नई दिल्ली। भारत में एंटी-डंपिंग ड्यूटी को उचित तरीके से लागू करने पर देश को सालाना 28,540 करोड़ रुपये (3 बिलियन अमेरिकी डॉलर) के विदेशी मुद्रा भंडार की बचत हो सकती है। इसके साथ ही, इससे 70,000 करोड़ रुपये के घरेलू निवेश को भी बढ़ावा मिल सकता है।
यह महत्वपूर्ण जानकारी सेंटर फॉर डोमेस्टिक इकोनॉमी पॉलिसी रिसर्च (C-DEP) और वाणिज्य मंत्रालय के सेंटर फॉर डब्ल्यूटीओ स्टडीज द्वारा जारी एक हालिया रिपोर्ट में सामने आई है।
“भारत में एंटी-डंपिंग ड्यूटी का प्रभाव” नामक इस रिपोर्ट को वाणिज्य मंत्रालय के सेंटर फॉर डब्ल्यूटीओ स्टडीज के प्रमुख प्रीतम बनर्जी द्वारा एक राउंडटेबल कार्यक्रम में जारी किया गया।
यह रिपोर्ट डाउनस्ट्रीम लागत, मुद्रास्फीति, एमएसएमई, घरेलू क्षमता और निवेश पर ड्यूटी के प्रभावों का बारीकी से विश्लेषण करती है। इस कार्यक्रम में रसायन, पॉलिमर, कपड़ा और अन्य विनिर्माण क्षेत्रों के उन प्रमुख उद्योग नेताओं ने हिस्सा लिया, जिनकी घरेलू विनिर्माण क्षमता चीन और अन्य देशों से होने वाली डंपिंग के कारण बुरी तरह प्रभावित हुई है। इन प्रभावित घरेलू निर्माताओं का कुल टर्नओवर 2 लाख करोड़ रुपये से भी अधिक है।
रिपोर्ट में 33 उत्पादों के विस्तृत अध्ययन से पता चलता है कि डंप किए गए आयात से होने वाला मौजूदा आर्थिक नुकसान लगभग 1.54 लाख करोड़ रुपये है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि साल 2030 तक यह नुकसान बढ़कर 2.68 लाख करोड़ से 2.70 लाख करोड़ रुपये के बीच पहुंच सकता है।
इसके अतिरिक्त, इस स्थिति के कारण खतरे में पड़ी नौकरियों की संख्या जो आज लगभग 24,000 है, वह बढ़कर 38,000 से 42,000 तक पहुंच सकती है। ये आंकड़े आयात-संचालित बाजार की विकृतियों के अर्थव्यवस्था और रोजगार पर पड़ने वाले दीर्घकालिक गंभीर परिणामों को दर्शाते हैं।
अध्ययन में यह भी सामने आया है कि एंटी-डंपिंग ड्यूटी का डाउनस्ट्रीम लागत और महंगाई पर न के बराबर असर पड़ता है। 56 ऐसे मामलों के विश्लेषण (जहां ड्यूटी लागू नहीं की गई थी) से स्पष्ट हुआ कि अंतिम उपभोक्ता कीमतों पर इसका औसत प्रभाव मात्र 0.023 प्रतिशत रहा होता, जिसमें 91 प्रतिशत से अधिक मामलों में यह असर 0.10 प्रतिशत से भी नीचे था।
21 लंबित मामलों का महंगाई में योगदान 50 प्रतिशत पास-थ्रू धारणा के तहत भी 0.01 प्रतिशत अंक से कम है। यह प्रमाणित करता है कि यह शुल्क अंतिम उपभोक्ताओं के लिए कीमतें नहीं बढ़ाता, बल्कि घरेलू उत्पादकों को उचित प्रतिस्पर्धा वापस दिलाने में मदद करता है।
रिपोर्ट विशेष रूप से एमएसएमई (MSME) सेक्टर पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी लागू न होने के विनाशकारी प्रभाव को उजागर करती है । लगातार हो रहे डंप आयात के कारण सब्लिमेशन-ट्रांसफर पेपर, फोन बैक कवर और नायलॉन फिलामेंट यार्न जैसे क्षेत्रों में कारखानों को मजबूरन बंद करना पड़ा है।
इसके विपरीत, केबल टाई, सिरेमिक वेयर और वैक्यूम फ्लास्क जैसे क्षेत्रों में समय पर एंटी-डंपिंग हस्तक्षेप ने घरेलू एमएसएमई को अपना संचालन बनाए रखने, उत्पादन का विस्तार करने और नए निवेश आकर्षित करने में बड़ी सहायता की है।
रिपोर्ट के आंकड़े साफ तौर पर बताते हैं कि भारत एंटी-डंपिंग ड्यूटी का दुरुपयोग नहीं कर रहा है। इसके विपरीत, अमेरिका और कई अन्य देश भारत की तुलना में बहुत बड़े पैमाने पर इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। भारत में ड्यूटी की औसत अवधि 6.97 वर्ष है, जबकि वैश्विक औसत 11.19 वर्ष है।
इसके अलावा, अमेरिका और चीन जैसे देशों ने 632% तक के भारी-भरकम शुल्क लगाए हैं, जबकि भारत में दरें काफी कम रहती हैं। रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि भारत की औद्योगिक मजबूती, घरेलू क्षमता की रक्षा करने, आयात निर्भरता घटाने और 2047 तक ‘विकसित भारत’ के विजन को साकार करने के लिए सुझाई गई एंटी-डंपिंग ड्यूटी को तत्काल प्रभाव से लागू करना बेहद आवश्यक है।
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