साल 2026 के गुजरात स्थानीय निकाय चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने एक बार फिर शानदार जीत दर्ज की है। इस जीत के साथ ही पार्टी ने शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में अपनी पकड़ और भी मजबूत कर ली है। बीजेपी ने सभी 15 नगर निगमों पर कब्जा जमा लिया है और जिला तथा तालुका पंचायतों में भी भारी बढ़त हासिल की है।
ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, नगर निगमों, नगर पालिकाओं, जिला पंचायतों और तालुका पंचायतों की कुल 9,200 सीटों में से बीजेपी ने कम से कम 6,450 सीटों पर जीत दर्ज की है। गौरतलब है कि 26 अप्रैल को 9,200 सीटों के लिए मतदान हुआ था, जिसमें 4.18 करोड़ से अधिक पात्र मतदाता थे और 55.1 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया था।
ये चुनाव नतीजे साफ तौर पर दर्शाते हैं कि गुजरात में बीजेपी अजेय बनी हुई है। कांग्रेस जहां इस चुनाव में काफी पिछड़ गई है, वहीं आम आदमी पार्टी (आप) को सबसे बड़े पतन का सामना करना पड़ा है।
साल 2021 में मिली शुरुआती बढ़त के बावजूद, ‘आप’ अपनी लय बरकरार नहीं रख सकी। इसके पीछे मुख्य कारण प्रमुख समुदायों के घटते समर्थन के साथ-साथ आंतरिक कलह, नेतृत्व को लेकर विवाद और भ्रष्टाचार के आरोप रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ‘आप’ नेताओं का अड़ियल रवैया ही इस चुनाव में उनकी करारी हार का सबसे बड़ा कारण बना है।
रात 9 बजे तक जब यह रिपोर्ट तैयार की गई, तब तक के आंकड़ों के अनुसार नगर निगमों की कुल 1,044 सीटों में से बीजेपी ने लगभग 856 सीटों पर अपना परचम लहराया है। दूसरी तरफ, कांग्रेस के खाते में महज 77 सीटें ही आई हैं। आम आदमी पार्टी सहित अन्य राजनीतिक दलों की मौजूदगी चुनाव में नाममात्र की ही रही है।
गुजरात के सबसे बड़े नगर निगम अहमदाबाद पर बीजेपी का पूर्ण नियंत्रण बरकरार है। यहां 48 वार्डों की 192 सीटों में से बीजेपी ने 160 सीटों पर जीत हासिल की है। वहीं कांग्रेस ने अपनी सीटों की संख्या बढ़ाकर 32 कर ली है, जो साल 2021 के मुकाबले आठ अधिक है।
कांग्रेस को यह फायदा मुख्य रूप से एआईएमआईएम और निर्दलीय उम्मीदवारों को हुए नुकसान के कारण मिला है। इस चुनाव में सबसे चौंकाने वाला नतीजा खाड़िया से आया है, जहां कांग्रेस ने पहली बार जीत दर्ज करके बीजेपी के एक बहुत पुराने गढ़ को ढहा दिया है।
आजादी के बाद से ही खाड़िया आरएसएस से लेकर जनसंघ, बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद और बीजेपी की दक्षिणपंथी राजनीति का मुख्य केंद्र रहा है। यही वह जगह है जहां गुजरात में बीजेपी का जन्म हुआ था। इससे भी बहुत पहले, जब साल 1935 में सरदार वल्लभभाई पटेल अहमदाबाद के पहले मेयर बने थे, तब भी इस क्षेत्र ने कड़ा विरोध दर्ज कराया था।
मुंबई से अलग होकर गुजरात को राज्य का दर्जा दिलाने का आंदोलन भी इसी इलाके से शुरू हुआ था, जिसके परिणामस्वरूप 1960 में गुजरात एक स्वतंत्र राज्य बना। इस साल बीजेपी उम्मीदवार भूषण अशोक भट्ट के चुनाव प्रचार का नारा था, “हम खाड़िया को पाकिस्तान नहीं बनने देंगे।”
खाड़िया की सीमा कालूपुर से लगती है, जहां मुस्लिम आबादी अच्छी खासी है। इन सभी समीकरणों के बावजूद खाड़िया वार्ड में कांग्रेस की यह पहली और ऐतिहासिक जीत है।
सूरत में बीजेपी ने लगभग क्लीन स्वीप करते हुए 120 में से 115 सीटें जीत ली हैं। साल 2021 में 27 सीटें जीतकर राजनीतिक पंडितों को चौंकाने वाली ‘आप’ इस बार 6 सीटें जीतने के लिए भी संघर्ष करती नजर आई। खबर लिखे जाने तक ‘आप’ ने सिर्फ चार सीटें ही जीती थीं।
कांग्रेस केवल एक सीट सुरक्षित कर सकी, हालांकि 2021 में उसे एक भी सीट नहीं मिली थी। वहीं नवगठित पोरबंदर-छाया और मोरबी नगर निगमों में बीजेपी ने सभी 52 सीटों पर कब्जा कर लिया। इसके अलावा नडियाद की सभी सीटों पर भी बीजेपी ने एकतरफा जीत दर्ज की। बताते चलें कि पोरबंदर महात्मा गांधी की जन्मस्थली है।
नगर पालिकाओं की बात करें तो बीजेपी ने 2,030 में से 1,791 सीटों पर जीत हासिल की है। ग्रामीण गुजरात में भी पार्टी ने जिला और तालुका पंचायतों में भारी अंतर से बढ़त बनाई। इस प्रचंड जीत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि गुजरात के लोगों ने एक बार फिर बीजेपी के सुशासन के मॉडल पर मुहर लगाई है।
उन्होंने इस सफलता का श्रेय जमीनी स्तर पर मजबूती से जुड़े पार्टी कार्यकर्ताओं को दिया। प्रधानमंत्री ने गुजरात के मतदाताओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि बीजेपी आगे भी गुजरात की सेवा के लिए प्रतिबद्ध है।
गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने इस जनादेश को सकारात्मक राजनीति की जीत बताया। वहीं, उपमुख्यमंत्री हर्ष सांघवी ने इसे स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी की अब तक की सबसे बड़ी जीत करार दिया। इस शानदार जनादेश के बाद गांधीनगर स्थित बीजेपी मुख्यालय ‘कमलम’ में पार्टी कार्यकर्ताओं ने जमकर जश्न मनाया।
बीजेपी की इस ऐतिहासिक जीत में उसके बेहतरीन चुनाव प्रबंधन का बहुत बड़ा योगदान रहा है। गुजरात में पार्टी की ‘पन्ना प्रमुख’ प्रणाली बेहद कुशलता से काम करती है, जिसमें प्रत्येक कार्यकर्ता मतदाता सूची के एक पन्ने (लगभग 30 मतदाताओं) का प्रबंधन करता है।
एक बीजेपी नेता के अनुसार, “भले ही कोई गुजराती हमसे शिकायत करे, लेकिन आखिर में वे वोट बीजेपी को ही देते हैं।” दिलचस्प बात यह है कि बीजेपी स्थानीय निकाय के चुनाव भी पीएम मोदी के नाम पर लड़ती है और पार्टी का दृढ़ विश्वास है कि उनकी जीत में इसका बहुत बड़ा योगदान है।
इन चुनावों में नौ नए नगर निगम जोड़े गए थे, जिनमें आनंद, करमसद, गांधीधाम, मेहसाणा, मोरबी, नडियाद, नवसारी, पोरबंदर-छाया, सुरेंद्रनगर वढवान और वापी शामिल हैं। बीजेपी ने इन सभी नगर निगमों पर एकतरफा जीत दर्ज की है।
जहां एक तरफ गुजरात में कांग्रेस लगभग हाशिए पर चली गई है, वहीं आम आदमी पार्टी का सफर राज्य की राजनीति में हाल के दिनों के सबसे तेज उभार और पतन की कहानी बयां करता है। साल 2021 के सूरत नगर निगम चुनाव में ‘आप’ ने शानदार शुरुआत करते हुए कई सीटें जीती थीं और मुख्य विपक्षी दल बनकर उभरी थी। इससे यह संकेत मिला था कि मतदाताओं को एक नए राजनीतिक विकल्प की तलाश है।
साल 2021 में ‘आप’ को मिला चुनावी समर्थन मुख्य रूप से सत्ता के खिलाफ एक ‘विरोध वोट’ था। आर्थिक मुद्दों को लेकर बीजेपी से नाराज हीरा मजदूरों और कपड़ा व्यापारियों ने ‘आप’ को बढ़त दिलाई थी। लेकिन जैसे ही बीजेपी ने उनकी चिंताओं को दूर किया, ‘आप’ का जनाधार खिसक गया।
इस चुनाव में सूरत में ‘आप’ केवल चार सीटें ही जीत पाई, जिसकी वजह आंतरिक कलह, नेतृत्व के मुद्दे और भ्रष्टाचार के आरोप रहे। प्रदेश स्तर के नेताओं का अहंकार और उनका अड़ियल रवैया भी हार की एक बड़ी वजह माना जा रहा है।
साल 2021 में एआईएमआईएम ने अहमदाबाद के मुस्लिम बहुल जमालपुर और मकतपुरा वार्डों में सात सीटें जीती थीं, लेकिन इस बार वह भुज नगर पालिका में केवल एक ही सीट जीत पाई। एआईएमआईएम और ‘आप’ ने कांग्रेस के वोट बैंक में और सेंध लगाई है, लेकिन कांग्रेस की संगठनात्मक कमजोरियां भी लगातार बरकरार हैं। छिटपुट सफलताओं के बावजूद, कांग्रेस, ‘आप’ और एआईएमआईएम की कुल सीटें बीजेपी के विशाल आंकड़ों के आसपास भी नहीं ठहरती हैं।
इस चुनाव में बीजेपी की ओर से सबसे चर्चित हार पूर्व आईपीएस अधिकारी से नेता बने मनोज निनामा की रही। वह एक स्थानीय कांग्रेस नेता से 2400 से अधिक वोटों से चुनाव हार गए। मनोज निनामा स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) लेने के बाद से ही चर्चा का विषय बने हुए थे।
एएमयूटी कैडर के आईएएस अधिकारी कन्नन गोपीनाथन, जो पिछले साढ़े छह साल से केंद्र से अपना इस्तीफा मंजूर होने की लड़ाई लड़ रहे हैं, उनके बिल्कुल विपरीत मनोज निनामा का इस्तीफा तुरंत स्वीकार कर लिया गया था। उन्हें कार्यमुक्त कर दिया गया और महज 72 घंटे के भीतर अरवल्ली जिले के शामलाजी तालुका के ओढ से बीजेपी का टिकट भी थमा दिया गया था। इसके बावजूद वह कांग्रेस के सुरेश निनामा से हार गए, जो एक पूर्व सरपंच और जमीन से जुड़े बेहद मजबूत स्थानीय नेता हैं।
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