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पूर्वी भारत में अमूल का सबसे बड़ा दांव: पश्चिम बंगाल और असम में 800 करोड़ के निवेश से लगाएगा नए डेयरी प्लांट

| Updated: May 27, 2026 13:36

पश्चिम बंगाल में 650 करोड़ और असम में 150 करोड़ रुपये के निवेश के साथ, गुजरात की दिग्गज सहकारी संस्था 'अमूल' पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में अपना सबसे बड़ा डेयरी प्रोजेक्ट स्थापित करने की तैयारी कर रही है।

वडोदरा: अपने घरेलू क्षेत्र से बाहर निकलकर पश्चिम बंगाल में प्रसिद्ध ‘अमूल मॉडल’ को पेश करने के एक दशक से अधिक समय बाद, गुजरात की यह दिग्गज सहकारी डेयरी अब पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में अपने सबसे बड़े विस्तार की तैयारी कर रही है।

पश्चिम बंगाल में भाजपा की शानदार जीत और असम में लगातार तीसरी बार उसकी सत्ता में वापसी के बाद, आणंद स्थित अमूल इन दोनों राज्यों में अपना निवेश तेज कर रहा है। इसके तहत कुल 800 करोड़ रुपये के निवेश की योजना तैयार की गई है।

सूत्रों ने बताया कि गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन की प्रमुख सदस्य ‘खेड़ा जिला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ लिमिटेड’ (जिसे अमूल डेयरी के नाम से भी जाना जाता है), पश्चिम बंगाल में लगभग 650 करोड़ रुपये निवेश करने के लिए अंतिम दौर की चर्चा कर रही है। कंपनी की योजना राज्य में अपना पहला पूर्ण स्वामित्व वाला डेयरी प्रसंस्करण संयंत्र (प्रोसेसिंग प्लांट) स्थापित करने की है।

इसी के साथ-साथ, यह को-ऑपरेटिव संस्था असम के गुवाहाटी के पास भी लगभग 150 करोड़ रुपये के निवेश से एक बड़ा डेयरी प्रोजेक्ट लगा रही है।

साल 2008 में जब अमूल ने बंगाल के तत्कालीन वामपंथी प्रभुत्व वाले ‘लाल गढ़’ में कदम रखा था, तब इसके शुरुआती प्रयोग को लेकर कई तरह की शंकाएं थीं। लेकिन समय के साथ बंगाल में कंपनी का दायरा काफी बढ़ा है और आज यह अमूल के सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक बन गया है।

असम सरकार ने गुवाहाटी वाले नए प्रोजेक्ट के लिए जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया पहले ही पूरी करवा दी है।

अमूल डेयरी के प्रबंध निदेशक अमित व्यास ने इस बात की पुष्टि करते हुए बताया कि गुवाहाटी के पास एक डेयरी प्लांट स्थापित किया जा रहा है, जहां रोजाना करीब दो लाख लीटर दूध (LLPD) का प्रसंस्करण किया जाएगा। पहले चरण में यहां तरल दूध, पनीर, दही, फ्लेवर्ड मिल्क और मिष्टी दोई जैसे उत्पाद बनाए जाएंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जमीन का अधिग्रहण हो चुका है और प्लांट के डिजाइन को अंतिम रूप दिया जा रहा है।

यह नया कदम अमूल की पूर्वी भारत से जुड़ी रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है। वर्तमान में दोनों राज्यों में कंपनी मुख्य रूप से थर्ड-पार्टी (तीसरे पक्ष की) सुविधाओं के जरिए काम करती है, जबकि दूध की खरीद और मार्केटिंग नेटवर्क का जिम्मा वह खुद संभालती है। इस भारी-भरकम निवेश के बाद अब इस क्षेत्र में उत्पादन, गुणवत्ता और वितरण पर अमूल का सीधा नियंत्रण स्थापित हो जाएगा।

पश्चिम बंगाल में अमूल डेयरी अपने प्रोजेक्ट के लिए कई संभावित स्थानों का मूल्यांकन कर रही है। बाजार की भौगोलिक स्थिति और फैलाव को देखते हुए खेड़ा यूनियन इस बात पर मंथन कर रही है कि क्या उसे एक बड़ा केंद्रीय प्लांट स्थापित करना चाहिए या फिर पूरे राज्य में छोटे फीडर संयंत्रों का नेटवर्क तैयार करना चाहिए।

मामले से जुड़े एक सूत्र ने बताया कि कई छोटे संयंत्र होने से डेयरी उत्पादों की परिवहन लागत को कम करने में काफी मदद मिल सकती है। ऐसे में घी, मक्खन और आइसक्रीम जैसे उत्पादों के निर्माण के लिए एक केंद्रीकृत संयंत्र बनाया जा सकता है, जबकि दूध, दही, छाछ और लस्सी का उत्पादन छोटे संयंत्रों में किया जा सकता है।

वर्तमान आंकड़ों पर गौर करें तो अकेले कोलकाता में अमूल के दूध की बिक्री लगभग 11 लाख लीटर प्रतिदिन (LLPD) आंकी गई है। इसकी तुलना में, बंगाल क्षेत्र में दूध की खरीद भी बढ़कर लगभग 9 लाख लीटर प्रतिदिन के आंकड़े को छू रही है, जो पूर्वी भारत में कंपनी के संचालन के तेज विकास को दर्शाती है। दूसरी ओर असम में, अमूल की दूध खरीद वर्तमान में लगभग 70,000 लीटर प्रतिदिन है।

उद्योग जगत के जानकारों का मानना है कि यह नवीनतम विस्तार अमूल की दीर्घकालिक व्यापारिक रणनीति का हिस्सा है। इसका मुख्य उद्देश्य पश्चिमी भारत से बाहर अपनी मौजूदगी को और अधिक गहरा करना और उन क्षेत्रों में डेयरी के बुनियादी ढांचे को मजबूत करना है, जहां संगठित दूध खरीद नेटवर्क पारंपरिक रूप से कमजोर रहे हैं।

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