भारत में वयस्कों के बीच मोटापे और डायबिटीज की बीमारी बेहद खतरनाक रफ्तार से बढ़ रही है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा शुक्रवार को जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6) के ताजा आंकड़े सेहत को लेकर एक बड़ी चेतावनी दे रहे हैं। साल 2019 से 2024 के बीच महज पांच वर्षों के भीतर 15 से 49 आयु वर्ग के पुरुषों और महिलाओं में मोटापे का ग्राफ क्रमशः 4.4 और 6.7 प्रतिशत तक उछल गया है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने मुंबई स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पापुलेशन साइंसेज (IIPS) को नोडल एजेंसी बनाते हुए 2023-24 में यह व्यापक सर्वेक्षण किया था। मणिपुर को छोड़कर देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 715 जिलों में यह सर्वे किया गया। इसमें करीब 6.79 लाख परिवारों को शामिल करके जनसंख्या, स्वास्थ्य, पोषण और परिवार कल्याण के अहम और प्रामाणिक आंकड़े जुटाए गए हैं।
सर्वे के अनुसार, महिलाओं में बढ़ते वजन की समस्या एक बड़ी चिंता का विषय बन चुकी है। वर्ष 2019-21 में 24 फीसदी महिलाएं मोटापे का शिकार थीं, जो 2023-24 में बढ़कर 30.7 प्रतिशत हो गई हैं। यह समस्या गांवों की तुलना में शहरों में कहीं अधिक विकराल रूप ले चुकी है। जहां शहरी क्षेत्रों में 42.8 प्रतिशत महिलाएं ओवरवेट या मोटापे से ग्रस्त पाई गईं, वहीं ग्रामीण इलाकों में यह आंकड़ा 25.5 प्रतिशत रहा।
पुरुषों की सेहत का हाल भी कुछ ऐसा ही दिखाई दे रहा है। वर्ष 2019-21 के 22.9 प्रतिशत के मुकाबले 2023-24 में 27.3 फीसदी पुरुष मोटापे की गिरफ्त में आ चुके हैं। महिलाओं की तरह ही पुरुषों में भी शहरी आबादी इस समस्या से अधिक प्रभावित है। शहरों में 36.3 प्रतिशत तो गांवों में 23 फीसदी पुरुष मोटापे या अधिक वजन का सामना कर रहे हैं।
मोटापे के साथ-साथ हाई ब्लड शुगर यानी डायबिटीज के मरीजों की संख्या में भी भारी इजाफा दर्ज किया गया है। 15 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों में यह बीमारी तेजी से पैर पसार रही है। 2019-21 में जहां 15.6 प्रतिशत पुरुष हाई ब्लड शुगर (>140mg/dl) की समस्या से जूझ रहे थे या इसे नियंत्रित करने के लिए दवा ले रहे थे, वहीं 2023-24 में यह आंकड़ा बढ़कर 20.9 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
पुरुषों में ब्लड शुगर की यह समस्या भी शहरों में ज्यादा है। शहरी क्षेत्रों के 23.9 फीसदी और ग्रामीण क्षेत्रों के 19.7 फीसदी पुरुष इस बीमारी से लड़ रहे हैं। हालांकि पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में हाई ब्लड शुगर के मामले थोड़े कम हैं, लेकिन पिछले पांच सालों में इनकी वृद्धि दर काफी तेज रही है।
वर्ष 2019-21 के 13.5 प्रतिशत के मुकाबले अब 17.8 प्रतिशत महिलाएं हाई ब्लड शुगर से पीड़ित हैं या दवाइयों का सेवन कर रही हैं। शहरी इलाकों में 21.9 प्रतिशत और ग्रामीण इलाकों में 16.2 प्रतिशत महिलाओं को इस लाइफस्टाइल बीमारी ने अपनी चपेट में ले लिया है।
इस अहम रिपोर्ट में स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े कुछ अन्य पहलू भी सामने आए हैं। अस्पतालों में सिजेरियन डिलीवरी (ऑपरेशन से प्रसव) के मामलों में भी काफी तेजी देखी गई है, जिसका चलन निजी अस्पतालों में सबसे ज्यादा बढ़ा है। निजी स्वास्थ्य केंद्रों में सिजेरियन डिलीवरी का आंकड़ा 2019-21 के 47.4 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 54.1 प्रतिशत हो गया है।
वहीं, सरकारी अस्पतालों में ऑपरेशन से प्रसव की दर 14.3 प्रतिशत से बढ़कर 16.9 प्रतिशत हुई है। इन तमाम चिंताजनक आंकड़ों के बीच सर्वे में एक बड़ी राहत की खबर भी सामने आई है। 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में नाटेपन (Stunting) की समस्या में कमी आई है और यह आंकड़ा 35.5 प्रतिशत से गिरकर 29.3 प्रतिशत पर आ गया है।
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