अहमदाबाद: द्वारका शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित गोपी तालाब की पीली मिट्टी को दुनियाभर में ‘गोपी चंदन’ के नाम से जाना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण के भक्त प्राचीन काल से ही इस विशेष मिट्टी को अत्यंत पूजनीय मानते आए हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, वृंदावन की गोपियां भगवान कृष्ण से मिलने द्वारका आई थीं और अंततः वे इसी भूमि की मिट्टी में विलीन हो गईं।
यही कारण है कि यह मिट्टी अनंत काल के लिए पवित्र मानी जाती है। अब इस पावन माटी को औपचारिक और कानूनी पहचान दिलाने की कवायद शुरू कर दी गई है।
इस सप्ताह की शुरुआत में गुजरात विज्ञान और प्रौद्योगिकी परिषद (GUJCOST) ने गोपी चंदन के लिए भौगोलिक संकेत (GI) टैग की मांग की है। इसके लिए केंद्र सरकार के उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (DPIIT) के तहत आने वाली ‘भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री’ में बकायदा आवेदन किया गया है।
सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व
अधिकारियों का कहना है कि राज्य का यह पहला धार्मिक-सामाजिक उत्पाद है जिसके लिए गुज्कोस्ट ने जीआई टैग हासिल करने की प्रक्रिया शुरू की है। इससे पहले यह एजेंसी सांखेड़ा के लकड़ी के फर्नीचर, वलसाडी चीकू, खंभाती अकीक (एगेट) और कच्छी कढ़ाई जैसे कई अन्य उत्पादों के लिए जीआई टैग सफलतापूर्वक प्राप्त कर चुकी है।
जीआई आवेदन में प्राचीन ग्रंथों की प्रामाणिकता का भी विशेष रूप से हवाला दिया गया है। आवेदन पत्र में बताया गया है कि ‘पद्म पुराण’ और ‘स्कंद पुराण’ जैसे प्राचीन शास्त्रों में द्वारका के गोपी चंदन को बेहद पवित्र माना गया है।
द्वारका आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए यह सिर्फ एक सामान्य उत्पाद नहीं है, बल्कि यह उनकी अटूट भक्ति, आस्था और आध्यात्मिक पहचान का एक अहम प्रतीक है। यह भारत की जीवंत परंपराओं और अमूर्त सांस्कृतिक विरासत को और अधिक मजबूत बनाता है।
अनूठी रासायनिक पहचान और पारंपरिक निर्माण प्रक्रिया
हर साल टनों की संख्या में इस पवित्र मिट्टी को तैयार किया जाता है और दुनियाभर के वैष्णव भक्तों को बेचा जाता है। श्रद्धालु बड़े ही प्रेम से इसे भगवान कृष्ण की मूर्तियों पर लगाते हैं और अपने माथे पर तिलक के रूप में धारण करते हैं।
आवेदन के अनुसार, इस मिट्टी में डोलोमाइट, क्वार्ट्ज, काओलिनाइट और मस्कोवाइट जैसे खनिजों का एक विशेष मिश्रण पाया जाता है, जो इसे एक अनूठी रासायनिक पहचान प्रदान करता है।
यह आवेदन इस बात पर भी जोर देता है कि यह उत्पाद सीधे तौर पर एक विशिष्ट स्थान (गोपी तालाब) से जुड़ा है। यह प्राकृतिक रूप से पाया जाता है और इसमें कई औषधीय गुण भी मौजूद हैं।
सदियों पुरानी इस भक्ति परंपरा से जुड़ी मिट्टी को तैयार करने में आज भी छानना, भिगोना, गूंधना, आकार देना और धूप में सुखाना जैसी पारंपरिक मानवीय तकनीकों का इस्तेमाल होता है। वर्तमान में लगभग 20 स्थानीय कारीगर परिवार इस पूरी प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं, जिन्हें इस पारंपरिक ज्ञान का असली संरक्षक माना जाता है।
करोड़ों का कारोबार और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में कदम
आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो इसका वार्षिक उत्पादन लगभग 10 मीट्रिक टन है, जिससे 2 करोड़ रुपये से लेकर 5 करोड़ रुपये तक का सालाना कारोबार होता है। एक अनुमान के मुताबिक, लाखों श्रद्धालु मंदिरों, तीर्थयात्रा मार्गों और स्थानीय बाजारों के माध्यम से इस गोपी चंदन की खरीदारी करते हैं।
गुज्कोस्ट के सलाहकार डॉ. नरोत्तम साहू ने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि यह पहल विज्ञान, परंपरा और नवाचार को समाज के साथ जोड़ने का एक अहम कदम है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में भी एक बड़ा प्रयास है, जो वैज्ञानिक मान्यता के साथ-साथ टिकाऊ आजीविका और सांस्कृतिक संरक्षण सुनिश्चित करता है।
डॉ. साहू ने अपनी बात को खत्म करते हुए कहा कि गोपी चंदन आस्था, परंपरा, विज्ञान और आजीविका का एक दुर्लभ संगम है। इसे जीआई प्रमाणन मिलना न केवल एक कानूनी कदम साबित होगा, बल्कि यह हमारी पवित्र विरासत को सहेजने और सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा देने की एक मजबूत राष्ट्रीय प्रतिबद्धता भी होगी।
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