चौथी शताब्दी में कौटिल्य (चाणक्य) द्वारा रचित ऐतिहासिक ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ इन दिनों गुजरात हाईकोर्ट में एक अनोखी कानूनी और अकादमिक बहस का केंद्र बन गया है। मंगलवार (7 अप्रैल) को अदालत में गुजरात लोक सेवा आयोग (जीपीएससी) के एक उम्मीदवार की याचिका पर अहम सुनवाई हुई। यह उम्मीदवार परीक्षा में पूछे गए एक विवादित प्रश्न के कारण भर्ती प्रक्रिया पास करने से मात्र एक अंक से चूक गया था।
जस्टिस निर्झर देसाई की पीठ इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई कर रही है। दरअसल, याचिकाकर्ता ने जीपीएससी की उस अंतिम उत्तर कुंजी (आंसर की) को अदालत में चुनौती दी है, जिसमें कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ से जुड़े एक बहुविकल्पीय प्रश्न का जवाब तय किया गया था।
प्रश्न में छात्रों को दो वाक्यों पर विचार करना था: पहला, यह पुस्तक संस्कृत भाषा में लिखी गई है, और दूसरा, यह अर्थशास्त्र की अवधारणा से संबंधित है। छात्र ने अपने जवाब में दोनों वाक्यों को सही माना था।
विवाद तब शुरू हुआ जब आयोग की आधिकारिक उत्तर कुंजी में छात्र के इस विकल्प को गलत ठहरा दिया गया। जीपीएससी का तर्क था कि केवल पहला वाक्य ही सही है कि यह पुस्तक संस्कृत में लिखी गई है।
इसके उलट, याचिकाकर्ता का स्पष्ट तौर पर यह दावा है कि ‘अर्थशास्त्र’ में अन्य विषयों के साथ-साथ अर्थव्यवस्था और राजकोषीय प्रबंधन के पहलुओं पर भी विस्तार से चर्चा की गई है, इसलिए प्रश्न पत्र में दिए गए दोनों ही वाक्य पूरी तरह से सही थे।
अदालत द्वारा 2 अप्रैल को दिए गए सख्त निर्देशों के बाद मंगलवार को सरकारी वकील जी.एच. विर्क ने जीपीएससी की ओर से अदालत में एक नया हलफनामा पेश किया।
आयोग ने अपने बचाव में कहा कि प्रश्न पत्र तैयार करने वाले विशेषज्ञ ने अपने अकादमिक ज्ञान और एक डिजिटल पीडीएफ के आधार पर यह सवाल बनाया था। हलफनामे में यह भी स्वीकार किया गया कि आयोग को यह नहीं पता कि वह पीडीएफ कहां से डाउनलोड की गई थी और न ही उनके पास इस पुस्तक की कोई मूल भौतिक प्रति उपलब्ध है।
सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि अध्ययन सामग्री की प्रामाणिकता तय करने के लिए आयोग के पास कोई लिखित नीति मौजूद नहीं है। ऐसे में किसी भी लिखित नीति के अभाव में डोमेन विशेषज्ञों की राय और अकादमिक ज्ञान पर ही भरोसा किया जाता है।
आयोग का कहना था कि ‘अर्थशास्त्र’ जैसी सदियों पुरानी और प्रतिष्ठित क्लासिक रचनाओं के मामले में किसी विशेष संस्करण पर निर्भर रहने के बजाय उसके व्यापक रूप से स्वीकृत अकादमिक अर्थ को ही आधार माना जाता है और इस मामले में अदालत द्वारा नियुक्त तटस्थ विशेषज्ञ ने भी जवाब की पुष्टि की है।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मेघा जानी ने आयोग के इन तर्कों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि विवादित प्रश्न की जांच करने वाले विशेषज्ञ की अपनी टिप्पणियों में भी यह जिक्र है कि ‘अर्थशास्त्र’ शासन, आर्थिक नीति, कानून, कर व्यवस्था और राजधर्म जैसे कई विषयों का एक व्यापक संकलन है।
जानी ने गुजरात शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (GCERT) और एनसीईआरटी (NCERT) की कक्षा 11 की पाठ्यपुस्तकों का हवाला देते हुए कहा कि इनमें भी अर्थशास्त्र को एक नीति और रणनीति के रूप में पढ़ाया जाता है, जो सीधे तौर पर छात्र के जवाब से मेल खाता है।
अधिवक्ता जानी ने यह भी उजागर किया कि जीपीएससी ने अपनी जानकारी के स्रोत के रूप में स्लाइडशेयर (Slideshare) जैसी ओपन-सोर्स वेबसाइटों और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म अमेज़ॅन का हवाला दिया है, जहां से 1915 के संस्करण की पीडीएफ ली गई थी।
उन्होंने तर्क दिया कि जब आयोग अपने हलफनामे में खुद यह मान रहा है कि अर्थशास्त्र इस ग्रंथ का एक हिस्सा है, तो केवल इसी स्वीकारोक्ति के आधार पर छात्र की याचिका स्वीकार की जानी चाहिए।
दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद अदालत ने जीपीएससी के वकील से बेहद कड़े सवाल किए। जस्टिस देसाई ने मौखिक रूप से पूछा कि क्या ‘अर्थशास्त्र’ 15 पुस्तकों या अध्यायों का एक ऐसा संकलन है, जिसमें अर्थशास्त्र भी शामिल है।
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि सवाल यह नहीं था कि यह किताब केवल अर्थशास्त्र पर है, तो आयोग की उत्तर कुंजी सही कैसे हो सकती है। तल्ख टिप्पणी करते हुए अदालत ने पूछा कि क्या आयोग अब कौटिल्य को ही गलत साबित करने का प्रयास कर रहा है।
इससे पहले मार्च और अप्रैल की पिछली सुनवाइयों (2, 18, 20 मार्च और 1 अप्रैल) के दौरान अदालत ने आयोग से मूल स्रोत पेश करने और उसकी प्रामाणिकता साबित करने का निर्देश दिया था। 2 अप्रैल को आयोग के हलफनामे से असंतुष्ट होकर जस्टिस देसाई ने जीपीएससी अधिकारियों के खिलाफ अवमानना कार्रवाई की कड़ी चेतावनी भी दी थी।
अब मंगलवार को सरकारी वकील की नई दलीलों के बाद अदालत ने याचिकाकर्ता को अपना जवाब लिखित रूप में जमा करने का निर्देश दिया है। इस पूरे मामले की अगली सुनवाई अब 16 अप्रैल को निर्धारित की गई है।
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