपये होगा। अमेरिका या कनाडा के लिए बहुत बड़ा कर्ज लेने से बेहतर है कि यूरोप को चुना जाए और इन नए क्षेत्रों में अपने भविष्य को आजमाया जाए।”
लंबे समय की स्थिरता पर जोर
यही सोच जर्मनी से ‘इन्फॉर्मेटिक’ (Informatik) में एमएस (MS) कर रहे 23 वर्षीय राहुल पैडा की भी है। वह कहते हैं कि सस्ती और लंबी अवधि तक स्थिरता देने वाली शिक्षा उनके लिए प्राथमिकता थी।
राहुल बताते हैं, “मुफ्त या कम खर्च वाली शिक्षा एक बड़ा कारण जरूर था, लेकिन यह सिर्फ फीस तक सीमित नहीं है। यूरोपीय संघ (EU) लंबी अवधि में बेहतर श्रम सुरक्षा (लेबर प्रोटेक्शन) और एक स्थिर जीवन का माहौल देता है। जर्मनी दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जो मेरे भविष्य की संभावनाओं को लेकर मुझे आत्मविश्वास देता है।”
उन्होंने अपनी बात खत्म करते हुए कहा, “शुरुआत में कनाडा मेरी पहली पसंद था, लेकिन अपनी खुद की रिसर्च करने के बाद मैंने अपना फैसला बदल लिया। जर्मनी के मामले में भी ‘ब्लॉक्ड अकाउंट’ को मैनेज करने और सही नौकरी पाने जैसे जोखिम हैं, लेकिन सभी पहलुओं को तौलने के बाद मैंने खुद अपनी मर्जी से यह रास्ता चुना है।”
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