गुजरात और राजस्थान में चांदीपुरा वायरस (CHPV) के लगातार बढ़ते मामलों ने एक बड़ा स्वास्थ्य संकट खड़ा कर दिया है। हालात को काबू में करने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने एक ‘नेशनल जॉइंट आउटब्रेक रिस्पॉन्स टीम’ (NJORT) को दोनों राज्यों के लिए रवाना किया है। यह बीमारी मुख्य रूप से मच्छरों और सैंडफ्लाई (बालू मक्खी) के जरिए फैलती है, जो आगे चलकर खतरनाक एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम (AES) का रूप ले सकती है।
इस विशेष केंद्रीय टीम में राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC), भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) और पशुपालन एवं डेयरी विभाग (DAHD) के दिग्गज विशेषज्ञ शामिल हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, यह टीम राज्य के स्वास्थ्य विभागों के साथ मिलकर महामारी की जमीनी जांच, नैदानिक प्रबंधन, प्रयोगशाला समन्वय और वेक्टर नियंत्रण जैसे महत्वपूर्ण मोर्चों पर काम करेगी। प्रभावित इलाकों का पूरा जायजा लेने के बाद यह टीम मंत्रालय को अपनी विस्तृत रिपोर्ट और सिफारिशें सौंपेगी।
इस पूरी मुहिम को सुचारू रूप से चलाने के लिए NCDC ने अपना ‘पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी ऑपरेशंस सेंटर’ भी पूरी तरह से सक्रिय कर दिया है। जमीनी स्तर पर राहत और बचाव कार्यों को वैज्ञानिक दिशा देने के लिए देश भर के कई शीर्ष संस्थानों को भी इस अभियान से जोड़ा गया है।
चेन्नई स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एपिडेमियोलॉजी, पुडुचेरी के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वेक्टर कंट्रोल रिसर्च, पुणे के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी और हैदराबाद के नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर प्री-क्लिनिकल रिसर्च के शोधकर्ता मैदान में डटे हुए हैं। ये सभी विशेषज्ञ बेंगलुरु स्थित ICAR-NIVEDI के पशु चिकित्सा वैज्ञानिकों के साथ मिलकर गुजरात के स्वास्थ्य विभाग की मदद कर रहे हैं।
जांचकर्ता इस बीमारी के हर पहलू पर बारीकी से नजर रख रहे हैं और हल्के बुखार से लेकर गंभीर एन्सेफलाइटिस तक के मरीजों को ट्रैक किया जा रहा है। प्रभावित जिलों में तेज बुखार और AES के संदिग्ध मरीजों की निगरानी काफी बढ़ा दी गई है। इसके अलावा समुदायों में सीरोसर्वे किया जा रहा है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कितने संक्रमण बिना पहचान के ही रह गए हैं और साथ ही प्रयोगशालाएं डायग्नोस्टिक परीक्षणों को और अधिक सटीक बनाने में जुटी हैं।
वैज्ञानिक इस बात की भी गहन जांच कर रहे हैं कि मौजूदा संक्रमण किस कीट से सबसे ज्यादा फैल रहा है। वैसे तो चांदीपुरा वायरस के ज्ञात वाहक सैंडफ्लाई को ही माना जाता है, लेकिन इस बार मच्छरों, टिक्स या माइट्स की भूमिका को भी खंगाला जा रहा है। प्रभावित इलाकों से भारी मात्रा में वेक्टर नमूने एकत्र कर उनका विश्लेषण हो रहा है, हालांकि अधिकारियों का कहना है कि असली जिम्मेदार कीट की पुष्टि करने में अभी थोड़ा वक्त लगेगा।
इंसानों के साथ-साथ जानवरों के जरिए वायरस फैलने की आशंका को देखते हुए पशु निगरानी का दायरा भी बढ़ा दिया गया है। गाय, भैंस और बकरियों के लगभग 70 रक्त नमूनों के साथ-साथ दूध के नमूने भी लिए गए हैं। इससे यह जांचा जाएगा कि क्या मवेशी इस खतरनाक वायरस के पनपने का ठिकाना बन रहे हैं। प्रशासन का स्पष्ट कहना है कि जब तक पूरी टेस्टिंग नहीं हो जाती, तब तक किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
इस रहस्यमयी वायरस की पूरी आनुवंशिक संरचना समझने के लिए गांधीनगर स्थित गुजरात बायोटेक्नोलॉजी रिसर्च सेंटर (GBRC) में वायरस के नमूनों की ‘होल-जीनोम सीक्वेंसिंग’ की जा रही है। शुरुआती नतीजों में वायरस के अंदर कुछ मामूली आनुवंशिक बदलाव जरूर नजर आए हैं। लेकिन शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह नया स्ट्रेन पुरानी महामारियों वाले स्ट्रेन से ही विकसित हुआ है या नहीं, इसकी पक्की पुष्टि के लिए अभी और भी विस्तृत तुलनात्मक अध्ययनों की आवश्यकता है।
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