निर्वाचन आयोग ने देश के 10 राज्यों की 24 राज्यसभा सीटों के लिए चुनावी बिगुल फूंक दिया है। आगामी जून और जुलाई में खाली हो रही इन सीटों पर 18 जून को मतदान होगा, जबकि मतों की गिनती भी उसी दिन शाम को की जाएगी।
इस चुनाव के साथ ही उच्च सदन में राजनीतिक समीकरणों को लेकर एक बड़ा सवाल तैर रहा है कि क्या सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) दो-तिहाई बहुमत का जादुई आंकड़ा पार कर पाएगा।
इस चुनावी चक्र में देश के कई दिग्गज नेताओं का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। इनमें राजस्थान से राज्यसभा सांसद और केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू, कर्नाटक से कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, पूर्व प्रधानमंत्री और जेडीएस नेता एच डी देवेगौड़ा, मध्य प्रदेश से वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह और गुजरात से पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शक्तिसिंह गोहिल शामिल हैं।
सदन के मौजूदा गणित की बात करें तो 245 सदस्यीय राज्यसभा में भाजपा के पास अभी 113 और पूरे एनडीए के पास कुल 148 सांसद हैं। संविधान संशोधन जैसे महत्वपूर्ण विधायी कार्यों को अमलीजामा पहनाने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत से एनडीए अभी 15 कदम दूर है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, मौजूदा संख्या बल को देखते हुए एनडीए के लिए इस आंकड़े तक पहुंचना फिलहाल मुमकिन नहीं दिख रहा है।
हालांकि, इस चुनाव में एनडीए को आंध्र प्रदेश और गुजरात में कुल मिलाकर चार सीटों का फायदा होने की उम्मीद है। वहीं दूसरी ओर, कर्नाटक और झारखंड में उसे एक-एक सीट का नुकसान भी झेलना पड़ सकता है। इन बदलावों के बाद भी एनडीए की कुल सदस्य संख्या में बढ़ोतरी तो होगी, लेकिन वह दो-तिहाई बहुमत की दहलीज से पीछे ही रह जाएगा।
अगर सीटों के खाली होने के घटनाक्रम को समझें, तो आंध्र प्रदेश और गुजरात से चार-चार, मध्य प्रदेश और राजस्थान से तीन-तीन तथा मणिपुर और मेघालय से एक-एक राज्यसभा सांसद आगामी 21 जून को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। इसके अलावा अरुणाचल प्रदेश की एक सीट 23 जून को, कर्नाटक की चार सीटें 25 जून को और मिजोरम की एक सीट 19 जुलाई को रिक्त होने जा रही है।
झारखंड की दो सीटों पर भी इसी दौरान चुनाव कराए जाएंगे। इनमें से एक सीट 21 जून को खाली हो रही है, जबकि दूसरी सीट झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के दिवंगत नेता शिबू सोरेन के निधन के बाद 4 अगस्त 2025 से रिक्त पड़ी है।
राज्यसभा में सांसदों के चयन की प्रक्रिया काफी दिलचस्प होती है। इसके सदस्यों को राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित विधायक एकल संक्रमणीय मत (सिंगल ट्रांसफरेबल वोट) प्रणाली और आनुपातिक प्रतिनिधित्व के जरिए चुनते हैं। यह एक स्थायी सदन है जो कभी भंग नहीं होता, बल्कि इसके एक-तिहाई सदस्य हर दो साल में छह साल का कार्यकाल पूरा कर सेवानिवृत्त होते हैं।
जीत के लिए जरूरी कोटे की गणना करने के लिए राज्य के कुल मतदान करने वाले विधायकों की संख्या को खाली सीटों की संख्या में एक जोड़कर विभाजित किया जाता है, और फिर परिणाम में एक और जोड़ दिया जाता है। इस खुली मतपत्र प्रणाली में विधायक अपनी पहली, दूसरी और तीसरी वरीयता तय करते हैं।
निर्धारित कोटा हासिल करने वाले उम्मीदवार को तुरंत विजेता घोषित कर दिया जाता है। यदि सीटें खाली रह जाती हैं, तो विजयी उम्मीदवारों के अतिरिक्त वोट दूसरी वरीयता वाले उम्मीदवारों को स्थानांतरित कर दिए जाते हैं। यह प्रक्रिया तब तक चलती है जब तक कि सबसे कम वोट वाले उम्मीदवार को बाहर करके सभी सीटें भर न जाएं।
राज्यों के चुनावी समीकरणों पर नजर डालें तो कर्नाटक की 224 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के 135, भाजपा के 66 और जेडीएस के 16 विधायक हैं। यहां जीत का कोटा 46 वोटों का है। मौजूदा समय में खाली हो रही चार सीटों में से तीन एनडीए और एक कांग्रेस के पास है, लेकिन नए समीकरणों में कांग्रेस को दो और एनडीए को एक सीट मिलना तय है, जबकि चौथी सीट का फैसला विधायकों के रुख पर निर्भर करेगा।
आंध्र प्रदेश की 175 सदस्यीय विधानसभा में सत्तारूढ़ तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के पास 135, जनसेना के पास 21, भाजपा के पास 8 और वाईएसआर कांग्रेस के पास 11 सीटें हैं। यहां जीत के लिए 36 वोटों के कोटे की आवश्यकता है। एनडीए के पास कुल 164 विधायकों का भारी बहुमत है, जिससे वह सभी चार सीटें आसानी से जीतता दिख रहा है।
गुजरात की 182 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के 156 और कांग्रेस के केवल 17 विधायक हैं। चार सीटों में से प्रत्येक के लिए 37 वोटों का कोटा जरूरी है। वर्तमान में इनमें से तीन सीटें भाजपा और एक कांग्रेस के पास है, लेकिन मौजूदा ताकत के बल पर भाजपा सभी चारों सीटों पर कब्जा जमाने के लिए तैयार है।
राजस्थान की 200 सीटों वाली विधानसभा में जीत का कोटा 51 तय है। यहां भाजपा के पास 115 और कांग्रेस के पास 69 सीटें हैं। खाली हो रही तीन सीटों में से भाजपा को फिर से दो और कांग्रेस को एक सीट मिलने की पूरी संभावना है।
मध्य प्रदेश की स्थिति देखें तो यहां 230 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के 163 और कांग्रेस के 66 विधायक हैं, जहां जीत का कोटा 58 है। खाली हो रही तीन सीटों में से भाजपा के खाते में फिर से दो और कांग्रेस के पाले में एक सीट जाती दिख रही है, बशर्ते भाजपा किसी बड़े उलटफेर की रणनीति न अपनाए।
झारखंड की 81 सदस्यीय विधानसभा में दो सीटों के लिए चुनाव होना है और जीत का कोटा 28 है। वर्तमान में भाजपा और जेएमएम के पास एक-एक सीट है। राज्य में विपक्षी इंडिया गठबंधन के पास 56 और एनडीए के पास 24 विधायक हैं, जिससे विपक्ष दोनों सीटें जीतने की फिराक में है, जबकि एनडीए रणनीति के जरिए एक सीट बचाने की कोशिश करेगा।
पार्टियां चुनावों में क्रॉस-वोटिंग रोकने के लिए भी खास इंतजाम करती हैं। साल 2003 से लागू खुली मतपत्र प्रणाली के तहत सभी दलों के विधायकों को मतदान के बाद अपना मतपत्र पार्टी के अधिकृत एजेंट को दिखाना अनिवार्य होता है, अन्यथा उनका वोट अमान्य हो जाता है। इस नियम के डर से विधायक पार्टी लाइन से बाहर जाने से कतराते हैं, हालांकि निर्दलीय विधायकों पर यह नियम लागू नहीं होता।
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