गिर सोमनाथ जिले के वेरावल की एक सत्र अदालत ने सोमवार को 2016 के बहुचर्चित ऊना कांड में अपना फैसला सुनाया है। इस अहम मामले में अदालत ने पांच लोगों को दोषी करार दिया है, जबकि 35 अन्य को बरी कर दिया है। यह वही मामला है जिसमें कथित गोरक्षकों ने चार दलित युवकों की बेरहमी से पिटाई की थी और उन्हें सरेआम घुमाया था। इस अमानवीय घटना के बाद उस समय पूरे देश में भारी विरोध प्रदर्शन हुए थे।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जिग्नेश पंड्या की अदालत ने इस मामले की सुनवाई की। अब अदालत ने इन पांचों दोषियों की सजा तय करने के लिए मंगलवार का दिन निर्धारित किया है।
अदालत की पहली मंजिल पर स्थित एक छोटे से कमरे में जैसे ही यह फैसला सुनाया गया, पीड़ित और शिकायतकर्ता वशराम सरवैया वहां से फौरन निकल गए। उनके साथ उनके पिता बालू सरवैया, सामाजिक कार्यकर्ता मंजुला प्रदीप और कुछ अन्य लोग भी मौजूद थे।
निराश नजर आ रहे वशराम ने मीडिया से बातचीत में कहा कि यह एक बेहद दुखद फैसला है और वे इससे बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे इस फैसले को पहले उच्च न्यायालय और फिर सुप्रीम कोर्ट तक चुनौती देंगे। उनके पिता बालू सरवैया ने भी ठीक ऐसी ही भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा कि वे न्याय के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक अपनी यह कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे।
अभियोजन पक्ष की ओर से पेश हुए जिला सरकारी वकील केतनसिंह वाला ने एक विस्तृत बयान जारी किया। उन्होंने बताया कि अतिरिक्त जिला न्यायाधीश जिग्नेश पंड्या की विशेष अत्याचार अदालत ने पांच आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत दोषी पाया है।
इन पांचों को खतरनाक हथियारों से जानबूझकर चोट पहुंचाने, अवैध रूप से बंधक बनाने, शांति भंग करने के इरादे से अपमानित करने और अनुसूचित जाति समुदाय के सदस्यों को नीचा दिखाने जैसे गंभीर आरोपों में सजा का हकदार माना गया है। दोषी करार दिए गए इन पांच लोगों की पहचान रमेश जादव, राकेश जोशी, नागजीभाई वाणिया, प्रमोदगिरी गोस्वामी और बलवंतगिरी गोस्वामी के रूप में हुई है।
इस पूरे मामले में ऊना पुलिस स्टेशन के चार पुलिसकर्मियों सहित कुल 41 लोगों पर आपराधिक मुकदमा चल रहा था। इन चार पुलिस वालों में तत्कालीन पुलिस इंस्पेक्टर निर्मलसिंह झाला, सब-इंस्पेक्टर नरेंद्रदेव पांडे, असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर कंचन परमार और हेड कांस्टेबल कांजीभाई चूड़ास्मा शामिल थे।
मुकदमे की कार्यवाही के दौरान निर्मलसिंह झाला का निधन हो गया था, इसलिए उनके खिलाफ मामला समाप्त कर दिया गया। बाकी तीनों पुलिस अधिकारियों ने मुकदमे का सामना किया और अंततः सत्र अदालत ने उन सभी को बरी कर दिया है। इन पुलिसकर्मियों पर आरोपियों की मदद करने, ड्यूटी में लापरवाही बरतने, चोट पहुंचाने के इरादे से फर्जी दस्तावेज बनाने और पब्लिक रजिस्टर के रिकॉर्ड में हेराफेरी करने जैसे कई गंभीर आरोप लगे थे।
अन्य आरोपियों पर हत्या का प्रयास, आपराधिक साजिश, गंभीर चोट पहुंचाने की कोशिश, डकैती, अपहरण, महिला की शील भंग करने के इरादे से आपराधिक बल का प्रयोग, घातक हथियारों के साथ दंगा और गैरकानूनी जमावड़ा जैसे आरोप थे। इसके अलावा उन पर आईटी एक्ट सहित आईपीसी व एससी/एसटी एक्ट की कई अन्य सख्त धाराओं के तहत भी मामला दर्ज किया गया था।
बचाव पक्ष के वकीलों में से एक वी सी मावधिया ने अदालत के फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि इस कथित घटना में बहुत सारे लोग शामिल थे, लेकिन अभियोजन पक्ष अपनी शिकायत या गवाही में यह साबित नहीं कर सका कि वास्तव में किसने क्या किया। यही वजह है कि अदालत ने 35 आरोपियों के खिलाफ अपराध को प्रमाणित नहीं माना।
पांच दोषियों में से तीन का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील मावधिया ने बताया कि उनके मुवक्किलों पर जिन धाराओं में आरोप सिद्ध हुए हैं, उनमें अधिकतम पांच साल की सजा का प्रावधान है। उन्होंने एक अहम बात यह भी जोड़ी कि सभी दोषी पहले ही पांच साल से अधिक का समय जेल में बिता चुके हैं। अब उनके मुवक्किल ही यह तय करेंगे कि हाई कोर्ट में अपील करनी है या नहीं।
कैसे इस घटना ने खींचा था पूरे देश का ध्यान
यह खौफनाक घटना 11 जुलाई 2016 को गिर सोमनाथ जिले की ऊना तहसील के मोटा समधियाला गांव के बाहरी इलाके में हुई थी। वशराम और उनके दो रिश्तेदार मृत गायों की खाल उतार रहे थे, जिनमें से एक गाय का शिकार शेर ने किया था। तभी एक कथित साजिश के तहत लोगों की एक भीड़ वहां इकट्ठा हो गई। उन्होंने इन लोगों पर गोहत्या का झूठा आरोप लगाते हुए उनके कपड़े फाड़ दिए, उन्हें एक वाहन से बांधा और बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया। इस दौरान हमलावरों ने पीड़ितों के मोबाइल फोन भी छीन लिए।
सरवैया परिवार दलित समुदाय से ताल्लुक रखता है और मृत जानवरों की खाल उतारना उनका पीढ़ियों पुराना पारंपरिक पेशा है। अपने बेटों की इस निर्मम पिटाई की खबर मिलते ही बालू सरवैया भागते हुए मौके पर पहुंचे। उन्होंने हमलावरों से रुकने की मिन्नतें कीं और उन्हें समझाया कि यह उनका खानदानी काम है।
इसके बावजूद आरोपियों का दिल नहीं पसीजा और उन्होंने बालू तथा उनके अन्य रिश्तेदारों पर भी जानलेवा हमला कर दिया। बाद में वशराम और उनके रिश्तेदारों बेचर, अशोक और रमेश को आरोपी अपनी एसयूवी गाड़ी में बंधक बनाकर ले गए। ऊना शहर में उन्हें आधा नंगा घुमाया गया और पुलिस को सौंपने से पहले अलग-अलग जगहों पर लोहे के पाइप और प्लास्टिक व लकड़ी के डंडों से बुरी तरह पीटा गया। (सोमवार को जब अदालत ने यह फैसला सुनाया, तब बेचर, अशोक और रमेश वहां मौजूद नहीं थे।)
एक रिश्तेदार के दखल के बाद बुरी तरह घायल पीड़ितों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। इसके बाद वशराम की शिकायत के आधार पर आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। आरोपियों ने अपनी इस बर्बरता का वीडियो अपने ही मोबाइल फोन पर रिकॉर्ड किया और उसे सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया।
इन खौफनाक वीडियो के सामने आने के बाद पूरे देश के दलित समुदाय में भारी आक्रोश फैल गया। गुजरात में कई जगहों पर हिंसक प्रदर्शन हुए और जमकर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया। इस घटना के विरोध में कई दलितों ने जहरीला पदार्थ खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की, जिसमें कथित तौर पर एक व्यक्ति की दुखद मौत भी हो गई थी।
इस घटना ने राष्ट्रीय राजनीति में भी एक बड़ा भूचाल ला दिया था। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सुप्रीमो मायावती ने संसद में इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया और बाद में कुछ पीड़ितों से मुलाकात भी की। राजनीतिक रूप से यह इतना बड़ा विवाद बन गया था कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी सहित कई दिग्गज राष्ट्रीय नेता सरवैया परिवार से मिलने और उनके प्रति एकजुटता जताने के लिए मोटा समधियाला पहुंच गए।
गुजरात की तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने भी पीड़ितों से उनके घर जाकर मुलाकात की थी। इसी घटना के बाद जिग्नेश मेवाणी एक बड़े दलित नेता के रूप में उभरे। उन्होंने इस घटना के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया, बाद में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में वडगाम विधानसभा सीट जीती, और फिर कांग्रेस पार्टी में शामिल होकर उसके विधायक बने।
इस हाई-प्रोफाइल मामले की जांच सीआईडी क्राइम को सौंप दी गई थी। जांच एजेंसी ने अंततः 41 आरोपियों के खिलाफ अदालत में अपनी चार्जशीट दायर की, जिसमें उन पर गोहत्या के झूठे आरोप लगाकर दलितों को बदनाम करने की आपराधिक साजिश रचने का भी आरोप लगाया गया था।
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