भारत में करोड़ों लोगों के लिए दक्षिण-पश्चिम मानसून सिर्फ एक मौसमी घटना नहीं, बल्कि एक जीवनरेखा है। यह चिलचिलाती गर्मी से राहत दिलाने के साथ ही जलाशयों को भरता है और हमारी कृषि व्यवस्था को संजीवनी देता है। देशभर के कई समुदाय साल भर पानी की जरूरतों के लिए इसी पर निर्भर रहते हैं।
इस साल मानसून की शुरुआत बेहद शानदार रही और यह उम्मीद से पहले ही देश के कई हिस्सों में पहुंच गया था। इससे एक बेहतरीन बारिश के मौसम की उम्मीदें परवान चढ़ने लगी थीं। लेकिन शुरुआती तेजी के बाद अचानक इसकी रफ्तार पर जैसे ब्रेक लग गया और करीब दो हफ्तों से मानसून का आगे बढ़ना पूरी तरह से रुक गया है।
जिन इलाकों में बारिश की दरकार थी, वहां के लोग अब भी आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं। इस बीच तापमान लगातार बढ़ रहा है और मौसमी बारिश की कमी का आंकड़ा गहराता जा रहा है। मानसून के इस लंबे ठहराव ने किसानों, जल प्रबंधकों और मौसम विशेषज्ञों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं।
क्यों थम गई मानसून की प्रगति?
आखिर मानसून के अचानक यूं रुक जाने की मुख्य वजह क्या है? इसका सबसे बड़ा कारण भारतीय उपमहाद्वीप में बार-बार शुष्क हवाओं का प्रवेश करना है। आमतौर पर मानसून को बादलों के निर्माण और बारिश के लिए गर्म और नमी युक्त हवाओं की जरूरत होती है।
जून के पहले पखवाड़े में पश्चिमी और मध्य भारत में लगातार सूखी हवाएं चलती रहीं। इन हवाओं ने एक मजबूत दीवार की तरह काम किया, जिससे बादलों का निर्माण रुक गया और कई क्षेत्रों में बारिश की गतिविधियां थम गईं।
इस मौसमी बदलाव का नतीजा यह हुआ कि बारिश छिटपुट और बेहद कमजोर हो गई। मानसूनी हवाओं का चक्र अपनी ताकत खो बैठा और कई राज्यों में तापमान में भारी इजाफा दर्ज किया गया। सीधे शब्दों में कहें तो वायुमंडल में इतनी नमी ही नहीं बची थी जो व्यापक स्तर पर बारिश करा सके।
राहत की खबर: सुधर रहे हैं हालात
हालांकि, अब मौसम वैज्ञानिकों को हालात में सुधार के साफ संकेत नजर आ रहे हैं। मानसून का रास्ता रोकने वाली शुष्क हवाएं अब धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही हैं। भारत के पश्चिमी तट पर नमी का स्तर बढ़ने लगा है, जो बारिश वाले बादलों के पनपने के लिए एक बेहद अनुकूल माहौल तैयार कर रहा है।
मौसम के ताज़ा मॉडल बताते हैं कि 20 जून के बाद से यह सकारात्मक बदलाव काफी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगेगा। अगर यह स्थिति इसी तरह मजबूत होती रही, तो आने वाले दिनों में बारिश की गतिविधियों में भारी उछाल देखने को मिलेगा।
सोमाली जेट: मानसून का मुख्य इंजन
मानसून को प्रभावित करने वाला एक और बेहद अहम कारक ‘सोमाली जेट’ (Somali Jet) है। यह एक बेहद शक्तिशाली निचले स्तर की हवा की धारा है जो अफ्रीका के पूर्वी तट से होकर अरब सागर को पार करती हुई भारत की ओर बढ़ती है। यह अपने साथ समुद्र से भारी मात्रा में नमी लाती है और भारतीय मानसून को पानी की आपूर्ति करने वाले एक विशाल इंजन की तरह काम करती है।
एक अच्छे मानसून सीजन के दौरान, यह जेट पश्चिमी भारत में भारी बारिश लाता है और धीरे-धीरे मध्य तथा उत्तरी क्षेत्रों में भी झमाझम बारिश में मदद करता है। लेकिन इस साल यह सोमाली जेट असामान्य रूप से कमजोर रहा है।
इसकी ताकत कम होने की वजह से भारत में कम नमी पहुंची, बारिश वाले सिस्टम कमजोर पड़ गए और कई राज्यों में सूखे जैसे हालात बनने लगे। आसान भाषा में समझें तो मानसून का यह मुख्य इंजन अपनी क्षमता से काफी नीचे काम कर रहा था।
पूर्वानुमान मॉडल अब इशारा कर रहे हैं कि 20 जून के आसपास सोमाली जेट के काफी मजबूत होने की संभावना है। ऐसा होने पर अरब सागर के ऊपर चलने वाली तेज हवाएं भारत की ओर भारी मात्रा में नमी लेकर आएंगी। इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, गोवा और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों को मिलने की उम्मीद है।
भूमध्य रेखा पार करने वाली हवाओं का प्रभाव
इसके अलावा मौसम विशेषज्ञ भूमध्य रेखा पार करने वाली हवाओं (Cross-Equatorial Winds) पर भी पैनी नजर बनाए हुए हैं। ये वो हवाएं हैं जो दक्षिणी गोलार्ध से भूमध्य रेखा को पार कर हिंद महासागर होते हुए भारतीय मुख्य भूमि तक पहुंचती हैं।
ये हवाएं मानसून प्रणाली को लगातार गर्म और नमी युक्त हवाएं प्रदान करती हैं। मौजूदा पूर्वानुमान बताते हैं कि आने वाले दिनों में इन हवाओं की गति भी तेज होगी। इन हवाओं के मजबूत होने का सीधा मतलब है कि भारत में अधिक नमी पहुंचेगी, बादलों का निर्माण बेहतर होगा और मानसूनी बारिश का चक्र तेज होगा।
आगे क्या होगा और यह क्यों है जरूरी?
अगर वायुमंडल में अपेक्षित ये सभी बदलाव एक साथ होते हैं, तो मानसून अपनी खोई हुई गति बहुत तेजी से वापस पा लेगा। शुष्क हवाओं का कमजोर होना, सोमाली जेट का मजबूत होना और भूमध्य रेखा के पार से नमी के प्रवाह में वृद्धि होना, ये तीनों कारण मिलकर इस सप्ताहांत से मानसून को फिर से सक्रिय कर सकते हैं।
मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि इन अनुकूल परिस्थितियों के बाद अगले चरण में मानसून महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान के कुछ हिस्सों और उत्तर भारत में बहुत तेजी से आगे बढ़ेगा। आने वाले कुछ दिन देश के लिए बेहद अहम साबित होने वाले हैं।
बारिश में और अधिक देरी से कई क्षेत्रों में कृषि, जलाशयों, भूजल स्तर और पीने के पानी की उपलब्धता पर भारी दबाव पड़ सकता है। कई राज्यों में किसान अपनी फसलों की बुवाई शुरू करने के लिए पर्याप्त बारिश का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।
हालांकि, अगर मानसून की परिस्थितियों के मजबूत होने का पूर्वानुमान सही साबित होता है, तो जून के अंत से पहले भारत में बारिश की गतिविधियों का एक शानदार पुनरुद्धार देखने को मिल सकता है। फिलहाल सभी की निगाहें अरब सागर और मौसम के बदलते मिजाज पर टिकी हैं और दक्षिण-पश्चिम मानसून आखिरकार देश भर में अपनी अगली बड़ी छलांग लगाने के लिए तैयार दिख रहा है।
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