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भारत ने सोने पर आयात शुल्क क्यों बढ़ाया और आम आदमी पर इसका क्या असर होगा?

| Updated: May 13, 2026 12:56

सरकार ने सोने पर आयात शुल्क (इंपोर्ट ड्यूटी) 6% से बढ़ाकर 15% किया, जानिए क्या होगा आम आदमी की जेब पर असर और विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने से क्या है इसका कनेक्शन?

ईरान युद्ध के कारण पैदा हुए वैश्विक तनाव के बीच भारत का विदेशी मुद्रा भंडार प्रभावित हुआ है। इसे सुरक्षित रखने के लिए सरकार ने एक बड़ा एहतियाती कदम उठाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नागरिकों से एक साल तक सोना न खरीदने की अपील के कुछ ही दिनों बाद, एक सख्त नीतिगत फैसला लिया गया है।

सरकार ने सोने और चांदी पर प्रभावी आयात शुल्क को 6 प्रतिशत से बढ़ाकर सीधे 15 प्रतिशत कर दिया है। वित्त मंत्रालय द्वारा जारी सीमा शुल्क अधिसूचना संख्या 16/2026 के अनुसार, यह बदलाव 13 मई से लागू हो गया है।

अब सोने पर 10 प्रतिशत बेसिक कस्टम ड्यूटी (बीसीडी) और 5 प्रतिशत कृषि अवसंरचना और विकास उपकर (एआईडीसी) लगेगा। पहले यह दरें क्रमशः 5 प्रतिशत और 1 प्रतिशत थीं। यह महज कर में किया गया कोई सामान्य बदलाव नहीं है, बल्कि एक बड़ा मैक्रो-इकोनॉमिक संकेत है।

इसका मुख्य उद्देश्य डॉलर को बचाना, सोने की मांग को नियंत्रित करना और युद्ध जैसे हालातों में देश के विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखना है। इसके अलावा, रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देने के लिए इस्तेमाल किए गए उत्प्रेरकों या कीमती धातुओं वाली राख जैसी श्रेणियों के लिए 4.35 से 5 प्रतिशत तक की रियायती दरें भी तय की गई हैं।

भारत अपनी जरूरत का लगभग पूरा सोना आयात करता है, जिसका भुगतान अमेरिकी डॉलर में होता है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में, देश के कुल आयात बिल में सोने की हिस्सेदारी 9 से 10 प्रतिशत रही। घरेलू मांग को पूरा करने के लिए भारत ने इस दौरान रिकॉर्ड 71.98 अरब डॉलर का भुगतान किया।

मध्य पूर्व में तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण भारत का विदेशी मुद्रा भंडार हाल के उच्चतम स्तर से नीचे आ गया है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने भी चेतावनी दी है कि यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो चालू खाता घाटा (कैड) और बढ़ सकता है।

इसी को देखते हुए सरकार द्वारा डॉलर की निकासी रोकने की कोशिश की जा रही है। इसका अर्थशास्त्र बहुत सीधा है, सोने की खरीदारी कम होने का मतलब है कि भारत से कम डॉलर बाहर जाएंगे। एक अनुमान के मुताबिक आयात में 30 से 40 प्रतिशत की गिरावट से ही सालाना 20 से 25 अरब डॉलर बचाए जा सकते हैं।

इस फैसले से सोना तुरंत महंगा हो गया है और खुदरा कीमतों में यह उछाल साफ दिखने लगा है। सुबह 9:59 बजे मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर सोना 1,63,000 और चांदी 2,96,600 पर कारोबार कर रही थी। दोनों की कीमतों में 6 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई।

इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक, देश में 24 कैरेट सोने की कीमत लगभग 15,475 रुपये प्रति ग्राम थी। वहीं, चांदी 2,78,000 से 2,90,000 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास कारोबार कर रही थी।

शुल्क वृद्धि के असर को एक साधारण गणित से समझा जा सकता है। पहले 1,54,750 रुपये के मूल्य पर 6 प्रतिशत के हिसाब से 9,285 रुपये की ड्यूटी लगती थी, जिससे लैंडेड वैल्यू 1,64,035 रुपये होती थी।

नई 15 प्रतिशत दर के तहत अब इसी मूल्य पर 23,212 रुपये की ड्यूटी लगेगी, जिससे यह कीमत बढ़कर 1,77,962 रुपये हो जाएगी। ध्यान रहे कि इसमें अभी 3 प्रतिशत जीएसटी, ज्वैलर का मार्जिन और मेकिंग चार्ज शामिल नहीं हैं।

भारत में सोना खरीदना एक सांस्कृतिक और वित्तीय परंपरा है। सरकार की नई रणनीति निवेश और पारंपरिक खरीदारी दोनों को हतोत्साहित कर रही है।

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़े बताते हैं कि निवेशक पहले ही पेपर गोल्ड या ईटीएफ की ओर रुख करने लगे थे। अब महंगे दामों के कारण लोग आभूषणों की खरीदारी टालने या नए के बदले पुराने सोने को एक्सचेंज करने जैसे विकल्प अपना सकते हैं।

यह कदम पूरी अर्थव्यवस्था के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम है। इससे कच्चे तेल जैसे आवश्यक आयात के लिए विदेशी मुद्रा बचेगी, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का 88 प्रतिशत तेल आयात करता है। यह कैड को कम करने, रुपये को समर्थन देने और सट्टा जमाखोरी को रोकने में भी सहायक होगा।

हालांकि, सर्राफा कारोबारियों ने ग्रे मार्केट के दोबारा पनपने की गंभीर चेतावनी दी है। साल 2024 में टैरिफ कटौती के बाद सोने की तस्करी कम हो गई थी, जो अब 15 प्रतिशत ड्यूटी के कारण फिर से मुनाफे का सौदा बन सकती है। पड़ोसी देशों के रास्ते अवैध प्रवेश और नकद लेनदेन बढ़ने से सीमा शुल्क विभाग और डीआरआई के लिए नई प्रवर्तन चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।

ऑल इंडिया जेम्स एंड ज्वैलरी काउंसिल के चेयरमैन राजेश रोकड़े ने इस खतरे के प्रति आगाह किया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि प्रधानमंत्री के मितव्ययिता उपायों और आयात शुल्क में बढ़ोतरी के बाद व्यापार मुश्किल होने वाला है। उद्योग जगत को सबसे बड़ा डर यही है कि इससे ग्रे मार्केट को बढ़ावा मिलेगा और तस्करी बढ़ने से देश में एक समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी हो सकती है।

यह फैसला सर्राफा व्यापारियों और ज्वैलर्स के कारोबार पर एक सीधा प्रहार माना जा रहा है। ग्राहकों की संख्या में कमी और इन्वेंट्री लागत बढ़ने से कार्यशील पूंजी पर भारी दबाव पड़ेगा। साथ ही, ज्वैलरी फाइंडिंग्स पर भी अब 5 से 5.4 प्रतिशत टैक्स लगाया जाएगा।

उद्योग जगत फिलहाल आजीविका की चिंताओं और राष्ट्रहित के बीच बंटा हुआ नजर आ रहा है। एक तरफ कुछ व्यापारी समूहों ने अल्पकालिक नुकसान के बावजूद सार्वजनिक रूप से प्रधानमंत्री की अपील का समर्थन किया है।

मालाबार समूह के अध्यक्ष श्री एमपी अहमद ने तो वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल को एक व्यापक प्रस्ताव भी सौंपा है। इस प्रस्ताव में स्वर्ण मुद्रीकरण योजना (जीएमएस) को मजबूत करने और जनता की भागीदारी बढ़ाने के व्यावहारिक उपाय सुझाए गए हैं।

वहीं दूसरी ओर, इसके विरोध में कुछ व्यापारियों ने अपनी दुकानें बंद रखकर अपनी नाराजगी जाहिर की है।

विशेषज्ञ इसे नीति और मूल्य निर्धारण के एक अचूक संयोजन के रूप में देख रहे हैं। पहले देश के प्रधानमंत्री द्वारा एक नैतिक अपील की गई और उसके बाद सरकार ने कर के रूप में एक राजकोषीय दीवार खड़ी कर दी। इसका संदेश बिल्कुल स्पष्ट है कि सोना भारत के डॉलर के भंडार को खाली कर रहा है और इसे रोकना अब वक्त की जरूरत बन गया है।

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