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ओडिशा हाई कोर्ट ने 501 रुपये के मोबाइल विवाद में मुकेश अंबानी के खिलाफ मामला किया खारिज

| Updated: April 10, 2026 11:51

23 साल पुराने इस मामूली मामले को हाई कोर्ट ने बताया न्याय प्रणाली का दुरुपयोग, बार-बार मुकदमा दायर करने वाले याचिकाकर्ता को लगाई कड़ी फटकार।

उड़ीसा हाई कोर्ट ने रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) और इसके चेयरमैन मुकेश अंबानी के खिलाफ एक आपराधिक शिकायत को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि दो दशक पहले खरीदे गए महज 501 रुपये के मोबाइल हैंडसेट से जुड़ा यह मामला आपराधिक न्याय प्रणाली का सरासर दुरुपयोग है।

मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस एस.के. पाणिग्रही ने राउरकेला के रहने वाले शिकायतकर्ता प्रफुल्ल कुमार मिश्रा पर 1,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया। जज ने निर्देश दिया कि यह जुर्माना राशि चार सप्ताह के भीतर ओडिशा राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के किशोर न्याय कोष में जमा की जानी चाहिए।

यह पूरा विवाद साल 2003 का है, जब मिश्रा ने तत्कालीन रिलायंस इन्फोकॉम द्वारा शुरू की गई एक टेलीकॉम योजना ली थी। उस समय 501 रुपये के शुरुआती भुगतान और मासिक किश्तों की शर्त पर उन्हें एक स्थानीय डीलर से मोबाइल हैंडसेट मिला था।

बाद में मिश्रा ने आरोप लगाया कि उन्हें दिया गया डिवाइस और टेलीकॉम सेवाएं दोनों ही बेहद घटिया स्तर की थीं। इसी बात को लेकर उन्होंने उस समय टेलीकॉम वेंचर के प्रमुख रहे मुकेश अंबानी के खिलाफ आपराधिक मुकदमा शुरू कर दिया था।

हाई कोर्ट का यह आदेश 31 मार्च को पारित हुआ और बुधवार को ऑनलाइन प्रकाशित किया गया। फैसले में सामने आया कि समान तथ्यों के आधार पर आपराधिक कार्रवाई आगे बढ़ाने का शिकायतकर्ता का यह चौथा प्रयास था।

इससे पहले 2003 और 2004 में दायर की गई शिकायतों को हाई कोर्ट क्रमशः 2004 और 2005 में ही खारिज कर चुका था। यहां तक कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी 2007 में इससे जुड़ी विशेष अनुमति याचिकाओं को नामंजूर कर दिया था।

जस्टिस पाणिग्रही ने निचली अदालत के रवैये पर भी गहरी चिंता व्यक्त की। पानपोश के सब-डिविजनल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (SDJM) ने 27 जनवरी को समन जारी किया था। हाई कोर्ट ने इस कदम की आलोचना करते हुए कहा कि इसमें उचित न्यायिक जांच का अभाव था।

अदालत ने टिप्पणी की कि लेनदेन की इतनी पुरानी अवधि और उसकी मामूली कीमत को देखते हुए मजिस्ट्रेट को अधिक सतर्कता बरतनी चाहिए थी। फैसले में इस बात पर जोर दिया गया कि बीस साल पुरानी उपभोक्ता शिकायत, जिसमें इतनी छोटी सी रकम शामिल हो, उसके लिए देश के एक बड़े उद्योगपति को आरोपी के रूप में समन भेजना बिल्कुल अनुचित है।

अदालत ने माना कि 2003 में अपनी मोबाइल सेवा के संबंध में मिश्रा की शिकायत जायज हो सकती थी, लेकिन ऐसे विवादों के लिए दंड संहिता के इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति जताई गई।

जस्टिस पाणिग्रही ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की शिकायत चाहे कितनी भी गहरी क्यों न हो, यह उसे उन लोगों के खिलाफ आपराधिक कानून को हथियार बनाने का अधिकार नहीं देती है, जिन्हें पहले ही किसी भी आपराधिक दायित्व से मुक्त पाया जा चुका है।

अदालत का यह फैसला बेबुनियाद मुकदमों को बार-बार खींचने की प्रवृत्ति के खिलाफ एक कड़ी चेतावनी है। हाई कोर्ट ने यह भी संज्ञान लिया कि पिछले 23 वर्षों में अदालतों द्वारा बार-बार अभियोजन का कोई आधार न पाए जाने के बावजूद, इस कार्यवाही को अलग-अलग रूपों में जारी रखा गया। इससे अदालत का बहुत सारा कीमती समय बर्बाद हुआ।

अंततः समन और लंबित मामले को खारिज करते हुए, हाई कोर्ट ने एक उपभोक्ता उपकरण पर चल रही राज्य की सबसे लंबी कानूनी लड़ाइयों में से एक का हमेशा के लिए अंत कर दिया है।

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