दिवालिया हो चुकी जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड (जेएएल) के लिए अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड के 14,543 करोड़ रुपये के रेजोल्यूशन प्लान पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने खनन क्षेत्र की दिग्गज कंपनी वेदांता लिमिटेड की उस याचिका को भी खारिज कर दिया, जिसमें इस योजना का विरोध किया गया था।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) के आदेशों में दखल देने से मना कर दिया। इन्हीं आदेशों के जरिए अडानी के इस प्लान को लागू करने का रास्ता साफ हुआ था।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने रेजोल्यूशन प्रक्रिया की देखरेख कर रही समिति को यह निर्देश जरूर दिया है कि कोई भी बड़ा कदम उठाने से पहले एनसीएलएटी की पूर्व मंजूरी ली जाए। इसके साथ ही अपीलीय न्यायाधिकरण को इस मामले की जल्द सुनवाई करने को कहा गया है। एनसीएलएटी में इस मामले की सुनवाई 10 अप्रैल को होनी तय है।
कानूनी जानकारों का मानना है कि अहम फैसलों के लिए एनसीएलएटी की पूर्व मंजूरी अनिवार्य किए जाने से इस योजना के क्रियान्वयन की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। लेक्स कंसल्टेंट्स के पार्टनर सुवांकुर दास के मुताबिक, रेजोल्यूशन प्लान मंजूर होने के बाद किसी भी फैसले के लिए एनसीएलएटी की अनुमति अनिवार्य करने से योजना के असर और उसके निष्पादन में बाधा आएगी।
सुवांकुर दास ने आगे कहा कि यह दिवाला और दिवालियापन संहिता (आईबीसी), 2016 के तहत एक ऐसी अतिरिक्त प्रक्रिया जोड़ता है जिसकी मूल रूप से कल्पना नहीं की गई थी। उनके अनुसार, यह अनिवार्यता आईबीसी मामलों में न्यूनतम न्यायिक हस्तक्षेप के स्थापित सिद्धांत के भी बिल्कुल विपरीत है।
सीएलएपी ज्यूरिस के संस्थापक और मैनेजिंग पार्टनर तुषार अग्रवाल ने बताया कि यह शर्त भले ही काम को थोड़ा धीमा कर दे, लेकिन इसका मकसद अपील लंबित रहने के दौरान संपत्ति हस्तांतरण, डीलिस्टिंग या लेनदारों के भुगतान जैसे अपरिवर्तनीय कदमों को रोकना है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ‘बड़े फैसलों’ की श्रेणी में क्या-क्या आता है, इसे लेकर स्थिति साफ न होने से भविष्य में विवाद और देरी होने की आशंका बनी रहेगी।
इस नीलामी में पिछड़ने वाली कंपनी वेदांता ने अडानी की योजना को लेनदारों द्वारा दी गई मंजूरी को चुनौती दी है। वेदांता का आरोप है कि उसकी ऊंची बोली को नजरअंदाज किया गया और पूरी प्रक्रिया में निष्पक्षता तथा पारदर्शिता की भारी कमी थी।
सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने से पहले वेदांता की याचिकाएं एनसीएलटी और एनसीएलएटी दोनों जगह नाकाम हो चुकी थीं। 24 मार्च को अपीलीय न्यायाधिकरण ने अंतरिम राहत देने से इनकार करते हुए अडानी की योजना को लागू करने की अनुमति दे दी थी, जो कि अपील के अंतिम फैसले के अधीन है।
एनसीएलएटी ने जयप्रकाश एसोसिएट्स की डीलिस्टिंग पर भी रोक लगाने से मना कर दिया था। ट्रिब्यूनल ने कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स (सीओसी) की उन दलीलों पर गौर किया जिसमें कहा गया था कि अगर अंततः इस योजना को रद्द किया जाता है, तो डीलिस्टिंग सहित इसके तहत की गई सभी कार्रवाइयां अपने आप वापस हो जाएंगी।
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान वेदांता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि उनकी 17,926 करोड़ रुपये की बोली अडानी से अधिक थी और लेनदारों को बेहतर मूल्य दे रही थी। इसके बावजूद लेनदारों ने अडानी की योजना को चुना, जिसका सीधा मतलब है कि उन्होंने करीब 3,000 करोड़ रुपये कम मूल्य स्वीकार किया।
सिब्बल ने अदालत को बताया कि एक बार योजना लागू हो जाने और 15,000 से अधिक लेनदारों का भुगतान हो जाने के बाद, कंपनी की डीलिस्टिंग सहित पूरी प्रक्रिया को पलटना बेहद मुश्किल होगा। उन्होंने तर्क दिया कि सौदा लागू होने के बाद इसे सुधारना असंभव होगा, क्योंकि वे जेपी के साथ फॉर्मूला वन सर्किट और कई अन्य संपत्तियां भी खरीदना चाहते हैं।
सिब्बल ने सवाल उठाया कि जब सभी 15,000 लेनदारों को पैसा मिल जाएगा और वे चले जाएंगे, तो उस पूरी प्रक्रिया को वापस कैसे लाया जाएगा। इसलिए वे चाहते हैं कि जब तक मामले की सुनवाई चले, तब तक कोई कदम न उठाया जाए।
सीओसी की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि तुरंत ऐसा कुछ भी नहीं होगा जिसे पलटा न जा सके। उन्होंने स्पष्ट किया कि डीलिस्टिंग सहित पूरी प्रक्रिया चरणबद्ध है, जिसमें कम से कम 50 दिन लगेंगे।
मेहता ने कहा कि दोनों बोलियों के बीच का अंतर केवल 500 करोड़ रुपये का था और अडानी की योजना मेरिट के आधार पर कहीं बेहतर थी। उन्होंने बताया कि अडानी एंटरप्राइजेज की योजना में अग्रिम भुगतान जल्द करने की समयसीमा ज्यादा बेहतर थी और बोलियों के बीच का अंतर केवल 500 का है, न कि दोगुने का, जैसा कि प्रभाव बनाने की कोशिश की जा रही है।
एक ईमेल के जवाब में वेदांता ने कहा कि वे माननीय सर्वोच्च न्यायालय के उस आदेश का सम्मान करते हैं जिसमें जेएएल निगरानी समिति को किसी भी बड़े नीतिगत निर्णय से पहले एनसीएलएटी की मंजूरी लेने का निर्देश दिया गया है। कंपनी ने एनसीएलएटी को वेदांता की याचिका पर प्राथमिकता से सुनवाई करने के निर्देश का भी स्वागत किया। वहीं, अडानी एंटरप्राइजेज को भेजे गए सवालों का खबर लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं मिला था।
क्या है पूरा विवाद
इस पूरे विवाद के केंद्र में यह सवाल है कि आईबीसी के तहत मूल्य का आकलन कैसे किया जाना चाहिए। वेदांता का तर्क है कि लेनदारों ने निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया के जरिए मूल्य को अधिकतम करने के बुनियादी सिद्धांत का उल्लंघन किया है।
कंपनी ने कहा कि चुनौती प्रक्रिया के दौरान वह नेट प्रेजेंट वैल्यू के आधार पर 12,505.85 करोड़ रुपये की पेशकश के साथ सबसे ऊंची बोली लगाने वाली कंपनी बनकर उभरी थी। इसके बावजूद लेनदारों ने अडानी की योजना को मंजूरी दे दी।
वेदांता का दावा है कि अडानी की योजना कुल मूल्य में लगभग 3,400 करोड़ रुपये और नेट प्रेजेंट वैल्यू में 500 करोड़ रुपये कम थी। कंपनी ने प्रक्रियात्मक खामियों का भी आरोप लगाते हुए कहा कि उसे प्रस्ताव खारिज करने का कारण नहीं बताया गया और न ही अपने प्रस्ताव को स्पष्ट करने का कोई मौका दिया गया।
वेदांता ने 8 नवंबर 2025 को एक सुधरा हुआ प्रस्ताव भी पेश किया था। इसमें अग्रिम नकद (अपफ्रंट कैश) को बढ़ाकर लगभग 6,563 करोड़ रुपये और इक्विटी निवेश को 800 करोड़ रुपये कर दिया गया था। कंपनी का कहना है कि इससे लेनदारों को ज्यादा बेहतर रिकवरी हासिल होती।
हालांकि, लेनदारों ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा है कि पूरी प्रक्रिया आईबीसी के सभी नियमों के अनुरूप थी। उनका तर्क है कि उच्चतम मूल्य की पेशकश करने के बावजूद किसी भी बोलीदाता को जीतने का गारंटीशुदा अधिकार नहीं मिल जाता है।
सीओसी ने दलील दी कि रेजोल्यूशन प्लान का मूल्यांकन केवल हेडलाइन वैल्यू या नेट प्रेजेंट वैल्यू पर नहीं होता, बल्कि अपफ्रंट कैश रिकवरी, व्यवहार्यता, लाभप्रदता और काम करने की क्षमता सहित कई कारकों पर किया जाता है।
उन्होंने बताया कि अडानी की योजना को इसलिए प्राथमिकता दी गई क्योंकि इसमें करीब 6,000 करोड़ रुपये का अग्रिम भुगतान और लगभग दो साल की तेज भुगतान समयसीमा की पेशकश की गई थी, जबकि वेदांता के प्रस्ताव में भुगतान को पांच साल तक की अवधि में बांटा गया था।
लेनदारों ने वेदांता के संशोधित प्रस्ताव को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह बोली प्रक्रिया बंद होने के बाद जमा किया गया था। उनका कहना था कि इसे स्वीकार करने के लिए सभी बोलीदाताओं के लिए प्रक्रिया को फिर से खोलना पड़ता, जो संभव नहीं था।
एनसीएलटी ने भी अपने 17 मार्च के आदेश में लेनदारों के फैसले को बरकरार रखा था। ट्रिब्यूनल ने यह दोहराया था कि सीओसी का व्यावसायिक विवेक सर्वोपरि है और जब तक कोई स्पष्ट कानूनी उल्लंघन न हो, तब तक इसमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है।
अडानी की योजना को वित्तीय लेनदारों से लगभग 93.8 प्रतिशत वोटिंग शेयर हासिल हुए थे, जो आवश्यक सीमा से काफी अधिक है। सबसे बड़े लेनदार नेशनल एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड (एनएआरसीएल) ने इस योजना का समर्थन करने में अहम भूमिका निभाई थी।
रेजोल्यूशन प्लान के अनुसार, अडानी एंटरप्राइजेज की बोली लगभग 14,543 करोड़ रुपये है। इसमें पूंजीगत व्यय और कार्यशील पूंजी के लिए रखे गए 800 करोड़ रुपये को मिलाने पर योजना का कुल मूल्य करीब 15,343 करोड़ रुपये हो जाता है। लगभग 60,637 करोड़ रुपये के स्वीकृत दावों के मुकाबले, यह करीब 24 प्रतिशत की रिकवरी दर्शाता है।
जयप्रकाश एसोसिएट्स एक बहुत ही महत्वपूर्ण और कीमती संपत्ति है। इसके पास नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे पर करीब 4,000 एकड़ का लैंड बैंक मौजूद है। इसमें जेपी ग्रीन्स और आगामी नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास जेपी इंटरनेशनल स्पोर्ट्स सिटी जैसी शानदार परियोजनाएं शामिल हैं।
इसके अलावा, कंपनी के पास कई नामी होटल, व्यावसायिक संपत्तियां और लगभग 6.5 मिलियन टन की भारी-भरकम सीमेंट क्षमता भी है। यही सभी संपत्तियां इसे बुनियादी ढांचा क्षेत्र के बड़े समूहों के लिए एक बेहद आकर्षक अधिग्रहण बनाती हैं।
वेदांता के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने 29 मार्च को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में कानूनी चुनौती का संकेत देते हुए कहा था कि कंपनी ‘सही मंच’ का दरवाजा खटखटाएगी। उन्होंने अपनी पोस्ट में यह भी जोड़ा था कि बोली आईबीसी के तहत एक सार्वजनिक नीलामी के जरिए आयोजित की गई थी, लेकिन वेदांता द्वारा सबसे ऊंची बोली लगाने से पहले ही कई बोलीदाता प्रक्रिया से पीछे हट गए थे।
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