गुजरात के सौराष्ट्र के झाड़ीदार जंगलों से लेकर खेतों और ग्रामीण इलाकों तक, एशियाई शेर अब अपने पारंपरिक ठिकानों की सीमाएं पार कर रहे हैं। विश्व शेर दिवस के अवसर पर इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस द्वारा आयोजित एक सेमिनार में एक बहुत ही अहम अनुमान सामने आया है। इस अनुमान के मुताबिक, साल 2047 तक राज्य में शेरों का इलाका करीब 50,000 वर्ग किलोमीटर तक फैल सकता है।
शेरों के साम्राज्य में होने वाला यह भारी विस्तार इंसान और इन वन्यजीवों के बीच के संवेदनशील रिश्ते को पूरी तरह से बदल सकता है। यह अनुमानित आबादी सौराष्ट्र के 11 जिलों और 80 तालुकाओं तक फैलने की संभावना है।
फिलहाल सौराष्ट्र भर में शेरों का दायरा करीब 35,000 वर्ग किलोमीटर आंका गया है। अनुमान दर्शाते हैं कि अगले दो दशकों में यह प्रजाति अपने क्षेत्र में 15,000 वर्ग किलोमीटर का और विस्तार कर सकती है। इस बढ़ते दायरे का सीधा मतलब यह है कि शेर अब गांवों, खेतों और इंसानी आबादी वाले इलाकों के काफी करीब आ जाएंगे।
इस विषय पर बात करते हुए प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) जयपाल सिंह ने कहा कि गुजरात में शेर संरक्षण की सफलता राज्य भर के लोगों की भागीदारी और उनके प्रयासों का ही नतीजा है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि जैसे-जैसे शेरों का इलाका बढ़ रहा है, संरक्षण के प्रयासों को सिर्फ सुरक्षित जंगलों तक सीमित न रखकर इसमें स्थानीय समुदायों को बड़े स्तर पर शामिल करना होगा।
वहीं, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया (WWF-India) के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज के पूर्व अध्यक्ष दिव्यभानुसिंह चावड़ा ने इस पर एक ज़रूरी चेतावनी दी है। उनके मुताबिक शेरों के इस बढ़ते इलाके के साथ-साथ गुजरात के भीतर ही उनके लिए एक सुरक्षित ‘दूसरा घर’ बनाना बेहद ज़रूरी हो गया है।
उन्होंने बरडा को दूसरा घर बनाए जाने की वर्तमान योजना पर सवाल उठाते हुए कहा कि क्या यह जगह शेरों की मौजूदा आबादी से पर्याप्त भौगोलिक दूरी तय कर पाएगी। चावड़ा ने बताया कि बरडा शेरों के वर्तमान आवास से लगभग 150 किलोमीटर दूर है। इसके बावजूद, कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) जैसी गंभीर बीमारी फैलने की स्थिति में शेरों की एक बड़ी आबादी अब भी खतरे की जद में आ सकती है।
उन्होंने शेरों की बढ़ती संख्या और उनके लिए उपलब्ध सुरक्षित आवास के बीच के भारी असंतुलन को भी उजागर किया। आंकड़ों के अनुसार गुजरात में अभी 891 शेर हैं, जबकि उनके लिए संरक्षित इलाका केवल 1,890 वर्ग किलोमीटर ही है। यह माना जा रहा है कि शेरों की लगभग आधी आबादी संरक्षित क्षेत्रों के बाहर ही अपना जीवन बिता रही है।
इसके साथ ही चावड़ा ने पिछले दो महीनों में एक ही इलाके से सामने आई इंसानों पर हमलों की सात घटनाओं पर भी गंभीर चिंता जताई। उन्होंने मांग की है कि इस बात की गहन जांच होनी चाहिए कि कहीं इन घटनाओं के पीछे कोई अवैध गतिविधियां या अन्य स्थानीय कारण तो ज़िम्मेदार नहीं हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि 50,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में शेरों का दायरा बढ़ने से इंसान और शेरों के बीच टकराव के मामले और भी बढ़ सकते हैं।
अपनी बात खत्म करते हुए चावड़ा ने कहा कि शेरों के लिए दूसरा घर बनाने के लिए गुजरात को मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखानी होगी। उन्होंने याद दिलाया कि शेरों को कुनो (Kuno) ले जाने की पिछली योजनाएं भी आगे नहीं बढ़ पाई थीं। अंत में उन्होंने संरक्षण कार्यों में स्थानीय निवासियों को ज़्यादा रोजगार देने की वकालत की, ताकि आम लोग राज्य की इस गौरवशाली पहचान को बचाने में एक सक्रिय और ज़िम्मेदार भागीदार बन सकें।
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