राजकोट। भुज के एक उपभोक्ता आयोग (कंज्यूमर फोरम) ने एक निजी बीमा कंपनी को फटकार लगाते हुए एक अहम फैसला सुनाया है। आयोग ने कंपनी को साल 2021 में कोरोना वायरस से जान गंवाने वाले 44 वर्षीय इंजीनियर की पत्नी को 50.05 लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है।
बीमा कंपनी ने तकनीकी आधार और महामारी की असाधारण परिस्थितियों को नजरअंदाज करते हुए इस जीवन बीमा दावे को खारिज कर दिया था।
मृतक प्रशांत दुधैया ने दिसंबर 2020 में यह जीवन बीमा पॉलिसी खरीदी थी। इससे करीब तीन महीने पहले ही उन्होंने एक निजी कंपनी में अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद 14 जून, 2021 को कोरोना संक्रमण के कारण उनका निधन हो गया।
प्रशांत की मौत के बाद बीमा कंपनी ने उनकी पत्नी के क्लेम को ठुकरा दिया। कंपनी ने तर्क दिया कि पॉलिसी खरीदते समय मृतक ने अपनी नौकरी और आय के बारे में गलत जानकारी दी थी।
बीमा फर्म की दलील थी कि प्रशांत ने खुद को एक वेतनभोगी कर्मचारी बताया था, जिसकी सालाना आय 4.68 लाख रुपये है। जबकि रिकॉर्ड बताते हैं कि प्रशांत ने अपने सीनियर इंजीनियर के पद से इस्तीफा दे दिया था और उनका आखिरी वर्किंग डे 10 सितंबर, 2020 था। यह तारीख पॉलिसी जारी होने से लगभग तीन महीने पहले की थी।
कंपनी के इस रवैये के बाद प्रशांत की पत्नी जिग्ना ने न्याय के लिए ‘जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग’ का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने फोरम को बताया कि उनके पति एक उच्च शिक्षित इंजीनियर थे और उन्होंने कोरोना काल के चरम पर अपनी मर्जी से नौकरी छोड़ी थी।
जिग्ना ने बताया कि उनके पति की नौकरी में ‘वर्क फ्रॉम होम’ का विकल्प नहीं था और उन्हें रोजाना साइट पर काम करने जाना पड़ता था। ऐसे में अपने परिवार को कोरोना वायरस के संक्रमण के खतरे से बचाने के लिए उन्होंने नौकरी छोड़ने का कठिन कदम उठाया था।
उन्होंने फोरम में यह भी तर्क दिया कि पुरानी नौकरी छोड़ने के बावजूद प्रशांत के पास फ्रीलांस इंजीनियरिंग असाइनमेंट लेने या अपना खुद का काम शुरू करने की पूरी पेशेवर योग्यता और विशेषज्ञता थी।
अपने दावे को मजबूती देने के लिए जिग्ना ने कई वर्षों के इनकम टैक्स रिटर्न (आईटीआर) और बैंक स्टेटमेंट भी आयोग के सामने पेश किए। इन दस्तावेजों के जरिए उन्होंने अपने पति की निरंतर आय के इतिहास और कमाने की क्षमता को साबित किया।
जिग्ना के वकील महेंद्र ठक्कर ने बताया कि आयोग ने पाया कि बीमा कंपनी ने केवल तत्कालीन रोजगार की स्थिति से जुड़े तकनीकी आधार पर क्लेम को खारिज कर दिया। कंपनी ने मृतक की योग्यता, उनकी कमाने की क्षमता और कोविड-19 महामारी के उस अभूतपूर्व वैश्विक संकट को पूरी तरह से नजरअंदाज किया।
फोरम ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि पॉलिसीधारक का कोई भी जानकारी छिपाने का गलत या दुर्भावनापूर्ण इरादा बिल्कुल नहीं था।
आयोग ने माना कि कंपनी ने मृतक की प्रमाणित कमाई क्षमता की अनदेखी की। इसके साथ ही, कोरोना महामारी की उन असाधारण परिस्थितियों को भी समझने में भूल की, जिसने कई पेशेवरों को अपनी नौकरी छोड़ने या अपने काम के तरीके बदलने पर मजबूर कर दिया था।
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