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जब कंगाली की कगार पर थी गुजरात सरकार, तब जूही चावला के ससुराल वालों ने दिया था कर्ज, वह अनसुनी कहानी..

| Updated: June 22, 2026 12:55

13 साल की उम्र में खाली हाथ अफ्रीका जाकर 17,500 करोड़ का साम्राज्य खड़ा करने वाले नानजी कालिदास मेहता की कहानी, जिन्होंने संकट के समय गुजरात सरकार को उबारा था।

अभिनेत्री और उद्यमी जूही चावला को बॉलीवुड की सबसे अमीर अभिनेत्रियों में गिना जाता है। हुरुन रिच लिस्ट के अनुसार, उनकी कुल संपत्ति लगभग 7,790 करोड़ रुपये है। वहीं, उनके पति जय मेहता करीब 17,500 करोड़ रुपये के विशाल कारोबारी साम्राज्य के मालिक हैं।

अक्सर लोग इस मशहूर दंपत्ति की संपत्ति को आईपीएल फ्रेंचाइजी कोलकाता नाइट राइडर्स (केकेआर) में उनकी पूर्व हिस्सेदारी से जोड़कर देखते हैं। लेकिन मेहता परिवार की अमीरी की जड़ें एक सदी से भी अधिक पुरानी हैं।

इसका एक बेहद खास अध्याय गुजरात के इतिहास से भी जुड़ा है। बहुत कम लोग जानते हैं कि एक समय ऐसा भी था जब भारी वित्तीय संकट के दौरान गुजरात सरकार ने जय मेहता के दादा और मशहूर उद्योगपति नानजी कालिदास मेहता से आर्थिक मदद मांगी थी।

जब गुजरात सरकार ने लिया था मेहता परिवार से कर्ज

साल 1960 में तत्कालीन द्विभाषी बॉम्बे राज्य को आधिकारिक तौर पर दो अलग-अलग राज्यों—महाराष्ट्र और गुजरात—में विभाजित कर दिया गया था। यह राजनीतिक पुनर्गठन ऐतिहासिक जरूर था, लेकिन नवगठित गुजरात के सामने कई बड़ी आर्थिक और प्रशासनिक चुनौतियां खड़ी हो गईं।

विभाजन के बाद ज्यादातर प्रमुख औद्योगिक और वित्तीय केंद्र महाराष्ट्र के हिस्से में चले गए। इसके चलते गुजरात को अपनी आर्थिक नींव शून्य से खड़ी करनी पड़ी।

लोहाणा इंटरनेशनल बिजनेस फोरम के अध्यक्ष, व्यवसायी और समुदाय के नेता श्री सतीशभाई विठलानी के अनुसार, शुरुआती वर्षों में राज्य सरकार को गंभीर वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा था। हालात इतने खराब थे कि सरकारी कर्मचारियों को वेतन देने के भी लाले पड़ गए थे।

सागर कथरोटिया के पॉडकास्ट पर बातचीत करते हुए विठलानी ने पुरानी यादें ताजा कीं।

“नानजी कालिदास मेहता मूल रूप से पोरबंदर के रहने वाले थे। युगांडा पहुंचने से पहले उन्होंने भारी संघर्ष किया और बाद में वहां चीनी कारखानों सहित कई व्यवसायों का एक विशाल साम्राज्य खड़ा किया। गुजरात-महाराष्ट्र के बंटवारे के बाद गुजरात सरकार को शुरुआती आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ा। भुगतान का एक बड़ा संकट पैदा हो गया था। जहां तक हमारी जानकारी है, उस समय सरकार ने अपनी देनदारियों को पूरा करने के लिए नानजी कालिदास मेहता से कर्ज लिया था। यह अपने आप में एक बहुत बड़ी बात है।”

आज नानजी कालिदास मेहता द्वारा स्थापित इस कारोबार को जय मेहता सहित परिवार की अगली पीढ़ियां संभाल रही हैं। यह व्यवसाय अब चीनी और सीमेंट से लेकर हॉस्पिटैलिटी, रियल एस्टेट, खेल और बुनियादी ढांचे तक फैल चुका है।

13 साल का वह लड़का जो नाव से पहुंचा अफ्रीका

जूही चावला के दादा-ससुर नानजी कालिदास मेहता का जन्म पोरबंदर में हुआ था। 1900 के दशक की शुरुआत में, मात्र 13 वर्ष की आयु में उन्होंने नाव के जरिए पूर्वी अफ्रीका की यात्रा की। वह अपनी आंखों में बड़ी महत्वाकांक्षा और दृढ़ संकल्प लेकर केन्या के मोम्बासा पहुंचे थे।

शुरुआत में उन्होंने दुकानों में छोटे-मोटे काम किए और व्यापार की बारीकियां सीखीं। समय के साथ उन्होंने कपड़ा, अनाज और रोजमर्रा की चीजों का कारोबार शुरू कर दिया। उनकी व्यावसायिक समझ उन्हें पूर्वी अफ्रीका में और भी गहरे तक ले गई, विशेष रूप से युगांडा में, जिसे उस समय “अफ्रीका का मोती” कहा जाता था।

1920 के दशक तक उन्होंने कृषि क्षेत्र में निवेश करना शुरू कर दिया था। एक बेहद साहसिक कदम उठाते हुए उन्होंने युगांडा के लुगाज़ी में जमीन खरीदी। यह इलाका उस समय काफी दलदली और अविकसित था, लेकिन उन्होंने वहां गन्ने की खेती शुरू कर दी। यह एक बड़ा जोखिम था क्योंकि बुनियादी ढांचे को शुरुआत से बनाना था।

नानजी की दूरदर्शिता केवल व्यापार तक सीमित नहीं थी। वह खेती से लेकर प्रसंस्करण और वितरण तक, पूरी मूल्य श्रृंखला पर नियंत्रण चाहते थे। इसी सोच के साथ साल 1930 में उन्होंने युगांडा शुगर फैक्ट्री लिमिटेड की स्थापना की। यही कंपनी आगे चलकर पूर्वी अफ्रीका के सबसे बड़े औद्योगिक समूहों में से एक बनी।

आने वाले दशकों में उनके कारोबार का तेजी से विस्तार हुआ। इसमें कृषि, चीनी निर्माण, सीमेंट, पैकेजिंग, कपड़ा, वित्त, बीमा, रियल एस्टेट, ऊर्जा और बुनियादी ढांचा शामिल हो गए। विदेशों में सफलता मिलने के साथ-साथ नानजी ने भारत में भी भारी निवेश किया। 1920 के दशक के अंत में उन्होंने पोरबंदर में कपड़ा मिलों का निर्माण शुरू कर दिया था।

स्वास्तिक भवन की भव्य विरासत

साल 1936 में नानजी कालिदास मेहता ने अपने बड़े परिवार के लिए पोरबंदर में ‘स्वास्तिक भवन’ का निर्माण पूरा किया। यह समुद्र के सामने स्थित एक बेहद आलीशान घर है। इस शुभ प्रतीक के नाम पर बना यह घर पारंपरिक भारतीय मूल्यों और आधुनिक वैश्विक प्रभावों का एक अनूठा संगम है।

खूबसूरत बगीचों के बीच फैले इस दो मंजिला महलनुमा घर को पास की खदानों से निकाले गए चूना पत्थर से बनाया गया था। इसमें इटालियन मार्बल की फर्श, जापानी टाइलें, यूरोपीय आर्ट डेको ग्लास झूमर और अफ्रीका से आयातित फर्नीचर लगाया गया था।

जब मेहमान बने देश के प्रधानमंत्री

आर्किटेक्चरल डाइजेस्ट को दिए एक साक्षात्कार में नानजी की पोती कमल मेहता ने इस घर से जुड़ी कई अहम जानकारियां दी थीं। उन्होंने बताया कि इस आवास ने पिछले कई दशकों में भारत की कुछ सबसे प्रमुख हस्तियों की मेजबानी की है।

पोरबंदर के महाराजा और महारानी यहां अक्सर मेहमान बनकर आते थे। इसके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई के साथ-साथ वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस ऐतिहासिक घर का दौरा कर चुके हैं।

कमल मेहता ने यह भी याद किया कि फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ और कई प्रसिद्ध लेखकों, कवियों और विचारकों का भी यहां स्वागत किया गया है। आज भी, निर्माण के लगभग 90 साल बाद स्वास्तिक भवन इस परिवार की महान विरासत का प्रतीक बना हुआ है।

और फिर रातों-रात सब कुछ छिन गया

मेहता परिवार की कहानी केवल धन और सफलता की नहीं है। नानजी कालिदास मेहता ने पूर्वी अफ्रीका में सामुदायिक कल्याण के लिए भी काफी काम किया। उनके व्यवसायों ने कर्मचारियों को घर, साफ पानी, स्वास्थ्य सुविधाएं और शिक्षा के अवसर प्रदान किए। उस दौर में ऐसी सुविधाएं मिलना बहुत दुर्लभ बात थी।

फिर युगांडा के इतिहास का सबसे काला अध्याय शुरू हुआ। 1972 में वहां के तानाशाह ईदी अमीन ने देश से लगभग 80,000 एशियाई लोगों को बाहर निकालने का आदेश दे दिया। उन पर संपत्ति पर कब्जा करने और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने का झूठा आरोप लगाया गया था।

व्यवसायों को जब्त कर लिया गया, संपत्तियों को फ्रीज कर दिया गया और परिवारों को बिना किसी पूर्व सूचना के देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया। हजारों अन्य लोगों की तरह मेहता परिवार ने भी वह सब कुछ खो दिया जिसे बनाने में उन्होंने दशकों लगाए थे। कारखानों पर कब्जा कर लिया गया, बागान वीरान हो गए और सारा काम-काज ठप पड़ गया।

राख से उठकर फिर खड़ा किया साम्राज्य

यह कहानी हार पर खत्म नहीं हुई। सात साल बाद, जब ईदी अमीन के शासन का पतन हुआ, तो युगांडा ने देश की अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के लिए एशियाई उद्यमियों को वापस आमंत्रित किया।

मेहता परिवार भी वापस लौटा और अपनी चीनी सम्पदाओं, कारखानों और कृषि कार्यों को बहाल करने की कठिन प्रक्रिया शुरू की। उनकी इस वापसी में नानजी द्वारा दशकों से बनाई गई सद्भावना ने बड़ी मदद की।

कई स्थानीय लोगों को याद था कि वे केवल एक व्यापारी नहीं थे, बल्कि एक ऐसे परोपकारी इंसान थे जिन्होंने लोगों और समुदायों की भलाई में अपना जीवन लगाया था। समय के साथ मेहता ग्रुप ने अपने संचालन का पुनर्निर्माण किया और एक बार फिर युगांडा की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार बनकर उभरा। आज भी, उनकी चीनी और चाय की संपदा पूर्वी अफ्रीका में सबसे अधिक उत्पादक मानी जाती है।

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