गुजरात सरकार ने एक बेहद अहम और कड़ा फैसला लिया है। गांधीनगर स्थित राज्य के प्रतिष्ठित इन्फोसिटी प्रोजेक्ट को विकसित करने वाली कंपनी ‘क्रिएटिव इन्फोसिटी लिमिटेड’ की लीज अब आगे नहीं बढ़ाई जाएगी। 116 एकड़ के इस विशाल कैंपस की लीज अवधि जुलाई 2030 में समाप्त हो रही है। इसके बाद सरकार इस पूरे परिसर का नियंत्रण पूरी तरह से अपने हाथों में ले लेगी।
इस फैसले को राज्य सरकार के शीर्ष स्तर पर मंजूरी दी गई है। यह सख्त कदम सरकार और डेवलपर के बीच लंबे समय से चल रहे उन विवादों के मद्देनजर उठाया गया है, जो लीज और रियायत समझौतों के कथित उल्लंघन से जुड़े हैं। लीज खत्म होने में भले ही अभी कुछ साल बाकी हैं, लेकिन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने जमीन और प्रोजेक्ट की संपत्तियों को वापस लेने की आधिकारिक प्रक्रिया अभी से शुरू कर दी है।
एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि अनुबंध के कथित उल्लंघनों को देखते हुए इस लीज को विस्तार देने का कोई भी औचित्य नहीं बचता है। गौरतलब है कि सरकार ने अगस्त 2008 में ही डेवलपर को टर्मिनेशन नोटिस (समाप्ति नोटिस) जारी कर दिया था। हालांकि, इसके बाद यह पूरा मामला मध्यस्थता और कानूनी दांवपेच में उलझ गया था, जो कई सालों तक खिंचता चला गया।
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, सरकार इस साइट पर बनाए गए भवनों और बुनियादी ढांचे के लिए ‘क्रिएटिव इन्फोसिटी लिमिटेड’ को मुआवजा जरूर देगी। यह मुआवजा समझौते के प्रावधानों के तहत संपत्ति के मूल्यह्रास (depreciated asset value) के आधार पर तय किया जाएगा, ताकि कानूनी प्रक्रिया का पारदर्शी तरीके से पालन हो सके।
हालांकि, एक अन्य सूत्र का कहना है कि डेवलपर को मिलने वाली यह मुआवजा राशि काफी कम हो सकती है। यह राशि उन भारी-भरकम वित्तीय देनदारियों की तुलना में बेहद मामूली होगी, जो लीज समझौते के उल्लंघनों के कारण डेवलपर पर बनती हैं।
इन्फोसिटी प्रोजेक्ट की परिकल्पना गुजरात की पहली एकीकृत सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) टाउनशिप के रूप में की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य एक ही कैंपस में विश्व स्तरीय बुनियादी ढांचा प्रदान करके प्रमुख आईटी और तकनीकी कंपनियों को राज्य की ओर आकर्षित करना था। इस बड़े प्रोजेक्ट को लागू करने के लिए ‘गुजरात इंफॉर्मेटिक्स लिमिटेड’ (GIL) को नोडल एजेंसी बनाया गया था, जबकि प्रसिद्ध कंसल्टेंसी फर्म PwC की मदद से इसकी प्री-फिजिबिलिटी स्टडी की गई थी।
इस सिलसिले में 1 अगस्त 2000 को जीआईएल और क्रिएटिव इन्फोसिटी लिमिटेड के बीच रियायत समझौते (concession agreement) पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसके बाद फरवरी 2001 में एक मास्टर लीज एग्रीमेंट हुआ, जिसके तहत राज्य सरकार ने आईटी टाउनशिप विकसित करने के लिए गांधीनगर में 116 एकड़ जमीन कंपनी को पट्टे पर दे दी।
लेकिन कुछ ही वर्षों के भीतर सरकार और डेवलपर के बीच मतभेद खुलकर सामने आने लगे। नतीजतन, अगस्त 2008 में गुजरात इंफॉर्मेटिक्स लिमिटेड ने कंपनी को अंतिम टर्मिनेशन नोटिस जारी कर दिया। इस नोटिस में स्पष्ट रूप से प्रोजेक्ट साइट को खाली करने और संपत्तियों को वापस सरकार को सौंपने का निर्देश दिया गया था।
कंपनी पर इस मास्टर समझौते के कई गंभीर उल्लंघन करने का आरोप है। इनमें 39 एकड़ से अधिक भूमि का व्यावसायिक दोहन, स्वीकृत भूमि-उपयोग योजना के खिलाफ जाना और निर्माण कार्यक्रम में भारी देरी जैसी बातें शामिल हैं।
इसके अलावा निर्धारित प्रारूप में विकास सुरक्षा (development security) प्रस्तुत न करना, सरकार के साथ राजस्व-साझाकरण के दायित्वों पर विवाद, इन्फोसिटी की संपत्तियों की सीधी बिक्री, विकास खर्चों का भुगतान न करना और जीआईएल के परामर्श से एक स्वतंत्र इंजीनियर व ऑडिटर की नियुक्ति में विफलता भी प्रमुख उल्लंघनों में गिने जाते हैं।
जब इस महत्वाकांक्षी परियोजना की शुरुआत हुई थी, तब इन्फोसिटी गांधीनगर के बाहरी इलाके में स्थित हुआ करता था। लेकिन पिछले दो दशकों में शहर का काफी तेजी से विकास हुआ है और आज यह महत्वपूर्ण आईटी हब पूरी तरह से गांधीनगर शहर के मुख्य दायरे में आ चुका है, जिससे इस भूमि का सामरिक और व्यावसायिक महत्व कई गुना बढ़ गया है।
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