राजनीतिक रूप से अलग-अलग विचार होना आजकल रिश्तों में दरार की एक नई और बड़ी वजह बन गया है।
आइए मीरा और भरत से मिलते हैं। वे दोनों मेरे क्लिनिक में बैठे हैं। हम उनकी शादी को बचाने की संभावना तलाशने के लिए दो दिन की गहन काउंसलिंग शुरू करने वाले हैं।
बातचीत में मुझे पता चलता है कि उनके सात साल से कम उम्र के तीन बच्चे हैं। मीरा एक होममेकर हैं और भरत पेशे से वकील हैं।
पंद्रह साल पहले इटली की यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात हुई थी। दोनों को एक-दूसरे से बेतहाशा प्यार हुआ और जल्द ही उन्होंने शादी कर ली। दोनों ही इसे पहली नज़र का प्यार मानते हैं।
उनके बीच कई समानताएं थीं। यात्रा का शौक, संगीत में दिलचस्पी, कला से लगाव और अच्छे खान-पान का शौक उन्हें करीब लाता था। इसके अलावा दोनों को ही घर से बाहर घूमना-फिरना बेहद पसंद था।
वे कहते हैं कि बाकी सब तो जैसे एक खूबसूरत इतिहास है।
लेकिन आज की हकीकत बिल्कुल अलग है।
मीरा का कहना है कि वह गंभीरता से तलाक के बारे में सोच रही हैं क्योंकि वे अब हर समय लड़ते रहते हैं। जब मैंने उनसे इस टकराव की मुख्य वजह पूछी, तो उनका जवाब था कि वे राजनीति पर बहुत तीखी बहस करते हैं।
मीरा ने बताया कि वह अक्सर सोचती हैं कि क्या वह ऐसे इंसान के साथ रह सकती हैं जिसके बुनियादी विचार उनसे इतने अलग हों। नौबत यहां तक आ गई है कि उन्हें यकीन ही नहीं होता कि यह वही शख्स है जिससे उन्होंने शादी की थी। वह अब भरत को पहचान नहीं पातीं।
अब मैं आपको कविता और जतिन की कहानी बताती हूं। हालांकि एक अफेयर के कारण उनके रिश्ते को सुधारने की सख्त जरूरत थी, लेकिन हमारी दो दिन की काउंसलिंग का एक बड़ा हिस्सा जतिन के परिवार से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित रहा।
जतिन की परवरिश एक राजनीतिक रूप से रूढ़िवादी परिवार में हुई थी। लेकिन जब वह कॉलेज गया, तो दुनिया को देखने का उसका नज़रिया बदल गया। वह अपने माता-पिता और भाई-बहनों की तुलना में काफी उदार विचारों वाला बन गया।
पिछले कुछ वर्षों में उनके राजनीतिक विचारों का यह अंतर और भी गहरा हो गया। नतीजतन, पारिवारिक मुलाकातों में अक्सर कड़वाहट पैदा होने लगी।
कविता को इस बात से सख्त चिढ़ थी कि जतिन के माता-पिता पारिवारिक डिनर के दौरान भी राजनीतिक बहस करने से बाज नहीं आते थे। वह नहीं चाहती थी कि उनके बच्चों पर जतिन के माता-पिता के राजनीतिक विचारों का कोई प्रभाव पड़े। भोजन के समय होने वाला तनाव भी उसे बिल्कुल पसंद नहीं था।
कविता ने इस बात पर जोर दिया कि वह और जतिन उसके माता-पिता से मिलना बंद कर दें। उसने यह भी तय कर दिया कि बच्चों का भी अपने दादा-दादी से कोई रिश्ता नहीं रहेगा।
हालांकि जतिन अपने माता-पिता से प्यार करता था और राजनीति के प्रति उनके जुनूनी रवैये को नापसंद भी करता था, फिर भी उसने कविता की बात मान ली।
और इस तरह जतिन, उसकी पत्नी, बच्चों और उस परिवार के बीच का रिश्ता हमेशा के लिए खत्म हो गया जिसमें वह पला-बढ़ा था और जिससे वह बहुत प्यार करता था।
चार दशकों से अधिक समय तक एक थेरेपिस्ट के रूप में काम करने के बाद, मैं पूरे यकीन के साथ कह सकती हूं कि राजनीतिक ध्रुवीकरण के कारण महत्वपूर्ण रिश्तों को खत्म करने वाले लोगों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है।
मुझे व्यक्तिगत रूप से यह स्थिति बेहद दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण लगती है।
सच कहूं तो कई बार यह देखकर मेरा दिल टूट जाता है।
वे दिन लद गए जब लोग शांति और सम्मान के साथ विचारों के मतभेद पर चर्चा कर सकते थे। या फिर जब बहस तीखी भी हो जाती थी, तो भी कोई रिश्ते को हमेशा के लिए खत्म करने की योजना नहीं बनाता था।
वे महज़ असहमतियां हुआ करती थीं। लोग बस यही सोचकर बात खत्म कर देते थे कि शायद उनके माता-पिता या सामने वाले को उनकी बात समझ नहीं आ रही है।
लेकिन आज के समय में, जब लोगों के नज़रिए अलग होते हैं, तो ऐसा लगता है कि जो बात कभी सिर्फ एक नासमझी मानी जाती थी, उसे अब उस व्यक्ति के चरित्र की सबसे बड़ी खामी मान लिया जाता है।
अगर सीधे शब्दों में कहूं तो, जो कोई भी आपसे असहमत है, वह आपके लिए एक बेवकूफ, नासमझ और बिना जानकारी वाला इंसान बन जाता है। आपको लगता है कि स्वतंत्र सोच रखने के बजाय वह बस किसी पंथ की तरह आंख बंद करके भीड़ के पीछे चल रहा है।
एक बार जब आप यह तय कर लेते हैं कि आपसे असहमत होने वाले लोग आपके दुश्मन हैं, तो उन्हें अपनी ज़िंदगी से बाहर निकाल फेंकना ही आपको अगला सही कदम लगने लगता है।
हालांकि, ऐसा होना बिल्कुल भी जरूरी नहीं है।
चलिए वापस मीरा और भरत की कहानी पर चलते हैं।
यह सच था कि वर्तमान घटनाओं को लेकर उनकी मान्यताओं में काफी अंतर था। लेकिन मेरी मदद से जब हमने गहराई से देखा, तो उनके विचारों में कुछ समानताएं भी मौजूद थीं।
मीरा और भरत इस बात पर इसलिए ध्यान नहीं दे पाए थे क्योंकि वे बातचीत के दौरान बहुत जल्दी उग्र हो जाते थे। इस वजह से उनके स्वभाव का सबसे आक्रामक पहलू ही एक-दूसरे के सामने आता था।
सहमति के उन छोटे-छोटे बिंदुओं को पहचानना उनके लिए किसी मरहम की तरह था।
इसके अलावा, जब मीरा ने भरत के बुनियादी मूल्यों पर सवाल उठाया, तो मैंने हमारी बातचीत का रुख उनके रिश्ते के उन हिस्सों की ओर मोड़ दिया जहां वे एक बेहतरीन टीम की तरह काम करते थे।
हालांकि मीरा और भरत ने माना कि उनके रिश्ते में कई अच्छी बातें भी थीं, लेकिन कई जोड़ों की तरह वे भी अपनी इन खूबियों को हल्के में ले रहे थे।
यह उनकी बहुत बड़ी गलती थी।
उनके वैवाहिक जीवन के जो हिस्से मज़बूत थे, वे उन दोनों के लिए बेहद मायने रखते थे। दोनों अपने बच्चों से बेइंतहा प्यार करते थे। वे एक-दूसरे को बेहतरीन माता-पिता मानते थे। परिवार के महत्वपूर्ण फैसलों में वे एक-दूसरे की राय का सम्मान करते थे और दोनों को ही एक-दूसरे के परिवारों से भी बहुत लगाव था।
यह सूची काफी लंबी थी।
मैंने उन्हें यह देखने में मदद की कि उनकी मुख्य आपत्तियां केवल राजनीतिक मतभेदों तक ही सीमित थीं। हालांकि ये मतभेद चुनौतीपूर्ण थे, फिर भी मैंने उन्हें यह अहसास दिलाया कि उनके बुनियादी मूल्यों में उनकी राजनीतिक विचारधारा से कहीं ज्यादा बातें शामिल हैं।
इससे उन्हें एक-दूसरे को अपनी बात मनवाने की उस दर्दनाक आदत को खत्म करने में मदद मिली। इसके बजाय उन्होंने या तो असहमत होने पर सहमति जताई, या फिर उन बेवजह की बहसों से पूरी तरह बचना सीख लिया जिनका कोई नतीजा नहीं निकलता था।
इसमें कोई शक नहीं कि आज हम एक देश के रूप में चुनौतीपूर्ण समय से गुज़र रहे हैं।
लेकिन यह समय हमें रिश्तों की इन मुश्किल चुनौतियों का सामना करना भी सिखाता है, न कि किसी असहमति के कारण लोगों से हमेशा के लिए रिश्ता तोड़ लेना।
मैं इन चुनौतियों को बहुत करीब से जानती हूं। मेरी अपनी शादी भी दो अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं का संगम है। मैं और मेरे पति 50 से अधिक वर्षों से एक साथ हैं।
मैं आपसे झूठ नहीं बोलूंगी।
ऐसे कई दिन आते हैं जब मैं दिल से चाहती हूं कि हम दोनों की राजनीतिक सोच एक जैसी हो जाए।
लेकिन क्या इसके बदले में मैं हमारे इतने लंबे साथ, बच्चों के प्रति हमारे प्यार, पोते-पोतियों को बड़ा होते देखने की खुशी या जीवन के इस आखिरी पड़ाव में एक-दूसरे के साथ को छोड़ना चाहूंगी?
मेरा जवाब है- बिल्कुल नहीं!
नोट- लेखिका एक Divorce Busting हैं.
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