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गुजरात: शब्दों की जगह चित्रों ने की बात, 14 साल के मूक-बधिर किशोर को 7 महीने बाद मिला परिवार

| Updated: April 17, 2026 15:04

वडोदरा रेलवे स्टेशन पर भटके 14 वर्षीय मूक-बधिर किशोर ने राजस्थानी शैली की चित्रकारी और 'स्टैच्यू ऑफ बिलीफ' की पहचान के जरिए पुलिस को दिखाया अपने घर का रास्ता।

वडोदरा। कहते हैं कि जज्बात व्यक्त करने के लिए हमेशा शब्दों की जरूरत नहीं होती। इसे सच कर दिखाया है एक 14 साल के मूक-बधिर किशोर ने, जिसकी चित्रकारी ने उसे 7 महीने बाद राजस्थान में अपने परिवार से मिला दिया। अपने बेटे के लौटने की आस में उसके माता-पिता ने दिन में केवल एक बार खाना खाने और खाली पेट सोने का प्रण ले लिया था।

राजदीप (बदला हुआ नाम) का परिवार मिट्टी के बर्तन बनाने और छोटे स्तर पर खेती कर अपना गुजारा करता है। पिछले साल 17 अक्टूबर को रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) ने उसे वडोदरा रेलवे स्टेशन पर भटकते हुए पाया था। इसके बाद बेसहारा मिले इस किशोर को दीपक फाउंडेशन चिल्ड्रंस होम में आश्रय दिया गया।

किशोर के मूक-बधिर होने और पढ़ने-लिखने में असमर्थ होने के कारण उसके मूल निवास के बारे में जानकारी निकालना एक बहुत बड़ी चुनौती थी। प्रशिक्षित शिक्षकों की मदद से अधिकारियों ने उसके साथ संवाद करना शुरू किया। इसी दौरान उन्हें राजदीप की चित्रकारी के शौक के बारे में पता चला, जिसमें एक अलग तरह की राजस्थानी शैली की झलक थी।

उसके हर एक स्केच में परिचित रंगों, आकृतियों और उन परंपराओं का समावेश था जो उसके घर से जुड़ी थीं, भले ही वह उसका नाम नहीं बता पा रहा था। ये चित्र विशेष रूप से नाथद्वारा क्षेत्र की याद दिलाते थे। धीरे-धीरे इन्हीं चित्रों ने एक सुराग का काम किया और अधिकारियों को दूसरे राज्य तक ले जाकर उसके परिवार से मिलाने का रास्ता साफ किया।

उसके घर का सटीक पता लगाने के लिए अधिकारियों ने उसे राजस्थान के विभिन्न स्थानों और प्रसिद्ध जगहों की तस्वीरें दिखाईं। हालांकि वह ज्यादातर जगहों को नहीं पहचान सका, लेकिन उसने तुरंत नाथद्वारा में स्थित भगवान शिव की एक प्रमुख आधुनिक प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ बिलीफ’ को पहचान लिया।

इस अहम सुराग के आधार पर बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) ने नाथद्वारा पुलिस से संपर्क किया। पुलिस ने इस खोज अभियान में मदद के लिए सहायक उप-निरीक्षक (एएसआई) उदय सिंह को नियुक्त किया।

इसके बाद काउंसलर संध्या सपकाल, सीडब्ल्यूसी के एक कर्मचारी और राजदीप इस सप्ताह की शुरुआत में नाथद्वारा पहुंचे। एएसआई सिंह के साथ मिलकर उन्होंने एक ही दिन में करीब 10 गांवों का दौरा किया, इस उम्मीद में कि शायद बच्चा कुछ पहचान ले।

उनकी यह मेहनत 15 अप्रैल को अप्रत्याशित रूप से रंग लाई। इलाके से गुजरते समय राजदीप ने मोटरसाइकिल पर जा रहे एक जोड़े को देखा और बेहद उत्साह में अपनी टीम को उनके पीछे चलने का इशारा किया। एएसआई सिंह ने जब उस जोड़े को रोका, तो वे पहले थोड़ा झिझके, लेकिन बच्चे को देखते ही उनका भाव पूरी तरह बदल गया। दरअसल, वे राजदीप के पिता के रिश्तेदार थे।

इसके तुरंत बाद यह टीम राजदीप के गांव पहुंची, जहां एक बेहद भावुक कर देने वाला मिलन हुआ। उसके माता-पिता ने बताया कि वे महीनों से उसे खोज रहे थे और उदयपुर के मावली पुलिस स्टेशन में उसकी गुमशुदगी की शिकायत भी दर्ज कराई थी।

पुलिस की पूछताछ में यह बात सामने आई कि राजदीप घर में हुए किसी मामूली विवाद के बाद वहां से निकल गया था। उसके इस एक कदम ने अनिश्चितता का एक लंबा सफर शुरू कर दिया था, लेकिन आखिरकार उसकी वह चित्रकारी ही उसे अपने घर वापस खींच लाई, जिसे बनाना उसने कभी नहीं छोड़ा था।

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