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परिसीमन विधेयक: क्या बदल जाएगा देश का चुनावी नक्शा?

| Updated: April 16, 2026 13:48

लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़कर 850 होने पर किस राज्य को होगा फायदा और किसे नुकसान? जानिए असम और जम्मू-कश्मीर के मॉडल पर आधारित 'गेरीमैंडरिंग' की पूरी चुनावी रणनीति।

नरेंद्र मोदी सरकार जल्द ही संसद में परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) पेश करने की तैयारी में है। इस कदम के तहत चुनाव क्षेत्रों की भौगोलिक सीमाएं फिर से तय की जाएंगी। इसके लागू होने पर लोकसभा सीटों की कुल संख्या 543 से बढ़कर 850 हो जाएगी। नवीनतम जनगणना के आधार पर हर राज्य में सीटों की कुल संख्या में भी महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिलेगा।

अब तक देश के केवल एक राज्य असम और एक केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में ही लोकसभा और विधानसभा सीटों का परिसीमन पूरा हुआ है। इन दोनों जगहों पर अपनाई गई प्रक्रिया इस बात का स्पष्ट संकेत देती है कि राष्ट्रीय स्तर पर इसका क्या स्वरूप हो सकता है।

यह पूरी कवायद दो मुख्य रणनीतियों के इर्द-गिर्द घूमती दिखती है, जिससे अंततः सत्तारूढ़ दल को फायदा पहुंच सकता है। इसमें आबादी के आंकड़ों का चयनात्मक उपयोग और सीटों की ‘गेरीमैंडरिंग’ (Gerrymandering) शामिल हैं।

आबादी के आंकड़ों का चयनात्मक इस्तेमाल

सीटों की सीमाएं बदलने के लिए असम और जम्मू-कश्मीर में अलग-अलग मानक अपनाए गए। जम्मू-कश्मीर में जनसंख्या को आधार बनाकर मुस्लिम बहुल कश्मीर क्षेत्र की सीटों का अनुपात घटाया गया, जबकि हिंदू बहुल जम्मू क्षेत्र का अनुपात बढ़ा दिया गया। अनंतनाग लोकसभा सीट का उदाहरण इसे स्पष्ट करता है। यहां आबादी का हिस्सा कम किया गया और जम्मू के मुस्लिम बहुल इलाकों को इसमें जोड़ दिया गया। यह तब किया गया, जबकि इन दोनों क्षेत्रों के बीच पूरी पीर पंजाल पर्वत श्रृंखला मौजूद है।

दूसरी ओर असम में अधिक आबादी होने के बावजूद मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के लिए सीटें कम कर दी गईं। परिसीमन विधेयक के तहत विभिन्न राज्यों को सीटें आवंटित करने के लिए जनसंख्या पर आधारित इसी जम्मू-कश्मीर मॉडल का इस्तेमाल होने की प्रबल संभावना है।

इसके परिणामस्वरूप दक्षिणी राज्यों में सीटों का कुल अनुपात कम हो जाएगा। दिलचस्प बात यह है कि ये वही राज्य हैं जहां भाजपा का चुनावी प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहता है। इसके विपरीत, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे हिंदी भाषी राज्यों में सीटों का अनुपात काफी बढ़ जाएगा।

आंकड़ों और कुछ प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के आकलन पर गौर करें, तो 543 सदस्यीय मौजूदा लोकसभा में उत्तर प्रदेश के पास 80 सीटें हैं। नई 850 सदस्यीय लोकसभा में आनुपातिक रूप से यूपी के पास 125 सीटें होनी चाहिए थीं, लेकिन उच्च जनसंख्या वृद्धि दर के कारण अब वहां 138 सीटें होंगी। इसी तरह बिहार, जहां 62 सीटें होनी चाहिए थीं, वहां अब 72 सीटें होंगी। राजस्थान को 39 के बजाय 47 सीटें मिलेंगी।

इसके ठीक विपरीत, सीटों की बढ़ी हुई संख्या वाली लोकसभा में तमिलनाडु के पास 61 सीटें होनी चाहिए थीं, लेकिन उसे केवल 50 सीटें ही मिलेंगी। केरल के पास 31 के बजाय 23 और आंध्र प्रदेश के पास 39 के बजाय केवल 34 सीटें रह जाएंगी।

सीटों की गेरीमैंडरिंग (Gerrymandering) का खेल

लोकतंत्र का सबसे बुनियादी सिद्धांत ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ है। परिसीमन के संदर्भ में इसका सीधा मतलब यह है कि हर सीट पर मतदाताओं की संख्या लगभग समान होनी चाहिए। यदि समान विभाजन का सिद्धांत ईमानदारी से लागू होता, तो असम की प्रत्येक लोकसभा सीट पर औसतन 17.5 लाख मतदाता होने चाहिए थे। लेकिन मुस्लिम बहुल धुबरी सीट पर लगभग 10 लाख अतिरिक्त मतदाता जोड़ दिए गए। इसका अर्थ यह हुआ कि धुबरी में एक वोट का मूल्य असम की अन्य सीटों की तुलना में काफी कम हो गया है।

धुबरी में जोड़े गए ये 10 लाख अतिरिक्त मतदाता पहले बारपेटा सीट का हिस्सा हुआ करते थे। इस पूरी रणनीति के तहत बारपेटा के मुस्लिम बहुल इलाकों को धुबरी में स्थानांतरित कर दिया गया। इस एक कदम से बारपेटा रातों-रात एक हिंदू बहुल सीट बन गई। जब चुनाव परिणाम आए, तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि एनडीए (NDA) ने पहली बार यह सीट आसानी से जीत ली।

असम में सीटों का यह नया बंटवारा भौगोलिक या जनसांख्यिकीय किसी भी दृष्टिकोण से तार्किक प्रतीत नहीं होता। सूचना सुरक्षा और कानूनी विशेषज्ञ श्रीनिवास कोडाली ने भी इस विभाजन की विसंगतियों को विस्तार से रेखांकित किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार ने अपने राजनीतिक समीकरणों को साधने के लिए ही सीटों का बंटवारा किया है। इसे अमेरिकी राजनीति की एक बेहद अहम अवधारणा ‘गेरीमैंडरिंग’ के जरिए आसानी से समझा जा सकता है।

गेरीमैंडरिंग किसी एक राजनीतिक दल या समूह को अनुचित चुनावी लाभ पहुंचाने के लिए चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं में जानबूझकर किया गया हेरफेर है। इसके परिणामस्वरूप अक्सर अजीबोगरीब आकार वाले चुनावी क्षेत्र बन जाते हैं। असम की सीटों का नया नक्शा इस रणनीति का एक सटीक और क्लासिक उदाहरण पेश करता है।

पैकिंग और क्रैकिंग की दोहरी रणनीति

गेरीमैंडरिंग के मुख्य रूप से दो घटक होते हैं जिन्हें पैकिंग और क्रैकिंग कहा जाता है। पैकिंग का अर्थ है विपक्षी मतदाताओं को बड़ी संख्या में कुछ ही सीटों पर समेट देना। इससे होता यह है कि विपक्षी दल उन विशिष्ट सीटों को तो भारी अंतर से जीत लेता है, लेकिन बाकी हर जगह उसे हार का सामना करना पड़ता है। असम की धुबरी सीट ‘पैकिंग’ का एक बेहतरीन उदाहरण है।

वहीं ‘क्रैकिंग’ की रणनीति के तहत विपक्षी मतदाताओं को एक जगह रखने के बजाय कई सीटों पर बिखेर दिया जाता है। ऐसा करके सत्ताधारी दल ज्यादा से ज्यादा जिलों में अपना स्पष्ट बहुमत बनाए रखने में सफल होता है। बारपेटा लोकसभा सीट इसी ‘क्रैकिंग’ का नतीजा है।

जम्मू-कश्मीर के पूर्व शिक्षा मंत्री नईम अख्तर ने एक साक्षात्कार के दौरान कहा था कि जम्मू-कश्मीर और असम का परिसीमन एक ही आयोग द्वारा किया गया था। उनका स्पष्ट मानना है कि एक समुदाय के चुनावी मूल्य को दूसरे समुदाय के मुकाबले कम करना ही दोनों जगहों के लिए एकमात्र बुनियादी नियम था, जो एक तरह का स्थायी अशक्तीकरण है।

विपक्ष के खिलाफ एक सुनियोजित चक्रव्यूह

कुल मिलाकर राजनीतिक विश्लेषक परिसीमन को विपक्ष के खिलाफ एक तीन-चरणीय रणनीति के रूप में देख रहे हैं।

पहला चरण:

इसके तहत दक्षिणी राज्यों में सीटों का अनुपात कम कर दिया जाएगा। इन राज्यों को एक तरह से पिछली केंद्र सरकारों द्वारा शुरू किए गए परिवार नियोजन कार्यक्रमों को बेहतर ढंग से लागू करने की सजा मिलेगी। आम आदमी पार्टी के विधायक गैरी बिड़िंग ने भी एक लेख में तर्क दिया था कि परिसीमन से पंजाब को भी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

कश्मीर क्षेत्र में यह जनसांख्यिकीय प्रयोग पहले ही देखा जा चुका है। चाहे दक्षिण हो, पंजाब हो या कश्मीर, ये सभी वो क्षेत्र हैं जहां भाजपा की राजनीतिक पकड़ कमजोर है। इन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व कम करने के लिए जनसंख्या को एक अचूक पैमाने के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा।

दूसरा चरण:

इस चरण में आबादी और जनगणना के आंकड़ों का अपनी सुविधा के अनुसार चयनात्मक उपयोग किया जाता है। असम में सरकार ने नवीनतम आंकड़ों के बजाय 2001 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करवाया। इसके पीछे “छोटे समुदायों की रक्षा” करने का तर्क सामने रखा गया। संयोग से ये वे समुदाय हैं जिन्होंने पिछले कुछ चुनावों में लगातार भाजपा के पक्ष में मतदान किया है।

इस दृष्टिकोण का इस्तेमाल दक्षिण या पंजाब जैसे भाषाई अल्पसंख्यक राज्यों के हितों को सुरक्षित करने के लिए भी किया जा सकता था, जिन्हें नवीनतम जनसंख्या आंकड़ों के कारण नुकसान उठाना पड़ेगा। लेकिन सरकार ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया। यह स्पष्ट करता है कि जनसंख्या को मानदंड बनाने और जनगणना के वर्ष का चुनाव पूरी तरह से उस तरीके से किया जा रहा है जिससे सत्ता पक्ष को लाभ मिले।

तीसरा चरण:

इस अंतिम चरण में गेरीमैंडरिंग, पैकिंग और क्रैकिंग का खुलकर सहारा लिया जाता है। असम और जम्मू-कश्मीर की तर्ज पर अन्य राज्यों में भी सीटों को इस तरह विभाजित किए जाने की पूरी संभावना है कि विपक्षी मतदाता कम संख्या वाली सीटों पर केंद्रित हो जाएं। इसका सीधा असर यह होगा कि अधिक संख्या वाली सीटों पर उनका प्रभाव पूरी तरह से नगण्य हो जाएगा।

निष्कर्ष

व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारतीय चुनावी प्रक्रिया का हर चरण अब संभावित हेरफेर के प्रति संवेदनशील हो चुका है। सीटों का आवंटन, चुनाव सीमाओं का निर्धारण, मतदाता सूची की तैयारी और मतदान अधिकारियों की तैनाती को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं।

इसके अलावा आदर्श आचार संहिता का अप्रभावी कार्यान्वयन और मतदान के दिन डराने-धमकाने जैसी घटनाएं भी गंभीर चिंता का विषय हैं। और यह सब उस समय है जब हमने अभी तक राजनीतिक वित्तपोषण (पॉलिटिकल फंडिंग) के सबसे जटिल और पारदर्शी मुद्दे पर चर्चा शुरू ही नहीं की है।

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