27 फरवरी का दिन पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उनके पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और आम आदमी पार्टी (आप) के लिए एक ऐतिहासिक और बहुत बड़ा दिन साबित हुआ। राजनीतिक विश्लेषकों के नजरिए से देखा जाए तो यह दिन 8 दिसंबर 2013 से भी ज्यादा अहम साबित हो सकता है।
आपको याद दिला दें कि 2013 में अपनी स्थापना के महज 13 महीने बाद ही ‘आप’ ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में शानदार शुरुआत करते हुए 70 में से 28 सीटें हासिल की थीं, जबकि भाजपा को 31 सीटें मिली थीं। उस वक्त भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए तत्कालीन सत्ताधारी कांग्रेस को मजबूरी में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली पहली सरकार को समर्थन देना पड़ा था।
चुनावी जीतों का सिलसिला और फिर लगा गहरा झटका
इसके बाद 2015 और 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी ने एकतरफा क्लीन स्वीप किया। इन दोनों चुनावों में पार्टी ने क्रमशः 67 और 62 सीटों पर शानदार जीत दर्ज की। वहीं, मुख्य प्रतिद्वंद्वी भाजपा केवल 3 और 8 सीटों पर ही सिमट कर रह गई, जबकि कांग्रेस दोनों ही बार अपना खाता तक नहीं खोल सकी।
पार्टी की इस आंधी का असर 2022 के पंजाब विधानसभा चुनावों में भी देखने को मिला, जहां ‘आप’ ने प्रचंड बहुमत के साथ 117 में से 92 सीटें जीतीं और तत्कालीन सत्ताधारी कांग्रेस को महज 18 सीटों पर समेट दिया।
हालांकि, 2021-2022 के कथित दिल्ली आबकारी नीति घोटाले ने आम आदमी पार्टी को एक बहुत बड़ा और गहरा झटका दिया। इस मामले के कारण अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया सहित पार्टी के कई शीर्ष नेताओं को महीनों तक जेल की सलाखों के पीछे रहना पड़ा।
देश के राजनीतिक इतिहास में यह पहली बार था जब किसी पद पर आसीन मौजूदा मुख्यमंत्री को जेल भेजा गया हो। इस पूरे घटनाक्रम ने पार्टी के नेताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं के मनोबल को पूरी तरह से तोड़ दिया, जिसका सीधा परिणाम 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में पार्टी की हार के रूप में सामने आया और भाजपा ने सत्ता पर कब्जा जमा लिया।
इस झटके ने ‘आप’ नेताओं को खामोश कर दिया था। हमेशा मुखर रहने वाले पार्टी के नेता राष्ट्रीय राजधानी में भाजपा सरकार से सीधे टकराव लेने के बजाय शांत बैठना ही उचित समझने लगे। उस वक्त ऐसा लगने लगा था मानो आम आदमी पार्टी अब धीरे-धीरे राजनीतिक पटल से गायब हो जाएगी और शायद भाजपा ने भी कुछ ऐसा ही गणित लगाया होगा।
अदालत का फैसला और ‘कट्टर ईमानदारी’ की वापसी
लेकिन पिछले शुक्रवार को दिल्ली की एक विशेष अदालत ने शराब नीति मामले में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और 21 अन्य लोगों को बरी करके पूरा खेल पलट दिया। इस फैसले ने अचानक से आम आदमी पार्टी के कैडर में एक नई ऊर्जा और जोश भर दिया है।
इस फैसले के बाद से ही केजरीवाल पूरी तरह से एक्शन में आ गए हैं। भगवान हनुमान के परम भक्त माने जाने वाले केजरीवाल ने सबसे पहले हनुमान मंदिर जाकर दर्शन किए। इसके बाद उन्होंने सिसोदिया के साथ एक अहम प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया।
इस दौरान उन्होंने पार्टी की ‘काम की राजनीति’ को जनता के सामने प्रमुखता से रखा और आरोप लगाया कि भाजपा ने सीबीआई (CBI) और ईडी (ED) का दुरुपयोग करके उन्हें शराब नीति मामले में फंसाकर उनके कामकाज को रोकने की साजिश रची थी।
रविवार को आम आदमी पार्टी ने जंतर-मंतर पर एक विशाल रैली का आयोजन किया, जिसमें पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान सहित पार्टी के तमाम दिग्गज नेता शामिल हुए। जंतर-मंतर के साथ पार्टी का एक पुराना और ऐतिहासिक नाता रहा है, क्योंकि 2011 में ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ आंदोलन की यही ‘कर्मभूमि’ थी और इसी आंदोलन से पार्टी का जन्म हुआ था।
राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा और ‘असली देशभक्ति’ का नारा
इस रैली को संबोधित करते हुए ‘आप’ नेताओं ने अपने इरादे बिल्कुल साफ कर दिए कि पार्टी अब “राष्ट्रीय” स्तर पर जाने और भाजपा विरोधी स्पेस पर कब्जा जमाने की तैयारी में है। जनता से एक भावुक अपील करते हुए नेताओं ने कहा कि स्कूल, अस्पताल बनाना और युवाओं को रोजगार देना निश्चित रूप से “असली देशभक्ति” है, लेकिन उनका यह भी मानना है कि “नरेंद्र मोदी के अत्याचार से देश को मुक्त कराना” भी देशभक्ति का ही एक बड़ा काम होगा।
अदालत से बरी होने के बाद आम आदमी पार्टी के नेता राजनीतिक रूप से इसका कैसे फायदा उठाते हैं, यह तो आने वाला वक्त बताएगा। लेकिन दिल्ली ‘आप’ के प्रमुख सौरभ भारद्वाज ने स्पष्ट शब्दों में यह दावा किया है कि अरविंद केजरीवाल अब “राष्ट्रीय राजनीति में कहीं अधिक सक्रिय भूमिका” निभाएंगे।
विशेष सीबीआई न्यायाधीश जितेंद्र सिंह का यह स्पष्ट आदेश कि दिल्ली आबकारी नीति “घोटाले” के पीछे कोई साजिश या आपराधिक मंशा नहीं थी, केजरीवाल और उनकी टीम की उस नैतिक साख को वापस लौटाने का काम करेगा जिसे वे खो चुके थे। ईमानदारी का कार्ड हमेशा से ही आम आदमी पार्टी की सबसे बड़ी खासियत (USP) रहा है।
“शराब घोटाले” से पार्टी की छवि को हुए नुकसान को भली-भांति समझने वाले अरविंद केजरीवाल ने जोर देकर कहा है कि निचली अदालत ने उनकी ‘कट्टर ईमानदारी’ को फिर से बहाल कर दिया है। उन्होंने इस बात को प्रमुखता से रेखांकित किया कि अदालत ने ट्रायल शुरू होने से पहले ही, एकदम शुरुआती स्तर पर ही उनके खिलाफ दर्ज मामले को खारिज कर दिया है।
जांच एजेंसियों पर उठे सवाल
पार्टी नेताओं ने इस बात को भी खूब उछाला है कि उन्हें बरी करते समय विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने सीबीआई को कड़ी फटकार लगाई। निचली अदालत द्वारा सीबीआई की इस तरह की निंदा ने 2013 के कोयला घोटाला मामले में सुप्रीम कोर्ट की उन तीखी टिप्पणियों की याद दिला दी।
उस समय कांग्रेस के नेतृत्व वाली पिछली यूपीए सरकार के दौरान देश की शीर्ष अदालत ने सीबीआई को अपने आकाओं के इशारे पर नाचने वाला “पिंजरे में बंद तोता” करार दिया था।
इस बार भी, निचली अदालत ने ‘पहले से तय’ (premeditated) और ‘सोचे-समझे’ (choreographed) निष्कर्षों पर पहुंचने के लिए सीबीआई को कड़ी फटकार लगाई है।
हालांकि सीबीआई ने केजरीवाल और अन्य को बरी किए जाने के फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी है, लेकिन निचली अदालत के इस आदेश ने आम आदमी पार्टी के नेताओं के खिलाफ ईडी के मनी लॉन्ड्रिंग मामले को भी काफी कमजोर कर दिया है, क्योंकि ईडी का मामला सीधे तौर पर सीबीआई के भ्रष्टाचार के मामले पर ही टिका हुआ था।
आगामी चुनावों पर असर और गठबंधन की राजनीति
अदालत द्वारा मिली इस बड़ी राहत ने आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। अब यह उम्मीद की जा रही है कि वे आने वाले चुनावी मुकाबलों में एक नई ऊर्जा और जोश के साथ उतरेंगे।
भले ही 2026 में होने वाले केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल या असम जैसे राज्यों के चुनावों में ‘आप’ कोई बड़ा प्रभाव न छोड़ पाए, लेकिन पार्टी 2027 में होने वाले चुनावों में एक बेहद निर्णायक भूमिका निभा सकती है। 2027 में पंजाब, गुजरात, गोवा और एक हद तक उत्तर प्रदेश में भी चुनाव होने हैं, जो अंततः 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए एक बड़ा मंच तैयार करेंगे।
उत्साह से भरी आम आदमी पार्टी पंजाब में अपनी सत्ता बरकरार रखने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंकने की तैयारी में है। वहीं, कांग्रेस भी पंजाब में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने की उम्मीद कर रही है। अगर कांग्रेस, जिसके पास केरल को वामपंथी गठबंधन (LDF) से छीनने का अच्छा मौका है, पंजाब को भी वापस जीतने में सफल हो जाती है, तो अगले साल तक देश की सबसे पुरानी पार्टी के पास पांच राज्यों की सत्ता आ जाएगी।
हालात को देखते हुए, भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस को मजबूत होते देखने के बजाय शायद यही चाहेगी कि पंजाब में आम आदमी पार्टी की ही सरकार बनी रहे।
इस बीच, कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि आम आदमी पार्टी और भाजपा के बीच कोई गुप्त समझौता हुआ है। इस आरोप को सिरे से खारिज करते हुए केजरीवाल ने तीखा पलटवार किया और याद दिलाया कि केवल ‘आप’ के नेताओं को ही जेल भेजा गया था, राहुल गांधी, सोनिया गांधी या रॉबर्ट वाड्रा को नहीं।
प्रधानमंत्री मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के गृह राज्य गुजरात में भी आम आदमी पार्टी के कारण कांग्रेस के वोट बैंक में भारी सेंध लगने की पूरी संभावना है।
2022 के गुजरात चुनावों में ठीक ऐसा ही देखने को मिला था। उस चुनाव में ‘आप’ ने भले ही केवल 5 सीटें जीती थीं, लेकिन उसने लगभग 13% वोट हासिल करके कांग्रेस को बहुत भारी नुकसान पहुंचाया था। नतीजा यह हुआ कि 182 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस महज 17 सीटों पर सिमट कर रह गई, जबकि भाजपा ने 156 सीटें जीती थीं।
विपक्ष का रुख और भविष्य की चुनौतियां
यह बात काफी महत्वपूर्ण है कि ‘आप’ नेताओं के बरी होने पर जहां कांग्रेस ने तंज कसा, वहीं विपक्षी ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के अन्य प्रमुख सदस्यों, जिनमें सपा (SP), टीएमसी (TMC) और डीएमके (DMK) शामिल हैं, ने अदालत के आदेश का खुले दिल से स्वागत किया।
समर्थन के लिए अरविंद केजरीवाल ने सपा प्रमुख अखिलेश यादव का विशेष रूप से धन्यवाद भी किया। ‘आप’ ने 2022 के यूपी चुनावों में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करने की कोशिश की थी, लेकिन तब बात नहीं बन पाई थी। हालांकि, यूपी में मुस्लिम समुदाय का झुकाव अब कांग्रेस की ओर होने के कारण, अखिलेश यादव के लिए कांग्रेस को पूरी तरह से किनारे करना काफी मुश्किल होगा।
जब तक अरविंद केजरीवाल को क्षेत्रीय दलों के किसी गैर-कांग्रेसी, गैर-भाजपाई मोर्चे या किसी तीसरे मोर्चे का सर्वमान्य नेता स्वीकार नहीं किया जाता, तब तक उनके लिए अपनी पार्टी को भाजपा के खिलाफ मुख्य विपक्ष के रूप में कांग्रेस के विकल्प के तौर पर स्थापित करना एक बहुत बड़ी चुनौती होगी।
बड़ा सवाल यह भी है कि टीएमसी सुप्रीमो और तीन बार की बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जो खुद विपक्षी गुट का नेतृत्व करने की इच्छा रखती हैं, भला केजरीवाल के नेतृत्व को क्यों स्वीकार करेंगी?
विपक्षी खेमे से उठने वाले ये अलग-अलग सुर निश्चित रूप से भाजपा के लिए किसी मधुर संगीत से कम नहीं होंगे। आम आदमी पार्टी को जो यह नया जीवनदान मिला है, वह छोटी अवधि में कुछ राज्यों के चुनावों में कांग्रेस का वोट काटकर भाजपा को ही फायदा पहुंचा सकता है।
लेकिन, अगर लंबी अवधि की बात करें तो अपनी इस नई ऊर्जा का इस्तेमाल करते हुए पूरे देश में अपना विस्तार कर रही आम आदमी पार्टी भविष्य में भाजपा के लिए भी एक बहुत बड़ी और मजबूत चुनौती बनकर उभर सकती है।
यह भी पढ़ें-
मध्य पूर्व युद्ध का असर: गुजरात के मोरबी में सिरेमिक उद्योग पर गहराया संकट, लाखों नौकरियां खतरे में










