किसी की मां को सरकारी अस्पताल के काउंटर से निराश लौटा दिया गया। उन्हें दवाइयों की सख्त जरूरत थी, लेकिन बाहर से खरीदने को कह दिया गया। वह यह नहीं जानती थीं कि उसी इमारत के किसी कोने में, जो दवाइयां उन्हें चाहिए थीं, वे अपनी एक्सपायरी डेट पार कर चुकी थीं।
साल 2017 से 2022 के बीच गुजरात के सरकारी अस्पतालों का यही कड़वा सच था। 4 करोड़ रुपये की दवाइयों का स्टॉक न तो खत्म हुआ और न ही चोरी हुआ। वे बस बर्बाद हो गईं, लावारिस छोड़ दी गईं और उन्हें भुला दिया गया। पैकेट पर लिखी तारीखें निकल गईं और वे किसी काम की नहीं रहीं।
वाइब्स ऑफ इंडिया (Vibes of India) को मिली जानकारी के अनुसार, जांच में यह बात सामने आई है कि सबसे बुनियादी नियमों को ताक पर रख दिया गया था। जिन दवाइयों को ठंडी और सुरक्षित जगह पर रखा जाना चाहिए था, उन्हें खुले में छोड़ दिया गया।
वीओआई (VOI) के पास उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, मरीजों को सस्ती दवाइयों के लिए जन औषधि केंद्रों की तरफ भेज दिया जाता था।
मरीज लंबी कतारों में खड़े होते, लेकिन हताश होकर लौट आते। उन्हें लगता कि शायद सिस्टम के पास दवाइयां ही नहीं हैं, लेकिन सच्चाई इसके बिल्कुल उलट थी। दवाइयां वहीं मौजूद थीं। बस वे गलत जगह और गलत हालातों में सड़ रही थीं। उन्हें जरूरतमंद हाथों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी किसी ने नहीं ली।
यह बर्बादी अहमदाबाद, सूरत, वडोदरा, राजकोट और पाटन जैसे कई जिलों में फैली हुई थी।
जांच से पता चला कि यह कोई सप्लाई का संकट नहीं था। बल्कि यह उससे भी बदतर स्थिति थी। यह एक ऐसा सिस्टम था जिसने दवाइयां लीं, उन्हें लापरवाही से स्टोर किया, कभी बांटा ही नहीं और फिर बिना किसी परवाह के उन्हें एक्सपायर होते हुए देखता रहा।
कागजों पर यह आंकड़ा 4 करोड़ रुपये का है। लेकिन इसके पीछे आम लोग हैं। वह बच्चा जिसका शायद इलाज नहीं हो पाया। वह बुजुर्ग जिसने अपनी जेब से वो दवाइयां खरीदीं, जो उसे मुफ्त मिलनी चाहिए थीं। वह परिवार जिसने अपना बजट बिगाड़ लिया क्योंकि सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली ने उनका साथ छोड़ दिया।
किसी भी जवाबदेह और बेहतर सिस्टम में दवाइयों का एक्सपायर होना एक बड़ी चूक मानी जाती है। लेकिन गुजरात में यह एक आदत सी बन गई है।
अस्पतालों के पास दवाइयां थीं। मरीजों को उनकी जरूरत थी। सिस्टम बस इन दोनों को जोड़ नहीं सका। नतीजतन, करदाताओं के करोड़ों रुपये बर्बाद हो गए। यह उस हेल्थकेयर सिस्टम की दयनीय स्थिति को दर्शाता है जो दवाइयों को मरीजों तक पहुंचाने जैसे अपने सबसे बुनियादी काम में भी विफल रहा।
‘बर्बादी का आंकड़ा’: जिलेवार जानकारी
जिलेवार बर्बादी के आंकड़ों पर नजर डालें तो सबसे खराब स्थिति पाटन की रही, जहां 1.42 करोड़ रुपये की दवाइयां खराब हुईं। इसके बाद जामनगर में 88.20 लाख रुपये, अहमदाबाद में 68.17 लाख रुपये और वडोदरा में 48.67 लाख रुपये की दवाइयां बर्बाद हुईं।
इसी तरह सूरत में 38.44 लाख रुपये, अमरेली में 28.50 लाख रुपये, हिम्मतनगर में 28.02 लाख रुपये और दाहोद में 11.24 लाख रुपये की दवाइयां खराब होने के मामले सामने आए। इस सूची में राजकोट का आंकड़ा 8.36 लाख रुपये और वलसाड का 6.82 लाख रुपये रहा।
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