क्रिकेटर और टीएमसी सांसद यूसुफ पठान को गुजरात उच्च न्यायालय से बड़ा झटका लगा है। सोमवार (8 जून) को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने पठान से बेहद तीखे सवाल किए। कोर्ट ने मौखिक रूप से पूछा कि आवंटन प्रक्रिया की किसी भी औपचारिकता को पूरा किए बिना वह वडोदरा के एक प्लॉट में कैसे प्रवेश कर सकते हैं और उस पर कब्जा कैसे जमा सकते हैं।
मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति डीएन राय की खंडपीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। पठान ने एकल न्यायाधीश के अगस्त 2025 के उस आदेश के खिलाफ अपील की थी, जिसमें उन्हें वडोदरा में सरकारी जमीन पर “अतिक्रमणकारी” घोषित किया गया था। उस आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि क्रिकेटर को कोई आवंटन आदेश जारी नहीं हुआ था और वह बिना कोई रकम चुकाए ही उस जगह पर काबिज थे।
आज की सुनवाई में अदालत ने बेहद सख्त लहजे में टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि इस मामले में ऐसा कोई आवंटन नहीं हुआ था जिसके तहत यह प्लॉट अपीलकर्ता को दिया गया हो। यह केवल एक प्रस्ताव था जिसे अंततः राज्य सरकार द्वारा खारिज कर दिया गया था। अदालत ने साफ किया कि जो कोई भी बिना कागजी कार्रवाई पूरी किए सार्वजनिक भूखंड पर कब्जा जमाता है, उसे किसी भी प्रकार की कानूनी रियायत नहीं दी जा सकती।
जब पठान के वकील ने मामले में निर्देश लेने के लिए मोहलत मांगी, तो कोर्ट ने उनसे यह बताने को कहा कि अपीलकर्ता को प्लॉट खाली करने के लिए कितना समय चाहिए। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि वह इस मामले में भारी हर्जाना लगाएगी और अगली सुनवाई 15 जून के लिए सूचीबद्ध कर दी।
इससे पहले, एकल न्यायाधीश के समक्ष पठान ने राज्य सरकार के 6 जून, 2024 के नोटिस को चुनौती दी थी। इस नोटिस में वडोदरा नगर निगम (VMC) के उस प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया गया था, जिसमें बिना सार्वजनिक नीलामी के पठान को 99 साल के पट्टे पर 978 वर्ग मीटर का प्लॉट आवंटित करने की बात कही गई थी। साथ ही, VMC को इस प्लॉट से जल्द से जल्द अतिक्रमण हटाने का सख्त निर्देश दिया गया था।
सुनवाई शुरू होने पर पठान की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता शालिन मेहता ने दलील दी कि एक बेहद अहम दस्तावेज एकल न्यायाधीश के सामने कभी रखा ही नहीं गया। उन्होंने 25-10-1999 की राज्य सरकार की एक नीति का जिक्र किया, जो अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटरों को कुछ शर्तों पर प्लॉट आवंटित करने से संबंधित है। मेहता ने कहा कि उन्होंने खुद इस नीति की जांच की है और वह चाहते हैं कि इसे रिकॉर्ड पर लाया जाए, क्योंकि पठान ने सभी शर्तें पूरी की हैं और वह इस प्लॉट के हकदार हैं।
इस तर्क पर अदालत ने तुरंत टोका और कहा कि यह केवल VMC का एक प्रस्ताव था और इसके लिए कोई सार्वजनिक नीलामी नहीं करवाई गई थी।
मेहता ने आगे तर्क दिया कि VMC की स्थायी समिति ने बिना नीलामी के बाजार दर पर उन्हें प्लॉट आवंटित करने का प्रस्ताव पारित किया था, जिसे सामान्य निकाय ने मंजूरी भी दे दी थी। उन्होंने GPMC अधिनियम की धारा 79 का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले में राज्य सरकार की मंजूरी की कोई आवश्यकता नहीं थी।
अदालत ने इस पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि अगर निगम के पास अपनी कोई ठोस नीति नहीं है, तो उसे राज्य सरकार से मंजूरी लेनी ही पड़ती है। पीठ ने समझाया कि यदि निगम अपनी तय नीति के तहत काम कर रहा है तो सरकार की मंजूरी का सवाल नहीं उठता। लेकिन अगर वह नीति से हटकर या पहली बार कोई कदम उठा रहा है, तो मंजूरी अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि निगम की नीति के अनुसार किसी भी प्लॉट का आवंटन नीलामी के जरिए होना चाहिए ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
प्रतिवादी के वकील ने कड़ा एतराज जताते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर के किसी भी एथलीट को संपत्ति प्राप्त करने का कोई “मौलिक अधिकार” नहीं है। उन्होंने अदालत को बताया कि पठान ने आज तक एक भी पैसा नहीं चुकाया है और वह पूरी तरह से मुफ्त में जमीन पर कब्जा किए बैठे हैं।
जब मेहता ने इसका विरोध किया, तो कोर्ट ने फिर सवाल दागा कि बिना आवंटन और बिना एक भी पैसा दिए उन्होंने इस प्लॉट पर कब्जा कैसे किया। पीठ ने कहा कि यह सिर्फ एक प्रस्ताव था जिसे राज्य ने ठुकरा दिया था, ऐसे में उनका वहां प्रवेश करना ही इस अपील को खारिज करने के लिए काफी है।
मेहता ने बचाव करते हुए कहा कि निगम के कहने पर ही उन्होंने प्लॉट की घेराबंदी की थी। इस पर अदालत ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि बिना औपचारिकता पूरी किए भौतिक कब्जा नहीं लिया जा सकता। कोर्ट ने उन निगम अधिकारियों के नाम मांगे जिन्होंने उन्हें वहां प्रवेश करने की अनुमति दी थी, ताकि उनके खिलाफ सख्त विभागीय जांच शुरू की जा सके।
वकील ने बड़ौदा के अन्य अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटरों को प्लॉट दिए जाने का भी उदाहरण दिया। लेकिन कोर्ट ने साफ किया कि उन्हें सिर्फ इस बात से मतलब है कि निगम की संपत्ति पर बिना पैसे दिए कब्जा किया गया है। जब अदालत ने पूछा कि क्या प्लॉट खाली कर दिया गया है, तो प्रतिवादी के वकील ने पुष्टि की कि आज तक जमीन खाली नहीं की गई है।
मेहता ने जवाब देने की कोशिश की कि निगम के प्रस्ताव के बाद उन्होंने भुगतान क्यों नहीं किया। लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह इस बात से चिंतित नहीं है कि अपीलकर्ता को भुगतान करना था या नहीं। अदालत ने कहा कि जब तक आवंटन राशि का भुगतान नहीं होता और कब्जा कानूनी रूप से नहीं सौंपा जाता, तब तक बिना पूरी प्रक्रिया के उसमें प्रवेश करना गैरकानूनी है।
अपीलकर्ता के वकील ने निर्देश लेने के लिए समय मांगते हुए अपनी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि उनकी ओर से सहमति दे दी गई थी, लेकिन राज्य ने उसे तुरंत खारिज कर दिया और 2014 का वह आदेश उन्हें 2024 में बताया गया। इसी वजह से वह इतने लंबे समय तक कब्जे में बने रहे।
कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह दो सप्ताह से अधिक का समय देने के पक्ष में नहीं है। अदालत ने यह भी जोड़ा कि अपीलकर्ता को सार्वजनिक प्लॉट के उपयोग के लिए भारी हर्जाना देना होगा। जब मेहता ने तर्क दिया कि पठान प्लॉट का “इस्तेमाल” नहीं कर रहे हैं, तो अदालत ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि सार्वजनिक जमीन की घेराबंदी करना ही अपने आप में अतिक्रमण है और यह एक आपराधिक कृत्य है।
अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि पठान कोई अनपढ़ व्यक्ति नहीं बल्कि एक देशभक्त और अंतरराष्ट्रीय स्तर के क्रिकेटर हैं। उनसे ऐसी हरकतों की उम्मीद बिल्कुल नहीं की जाती। पीठ ने उन्हें बाजार दर पर हर्जाना भरने के लिए तैयार रहने को कहा, भले ही उन्होंने उस जमीन को बंजर ही क्यों न छोड़ रखा हो।
अंत में मेहता ने अगली तारीख पर पूरी जानकारी के साथ वापस आने की बात कही और मामले को 15 जून के लिए सूचीबद्ध कर दिया गया।
क्या था पूरा मामला?
गौरतलब है कि यूसुफ पठान ने 2012 में जमीन आवंटन के लिए आवेदन किया था। उस समय बाजार मूल्य का पता लगाने के लिए एक निर्णय लिया गया था और VMC द्वारा बिना नीलामी प्रक्रिया का पालन किए याचिकाकर्ता को जमीन आवंटित करने के प्रस्ताव पर विचार किया गया था।
एकल न्यायाधीश ने अपने फैसले में पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि बिना पैसे दिए लंबे समय तक कब्जा रखने से पठान को उस जमीन पर कोई कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता। उस फैसले में यह भी कहा गया था कि मशहूर हस्तियां समाज के लिए आदर्श होती हैं और कानून का पालन न करने पर उन्हें रियायत देने से पूरे समाज में एक बहुत ही गलत संदेश जाता है।
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