देश के सबसे बड़े निजी बैंक, HDFC में शासन और नैतिकता से जुड़ा एक बड़ा मामला सामने आया है। बैंक की एक आंतरिक सतर्कता जांच में खुलासा हुआ है कि नियमों की घोर अनदेखी करते हुए महाराष्ट्र राज्य सड़क विकास निगम (MSRDC) को 45 करोड़ रुपये का अतिरिक्त ब्याज चुकाया गया। इस भारी-भरकम रकम को सीधे ब्याज के तौर पर देने के बजाय, बैंक के मार्केटिंग खर्च और सड़क सुरक्षा अभियान के प्रायोजन के रूप में छिपाया गया था।
इस्तीफे के पीछे की असली कहानी
18 मार्च को जब HDFC बैंक के तत्कालीन चेयरमैन अतनु चक्रवर्ती ने अपने पद से अचानक इस्तीफा दिया, तो उन्होंने बैंक की कुछ कार्यप्रणालियों और अपने व्यक्तिगत मूल्यों के बीच असहमति का हवाला दिया था। उस समय बैंकिंग जगत में इस इस्तीफे को लेकर कोई खास अलार्म नहीं बजा था।
अगले ही दिन, 19 मार्च को नवनियुक्त अंतरिम चेयरमैन केकी मिस्त्री ने बयान दिया कि बैंक की नैतिकता बेहद मजबूत है और प्रशासन को लेकर कोई समस्या नहीं है। उसी दिन भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी स्पष्ट किया कि उनके नियमित आकलन के अनुसार बैंक के कामकाज को लेकर कोई चिंता की बात नहीं है।
लेकिन पर्दे के पीछे कहानी बिल्कुल अलग थी। इन बयानों से ठीक छह दिन पहले, 12 मार्च को बैंक की ऑडिट समिति (ACB) के अध्यक्ष एम.डी. रंगनाथ ने एक औपचारिक आंतरिक सतर्कता जांच का आदेश दे दिया था। यह जांच MSRDC को वित्त वर्ष 2024 और 2025 के दौरान किए गए भुगतान को लेकर बैठाई गई थी, जिसे मार्केटिंग विभाग के ऑडिट में ‘असंतोषजनक’ करार दिया गया था।
कैसे रची गई मार्केटिंग खर्च की साजिश
जांच दस्तावेजों से पता चलता है कि 45 करोड़ रुपये की यह रकम वास्तव में MSRDC को उनके जमा पर तय सीमा से अधिक ब्याज देने के लिए थी। इसे बैंक के मार्केटिंग विभाग के माध्यम से भेजा गया और चार स्थानीय वेंडरों के जरिए सड़क सुरक्षा जागरूकता अभियान के चंदे के रूप में दिखाया गया।
यह पूरी योजना HDFC बैंक के एमडी और सीईओ शशिधर जगदीशन की मौजूदगी में बनी थी। शीर्ष स्तर की इस चर्चा में MSRDC को मौखिक रूप से अधिक ब्याज दर देने पर सहमति जताई गई थी। बैंक के मुख्य विपणन अधिकारी (CMO) रवि संथानम ने जांच में स्वीकार किया कि उनके विभाग ने इस अतिरिक्त ब्याज को मार्केटिंग खर्च के रूप में छिपाने में केवल एक सूत्रधार की भूमिका निभाई।
6.01 प्रतिशत रिटर्न का वह गुप्त समझौता
इस पूरे प्रकरण की शुरुआत साल 2021 में हुई, जब बैंक ने MSRDC से उनकी बचत जमा राशि प्राप्त करने के लिए संपर्क किया था। उस समय बैंक बचत खातों पर 3.5 प्रतिशत ब्याज दे रहा था। MSRDC ने शर्त रखी कि वह अपने 25,000 करोड़ रुपये के एक बड़े भूमि अधिग्रहण प्रोजेक्ट की राशि HDFC में तभी रखेगी, जब उसे कम से कम 6.01 प्रतिशत का रिटर्न मिलेगा। सरकारी एजेंसी ने 5 करोड़ रुपये की अग्रिम फीस भी मांगी थी, जिसे बैंक ने ठुकरा दिया था।
बैंक ने MSRDC की उम्मीदों को पूरा करने के लिए 6.01 प्रतिशत रिटर्न का एक ढांचा तैयार किया। इसके तहत, एसेट लायबिलिटी कमेटी ने 10,000 करोड़ रुपये से अधिक की जमा राशि की उम्मीद में 4.5 प्रतिशत की विशेष दर को मंजूरी दी। जब शुरुआती महीनों में केवल 200 करोड़ रुपये ही आए, तो अप्रैल 2022 में यह 4.5 प्रतिशत वाली विशेष खिड़की बंद कर दी गई।
बैंक के सामने अब एक बड़ा संकट था। सामान्य ग्राहकों को 3.5 प्रतिशत मिल रहा था, जबकि MSRDC से 6.01 प्रतिशत का वादा किया जा चुका था। इन दोनों के बीच के 2.51 प्रतिशत के अंतर को चुकाने के लिए ही वरिष्ठ प्रबंधन ने मार्केटिंग विभाग का रास्ता चुना।
फर्जी चालान और गायब होती पारदर्शिता
इस व्यवस्था को औपचारिक रूप देने वाले पत्रों पर जूनियर कर्मचारियों ने हस्ताक्षर किए थे और क्षेत्रीय प्रमुख ने इसे केवल मौखिक मंजूरी दी थी। इन पत्रों की न तो कानूनी जांच हुई और न ही इनमें 6.01 प्रतिशत रिटर्न का कोई जिक्र था। फरवरी 2022 से MSRDC ने बैंक में पैसा जमा करना शुरू किया। यह रकम 2023 के कुछ महीनों में 3,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गई और 2023 से 2025 के बीच बैंक ने MSRDC को लगभग 45 करोड़ रुपये का भुगतान किया।
आंतरिक ऑडिट रिपोर्ट ने इस फर्जीवाड़े की पोल खोल दी। 2023-24 और 2024-25 के दौरान मार्केटिंग विभाग ने सड़क सुरक्षा अभियान के नाम पर 39.7 करोड़ रुपये का भुगतान किया। यह पैसा कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) टीम के माध्यम से नहीं भेजा गया था।
वेंडरों द्वारा दिए गए बिलों की कोई जांच नहीं हुई। सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि लगभग 9 करोड़ रुपये के तीन अलग-अलग चालानों में एक ही तस्वीर का इस्तेमाल किया गया था। बिना किसी इवेंट कन्फर्मेशन सर्टिफिकेट के करोड़ों रुपये जारी कर दिए गए। मार्केटिंग टीम ने खुद माना कि यह डील रिटेल ब्रांच बैंकिंग टीम ने की थी और फाइनेंस विभाग ने इसके लिए अलग से अतिरिक्त बजट दिया था।
नियमों का खुला उल्लंघन और शीर्ष प्रबंधन की जिम्मेदारी
इस प्रक्रिया ने बैंकिंग क्षेत्र के कई गंभीर नियमों को तोड़ा है। यह सीधे तौर पर RBI के मास्टर निर्देशों का उल्लंघन है, जो बैंकों को किसी भी व्यक्तिगत जमाकर्ता को विशेष रिटर्न देने से रोकता है। इसके अलावा, यह बैंक की अपनी रिश्वत और भ्रष्टाचार विरोधी नीति का भी उल्लंघन है। वेंडरों के जरिए भुगतान होने के कारण इनपुट टैक्स क्रेडिट का दावा किए जाने की आशंका ने मामले को और गंभीर बना दिया है।
सतर्कता रिपोर्ट 10 अप्रैल को ऑडिट कमेटी और एक हफ्ते बाद नामांकन एवं पारिश्रमिक समिति को सौंपी गई। इस जांच में एमडी और सीईओ शशिधर जगदीशन, सीएफओ श्रीनिवासन वैद्यनाथन और सीएमओ रवि संथानम सहित 10 से अधिक शीर्ष अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया गया है।
रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि एमडी और सीईओ जगदीशन उन चर्चाओं का हिस्सा थे जहां 6.01 प्रतिशत रिटर्न पर मौखिक सहमति बनी थी, जिससे बैंक को नियामक और प्रतिष्ठा संबंधी जोखिमों का सामना करना पड़ा। वहीं, सीएफओ वैद्यनाथन भी उस बैठक में मौजूद थे जहां इस अंतर को मार्केटिंग के जरिए चुकाने की योजना बनी। उन्होंने यह सुनिश्चित नहीं किया कि इस व्यवस्था का कोई औपचारिक रिकॉर्ड रखा जाए या इसका ऑडिट किया जाए।
यह भी पढ़ें-










