अहमदाबाद: खाने की प्लेट सामने है, एक हाथ में मोबाइल फोन है और बस 15 बार चबाकर जल्दी-जल्दी खाना खत्म। हम में से ज्यादातर लोग इसे एक बहुत ही सामान्य सी आदत मानते हैं और स्वास्थ्य से जोड़कर नहीं देखते। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि आपके खाना खाने की यह रफ्तार आपके शरीर को अंदर से पूरी तरह बदल रही है। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप क्या खा रहे हैं या कितनी एक्सरसाइज कर रहे हैं।
नेचर-स्प्रिंगर जर्नल ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ में प्रकाशित एक नई स्टडी में एक बहुत ही गंभीर बात सामने आई है। इस रिसर्च के अनुसार, खाना खाने की तेज गति सीधे तौर पर “विसरल फैट” (पेट और अंदरूनी अंगों के आसपास जमा होने वाली खतरनाक चर्बी) को बढ़ावा देती है, जो आगे चलकर मेटाबॉलिक बीमारियों का कारण बनती है।
इस महत्वपूर्ण रिसर्च का नेतृत्व करमसद स्थित भाईकाका यूनिवर्सिटी के केएम पटेल इंस्टीट्यूट ऑफ फिजियोथेरेपी के आशीष गुप्ता, अपेक्ष रायथाठा और सिराजअहमद भोरनिया ने किया है। उनके साथ पारुल यूनिवर्सिटी के पारुल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ के प्रणव क्षत्रिय भी इस टीम का अहम हिस्सा थे।
रिसर्च टीम ने गुजरात के श्री कृष्ण अस्पताल और बिड़ला विश्वकर्मा महाविद्यालय जैसे संस्थानों से 465 वयस्कों को इस अध्ययन में शामिल किया। इस पूरे समूह में 51.6 प्रतिशत पुरुष और 48.4 प्रतिशत महिलाएं शामिल थीं।
शरीर की संरचना का सटीक मैप तैयार करने के लिए शोधकर्ताओं ने ‘बायोइलेक्ट्रिकल इम्पीडेंस एनालाइजर’ का इस्तेमाल किया। इसके बाद प्रतिभागियों द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर उन्हें खाना चबाने की गति के अनुसार अलग-अलग समूहों में बांटा गया।
आंकड़ों के अनुसार, केवल 10.9 प्रतिशत लोग “धीमे” खाने वाले थे, जो हर निवाले को 20 से ज्यादा बार चबाते थे। वहीं 44.7 प्रतिशत लोग “मध्यम” गति वाले थे, जो एक बाइट को 10 से 20 बार चबाकर खाते थे। सबसे ज्यादा चिंताजनक बात यह रही कि 44.3 प्रतिशत लोग “तेज” खाने वालों की श्रेणी में आए, जो हर निवाले को 10 बार से भी कम चबा रहे थे।
नतीजों से यह साफ हो गया कि मध्यम या धीमी गति से खाने वालों की तुलना में, तेज गति से खाने वालों का औसत बॉडी मास इंडेक्स (BMI) और विसरल फैट प्रतिशत काफी अधिक था। जहां पूरे समूह का औसत बीएमआई 25.01 किग्रा/मी² था, वहीं तेज खाने वालों का औसत 25.70 किग्रा/मी² दर्ज किया गया।
उम्र, लिंग और शारीरिक गतिविधि जैसे कारकों को ध्यान में रखने के बाद भी, तेजी से खाना खाने वालों में 10 प्रतिशत विसरल फैट के खतरनाक स्तर को पार करने की संभावना 2.18 गुना अधिक पाई गई। इसके साथ ही, उनके ओवरवेट या मोटापे का शिकार होने का जोखिम भी 1.7 गुना बढ़ गया था।
इस अध्ययन का एक सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि शोधकर्ताओं को खाने की आदतों और शारीरिक गतिविधि के बीच कोई संबंध नहीं मिला। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि अगर आप जल्दी-जल्दी खाना खाते हैं, तो रोजाना जिम जाने या एक्सरसाइज करने से भी इस आदत के कारण होने वाले शारीरिक नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती है।
इसके पीछे एक स्पष्ट जैविक कारण छिपा है। तेज गति से खाने वाले लोग अक्सर तब तक जरूरत से ज्यादा खाना खा चुके होते हैं, जब तक कि उनके दिमाग तक पेट भरने का संकेत पहुंचता है। पेट भरने का यह एहसास मुख्य रूप से दो चीजों से ट्रिगर होता है। पहला, पेट की मांसपेशियों का फैलना और दूसरा, कोलेसिस्टोकाइनिन, पेप्टाइड वाईवाई और ग्लूकागन-लाइक पेप्टाइड-1 जैसे ‘एनोरेक्सिजेनिक’ आंत हार्मोन का स्राव।
दिमाग तक पेट भरने का यह ‘स्टॉप’ सिग्नल पहुंचने में लगभग 20 मिनट का समय लगता है। तेज खाने वाले लोग इस सिग्नल को पूरी तरह से बायपास कर देते हैं। इस स्टडी में शामिल 25 प्रतिशत लोग अपना खाना 10 मिनट से भी कम समय में खत्म कर लेते थे। ऐसे में दिमाग का अलार्म बजने से पहले ही वे अपनी जरूरत से ज्यादा ऊर्जा (कैलोरी) ले लेते हैं, जो बाद में सेंट्रल एडिपोसिटी यानी पेट की चर्बी के रूप में जमा हो जाती है।
मोटापे को कम करने के लिए शोधकर्ता खाने की गति में बदलाव को एक बहुत ही कारगर व्यावहारिक उपाय मानते हैं। उनका सुझाव है कि भविष्य के सभी स्वास्थ्य कार्यक्रमों में “माइंडफुल ईटिंग” यानी पूरे ध्यान से खाने की आदतों को मोटापे से बचाव के आवश्यक तत्वों के रूप में शामिल किया जाना चाहिए।
हालांकि शारीरिक व्यायाम फिट रहने के लिए जरूरी है, लेकिन रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि रोजमर्रा की एक्सरसाइज वजन बढ़ने के दीर्घकालिक परिणामों को तभी कम कर सकती है, जब पहले जल्दी-जल्दी खाना खाने की मूल आदत में सुधार किया जाए।
इस रिसर्च की विश्वसनीयता को सुनिश्चित करने के लिए काफी सख्त क्लीनिकल मानकों का पालन किया गया है। खाने की गति को मोटापे के एक स्वतंत्र जोखिम कारक के रूप में स्थापित करने के लिए, रिसर्च टीम ने उन लोगों को अध्ययन से पूरी तरह बाहर रखा जिन्हें दांतों की कोई समस्या थी, जो ईटिंग डिसऑर्डर के शिकार थे, या जो ऐसी दवाएं ले रहे थे जिनसे भूख पर सीधा असर पड़ता हो।
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