रोहतक: डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को एक बार फिर बड़ी राहत मिली है। साध्वी यौन शोषण मामले में 20 साल की सजा काट रहे राम रहीम को रोहतक की सुनारिया जेल से 30 दिनों की पैरोल पर रिहा कर दिया गया है। सजा मिलने के बाद से यह उनकी 16वीं अस्थायी रिहाई है।
सक्षम राज्य प्राधिकारी द्वारा पैरोल की मंजूरी मिलने के बाद, डेरा प्रमुख सुबह करीब 6:34 बजे सुनारिया जेल से बाहर आए। इस दौरान जेल परिसर के बाहर सुरक्षा के बेहद सामान्य और सीमित इंतजाम देखे गए।
राम रहीम के वकील जितेंद्र खुराना ने इस पैरोल की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि सक्षम प्राधिकारी ने उन्हें 30 दिनों की पैरोल दी है। इस अवधि के दौरान डेरा प्रमुख सिरसा स्थित अपने डेरा सच्चा सौदा में ही समय बिताएंगे।
अगस्त 2017 में दोषी ठहराए जाने के बाद राम रहीम को पहली बार सुनारिया जेल भेजा गया था। तब से लेकर अब तक वे कई बार पैरोल और फर्लो पर बाहर आ चुके हैं। इसी साल जनवरी में भी उन्हें 40 दिनों की पैरोल मिली थी, जिसके बाद वे 15 फरवरी को वापस जेल लौटे थे।
इससे पहले, इसी साल 7 मार्च को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड में गुरमीत राम रहीम को बरी कर दिया था। इस फैसले की पुष्टि उनके वकील ने की थी। राम रहीम पर अपने अखबार में डेरा की आलोचना करने वाले सिरसा के पत्रकार की हत्या की साजिश रचने का आरोप था।
साल 2019 में विशेष सीबीआई अदालत ने राम रहीम सहित कुलदीप सिंह, निर्मल सिंह और कृष्ण लाल को इस हत्याकांड का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके साथ ही सभी पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था।
हालांकि, पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शील नागू और न्यायमूर्ति विक्रम अग्रवाल की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए राम रहीम को आरोपों से मुक्त कर दिया।
इसके अलावा, साल 2024 में ही हाई कोर्ट ने डेरा के पूर्व प्रबंधक रंजीत सिंह की 2002 में हुई हत्या के मामले में भी राम रहीम और चार अन्य आरोपियों को बरी कर दिया था। इससे पहले पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत ने इन सभी को उम्रकैद की सजा दी थी।
आरोप था कि कुरुक्षेत्र के खानपुर कोलियान गांव के रहने वाले रंजीत सिंह की 10 जुलाई 2002 को उस समय हत्या कर दी गई थी, जब वे अपने खेतों में काम कर रहे थे।
गुरमीत राम रहीम को बार-बार मिलने वाली इस पैरोल पर पहले भी कई बार राजनीतिक विवाद खड़े हो चुके हैं। विभिन्न पक्षों और सामाजिक संगठनों द्वारा उनकी अस्थायी रिहाई को लेकर सुरक्षा चिंताओं के साथ-साथ तीखी राजनीतिक आलोचना भी की जाती रही है।
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