8 मई 2026 को मुर्शिदाबाद जिले के अपीलीय ट्रिब्यूनल नंबर 11 के पीठासीन अधिकारी और रिटायर्ड जस्टिस इंद्रजीत चटर्जी ने अपील संख्या APS2507E055•••••• में एक अहम आदेश पारित किया। यह मामला फरक्का विधानसभा क्षेत्र (55) के भाग 52 के एक पुरुष मतदाता से जुड़ा था। इस आदेश की दूसरी पंक्ति में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि “यह अतिरिक्त सीईओ द्वारा दायर की गई एक अपील है”, जिसके बाद मतदाता का पूरा नाम दिया गया है।
ठीक तीन दिन बाद, इसी ट्रिब्यूनल ने 59-रघुनाथगंज के भाग 184 की एक महिला मतदाता से जुड़ी अपील संख्या APS2507E059•••••• पर भी आदेश पारित किया। इस आदेश में भी बिल्कुल वही शब्दावली इस्तेमाल की गई और दर्ज किया गया कि यह अपील भी अतिरिक्त सीईओ द्वारा दायर की गई थी।
इन दोनों ही मतदाताओं की जांच विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) के दौरान न्यायिक अधिकारियों द्वारा की गई थी और उन्हें वापस मतदाता सूची में शामिल कर लिया गया था। लेकिन दोनों ही मामलों में उन्हें हटाने के लिए फिर से अपील दायर की गई। ट्रिब्यूनल के रिकॉर्ड यह साफ बताते हैं कि दोनों मामलों में अपीलकर्ता कोई और नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल के अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी (Additional CEO) थे।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, 12 अगस्त को चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के अधिकारियों को पत्र लिखकर सवाल किया कि पश्चिम बंगाल ट्रिब्यूनल के समक्ष आयोग की ओर से अपील दायर करने के लिए किसे अधिकृत किया गया था और वास्तव में ये अपीलें किसने दायर की हैं।
उन्होंने स्पष्ट रूप से दर्ज किया कि न तो उन्हें, न ही चुनाव आयुक्त विवेक जोशी को, और न ही पश्चिम बंगाल के मौजूदा मुख्य निर्वाचन अधिकारी को इन अपीलों को दायर करने के आधार या प्रक्रिया के बारे में कोई जानकारी दी गई थी। हालांकि, इस सवाल के उठने से तीन महीने पहले ही, हाई कोर्ट के एक रिटायर्ड जज दो अलग-अलग मामलों के रिकॉर्ड में इसका जवाब दर्ज कर चुके थे।
इन अपीलों पर मौजूद सीरियल नंबर ही इनकी असलियत बयान कर देते हैं। चुनाव आयोग का अपील पोर्टल हर अपील को एक पहचान संख्या (आइडेंटिफिकेशन नंबर) जारी करता है। जब इन नंबरों की गहराई से जांच की गई, तो वे दो अलग-अलग फॉर्मेट में पाए गए। इन दोनों के बीच का अंतर यह साबित करता है कि कौन सी अपील किसी इंसान ने मैनुअली दायर की है और कौन सी सीधे सिस्टम द्वारा जनरेट की गई है।
पहला फॉर्मेट बीस अक्षरों का है। इसमें राज्य के कोड (APS25) के बाद दो अंकों का जिला कोड होता है। इसके बाद जमा करने के तरीके को दर्शाने वाला एक अक्षर (ऑनलाइन के लिए G और ऑफलाइन के लिए O), फिर DDMMYY के क्रम में छह अंकों की तारीख और अंत में छह अंकों का पहचानकर्ता (आइडेंटिफायर) होता है।
उदाहरण के लिए, जिला 04 (उत्तर दिनाजपुर) के रायगंज में एक मतदाता के खिलाफ अपील APS2504G020426151332 दायर की गई थी। इसमें 020426 की संख्या 2 अप्रैल की फाइलिंग तारीख को दर्ज करती है, और पोर्टल पर इसका समय दोपहर 13:43 बजे दर्ज है।
इसके विपरीत, दूसरा फॉर्मेट 17 अक्षरों का है और इसमें कोई कैलेंडर तारीख मौजूद नहीं होती। राज्य और जिला कोड के बाद, इसमें एक अंग्रेजी वर्णमाला का बैच की (Batch Key), तीन अंकों का विधानसभा क्षेत्र नंबर और छह अंतिम अंक होते हैं। फरक्का की अपील APS2507E055101330 में, जिला कोड 07 मुर्शिदाबाद को और 055 फरक्का विधानसभा क्षेत्र को दर्शाता है।
इस फॉर्मेट में अलग-अलग कैलेंडर तिथियों को सहेजने के बजाय, फाइलिंग की तारीख को एक अल्फाबेटिक बैच की में समेट दिया गया है। सिस्टम के स्टेटस लॉग से यह खुलासा होता है कि एक समान अक्षर वाली हर अपील का समय, अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में होने के बावजूद, बिल्कुल एक समान (मिनट-टू-मिनट) दर्ज है।
चार अक्षर, चार पल और एक बड़ा सवाल
8 अप्रैल को शाम 7.04 बजे पश्चिम बंगाल के विधानसभा क्षेत्र 55 में एक मतदाता के खिलाफ अपील दर्ज की गई। ठीक शाम 7.04 बजे, निर्वाचन क्षेत्र 59 में एक और मतदाता के खिलाफ अपील हुई। इसी समय निर्वाचन क्षेत्र 63 और 207 में भी ऐसा ही हुआ। मतदाता अलग थे, विधानसभा क्षेत्र अलग थे। कुछ मामलों में तो जिले भी अलग थे, लेकिन अपील दर्ज होने का समय बिल्कुल एक ही था।
इन अपीलों की आईडी भी एक ही पैटर्न (APS2507E055…, APS2507E059…, APS2507E063…, APS2516E207…) पर बनाई गई थीं। चुनाव आयोग के अपील पोर्टल के स्क्रीनशॉट यह दिखाते हैं कि कम से कम छह ऐसी अपीलें थीं जिन पर हूबहू 08/04/2026 | 19:04 का टाइमस्टैम्प दर्ज था।
अन्य बैच भी बिल्कुल इसी पैटर्न को फॉलो करते हैं। ‘C’ अक्षर वाली अपीलें 5 अप्रैल को शाम 7.12 बजे से 7.15 बजे के बीच कई निर्वाचन क्षेत्रों में दर्ज की गईं। इसी तरह ‘D’ सीरीज की अपील 6 अप्रैल को शाम 4.48 बजे, ‘E’ सीरीज 8 अप्रैल को शाम 7.04 बजे और ‘F’ सीरीज की अपील 10 अप्रैल को शाम 6.28 बजे सामने आई।
छह दिनों के भीतर शाम के चार ऐसे पल आए, जो यह बताते हैं कि ये अपीलें कई लोगों ने अलग-अलग दायर नहीं कीं। बल्कि, ये चार ऐसे सटीक क्षण थे, जिन्हें एक पूरे बैच के लिए मिनटों तक एक साथ रिकॉर्ड किया गया, चाहे वे किसी भी जिले या निर्वाचन क्षेत्र से संबंधित हों।
फरक्का में एक अपील का स्टेटस स्क्रीन 8 अप्रैल शाम 19:04 बजे की गई कार्रवाई को दर्ज करता है। वहीं, वहां से 25 किलोमीटर दूर एक अलग निर्वाचन क्षेत्र रानीनगर में भी एक अन्य अपील का स्टेटस स्क्रीन हूबहू वही 8 अप्रैल और 19:04 बजे का टाइमस्टैम्प दिखाता है। अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में इस तरह का एक समान निष्पादन इस बात का स्पष्ट संकेत है कि यह फील्ड अधिकारियों द्वारा मैन्युअली की गई फाइलिंग नहीं थी, बल्कि मतदाता सूची पर चलाया गया एक सेंट्रलाइज्ड ऑटोमेटेड स्क्रिप्ट था।
नंबर का स्ट्रक्चर भी यही गवाही देता है। जब कोई व्यक्ति अपील दायर करता है, तो उसमें 20 अक्षरों वाले फॉर्मेट के साथ तारीख दर्ज होती है। लेकिन जब भारी मात्रा में एक साथ सिस्टम से अपील जनरेट होती हैं, तो उसमें कोई व्यक्तिगत समय नहीं होता। इसीलिए दूसरे फॉर्मेट में केवल निर्वाचन क्षेत्र होता है और पूरा बैच एक ही अक्षर से पहचाना जाता है।
फील्ड अधिकारियों की गवाही
कई जिलों में बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) के फील्ड अकाउंट्स भी इन चुनौतियों के स्वचालित होने की पुष्टि करते हैं। बूथ रिकॉर्ड्स रखने वाले अधिकारियों ने पाया कि जिन मतदाताओं को न्यायिक प्रक्रिया के बाद क्लीन चिट मिल गई थी, उनके खिलाफ बिना कोई पूर्व नोटिस दिए या खुद कोई दस्तावेज दाखिल किए बिना ही अपीलें लंबित दिखा दी गईं।
अधिकारियों की बातों का सार एक ही है: न्यायिक प्रक्रिया से गुजरने के बाद सप्लीमेंट्री सूची में वापस लाए गए मतदाताओं के खिलाफ अचानक अपीलें पेंडिंग पाई गईं। इन मतदाताओं ने अपनी तरफ से कुछ दाखिल नहीं किया था और न ही उन्हें कुछ बताया गया था। एक ही बूथ के भीतर, इन सभी अपीलों पर एक ही तारीख और एक ही समय दर्ज था।
यही बात उस समय सार्वजनिक रूप से भी कही जा रही थी। 20 अप्रैल को, पश्चिम बंगाल में बीएलओ द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले एक फेसबुक ग्रुप में एक अधिकारी ने लिखा कि उनके बूथ में वापस जोड़े गए 80 प्रतिशत मतदाताओं के खिलाफ अपील पेंडिंग दिखा रही है। इनमें से किसी ने भी कोई दस्तावेज दाखिल नहीं किया था और हर अपील पर 5 अप्रैल की शाम 7.13 बजे की ही तारीख और समय दर्ज था।
एक अन्य अधिकारी ने भी जवाब दिया कि उनके बूथ में भी ऐसा ही हुआ है, जहां हर अपील का समय 8 अप्रैल, 19:04 बजे दर्ज है। यह वही ‘E’ बैच है, जिसका वर्णन एक फील्ड अधिकारी ने आयोग द्वारा सुप्रीम कोर्ट में ऐसी अपीलों के अस्तित्व को स्वीकार करने से चार महीने पहले ही कर दिया था।
आंकड़े जो चौंकाते हैं: 16 लाख अपीलें
16 सितंबर को, डेरेक ओ’ब्रायन बनाम भारत निर्वाचन आयोग मामले में एक आवेदन के जवाब में, आयोग ने पहली बार ट्रिब्यूनल के सामने अपीलों का ब्यौरा सार्वजनिक किया।
दायर की गई कुल 38,31,429 (लगभग 38 लाख) अपीलों में से 22,21,118 (22 लाख) अपीलें उन मतदाताओं की ओर से थीं, जिनके नाम हटा दिए गए थे। जबकि 16,10,311 (16 लाख से अधिक) अपीलें उन मतदाताओं को सूची में शामिल करने के खिलाफ थीं। कुल 32,77,360 (लगभग 32 लाख) मतदाताओं के मामलों में न्यायिक अधिकारियों ने जांच की और 49.1 प्रतिशत को क्लीन चिट दी। इसका मतलब है कि एक जज द्वारा जिन दो लोगों को सूची में रहने की अनुमति दी गई, उनमें से हर एक को हटाने के लिए एक अपील दायर की गई थी। आयोग ने अदालत को यह संख्या तो बता दी, लेकिन यह नहीं बताया कि आखिर ये अपीलें दायर किसने की थीं।
अधिकारियों ने पहले ही दे दी थी चेतावनी
इस पूरे पैटर्न की शुरुआत पहले ही हो चुकी थी। अप्रैल के इन बैचों से चार महीने पहले ही मतदाता सूची के लिए कानूनी रूप से जिम्मेदार अधिकारियों के संघ ने आयोग को बताया था कि सिस्टम द्वारा उनके अधिकारों को दरकिनार करते हुए, बिना किसी वैधानिक सुनवाई के नामों को हटाया जा रहा है।
24 दिसंबर 2025 को डब्ल्यूबीसीएस (एग्जीक्यूटिव) ऑफिसर्स एसोसिएशन ने पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को ईमेल लिखा था। इसके विषय में स्पष्ट लिखा था, “चल रही एसआईआर प्रक्रिया में ईआरओ (ERO) की वैधानिक भूमिका को दरकिनार करते हुए मसौदा मतदाता सूची से मतदाताओं को सिस्टम द्वारा स्वतः हटाना।”
पत्र में कहा गया था कि बड़ी संख्या में ऐसे मतदाता, जिनके फॉर्म वापस नहीं आए थे, उन्हें मृत्यु, पलायन, अनुपस्थिति या दोहराव के कथित आधार पर ड्राफ्ट रोल से हटा दिया गया। यह जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 22 के खिलाफ है, जिसके तहत किसी भी व्यक्ति का नाम हटाने से पहले उसे सुनवाई का उचित अवसर दिया जाना चाहिए।
अधिकारियों ने अपनी चिंता जताते हुए लिखा था कि ईआरओ को पूरी प्रक्रिया से बाहर रखा गया है, लेकिन आम जनता इसके लिए सिर्फ ईआरओ को ही दोषी मानेगी। इस पत्र की एक प्रति मुख्य चुनाव आयुक्त के निजी सचिव को भी भेजी गई थी।
ट्रिब्यूनल में क्या हो रहा है?
मुर्शिदाबाद के दोनों आदेश यह दिखाते हैं कि जब ये अपीलें बेंच के पास पहुंचती हैं तो क्या होता है। फरक्का मामले में, मौजूदा सूची और 2002 की सूची में माता-पिता के नाम के बेमेल होने को आधार बनाया गया। ट्रिब्यूनल फॉर्म या पैन कार्ड से संतुष्ट नहीं हुआ।
उसने मतदाता को चुनाव आयोग द्वारा अनुमोदित दस्तावेजों के माध्यम से अपने माता-पिता की पहचान साबित करने का निर्देश दिया। चूंकि मतदाता का जन्म 1987 के बाद हुआ था, इसलिए उसे नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2003 के तहत यह साबित करने को कहा गया कि उसकी मां जन्म के समय भारत की नागरिक थी या कम से कम कोई अवैध प्रवासी नहीं थी।
रघुनाथगंज मामले में उम्र की विसंगति का आधार लिया गया। 2002 के रोल में उनकी उम्र 21 साल दर्ज थी, जबकि फॉर्म पर जन्मतिथि 1 जनवरी 1987 थी। ट्रिब्यूनल ने कहा कि इस हिसाब से 2002 में वह 15 साल की रही होंगी और जाहिर है उनके पास वोट देने का अधिकार नहीं हो सकता था। 2002 के रोल में उनका नाम बंगाली में दर्ज था जो मौजूदा रोल से अलग था।
उन्हें यह साबित करने के लिए दस्तावेज लाने का निर्देश दिया गया कि दोनों प्रविष्टियां एक ही व्यक्ति की हैं और वे भारत की नागरिक हैं। आदेश में उन्हें हर जगह “कथित नागरिक” कहा गया है। यह भी दर्ज किया गया कि उन्होंने खुद एक अपील दायर करके बताया था कि उनका वोटर कार्ड हटा दिया गया है जो केवल वोटिंग के लिए ही नहीं बल्कि अन्य सरकारी और निजी कामों के लिए भी जरूरी है। लेकिन ट्रिब्यूनल ने नोट किया कि उनकी अपील “अलग से पंजीकृत नहीं की गई है।” इसका सीधा अर्थ यह था कि प्रशासन की अपील तो आगे बढ़ गई, लेकिन मतदाता की अपनी अपील रजिस्टर ही नहीं हो सकी।
कुछ ट्रिब्यूनल ने नाम के साथ कारण भी बताए, जबकि कुछ ने नहीं। मुर्शिदाबाद में ट्रिब्यूनल नंबर 11 ने सुनवाई के नोटिस में हर नाम के आगे कारण स्पष्ट किया। 14 जुलाई की वर्चुअल सुनवाई के लिए 16 जून को जारी नोटिस में माता-पिता के नाम से लिंक न होने या दस्तावेज अस्पष्ट होने जैसे कारण दिए गए थे। इस नोटिस के 8 में से 6 अपील नंबर 17 अक्षरों वाले ‘E’ बैच के थे, जो सभी निर्वाचन क्षेत्र 059 के लिए थे।
दूसरी ओर, 18 मई को उत्तर दिनाजपुर के अपीलीय ट्रिब्यूनल नंबर 16 द्वारा 22 मई की सुनवाई के लिए जारी नोटिस में 35-रायगंज के तीस अपीलकर्ताओं की सूची बिना किसी कारण के जारी कर दी गई। इन सभी 30 अपीलों के नंबर 20 अक्षरों वाले थे और सभी पर 13 अप्रैल की एक ही फाइलिंग तारीख दर्ज थी। कूचबिहार और पूर्व बर्धमान में भी इसी तरह बिना कारण बताए नोटिस जारी किए गए।
ऑडिट ट्रेल से खुलेगा राज
भारत निर्वाचन आयोग ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि आखिर आयोग की ओर से 16 लाख से अधिक चुनौतियां क्यों दायर की गईं, मतदाताओं का चयन कैसे किया गया और अपील रिकॉर्ड में दिखाई देने वाले एक समान बैच पैटर्न का असली कारण क्या है। इस सवाल का जवाब बिना किसी अटकल के दिया जा सकता है।
इतनी बड़ी मात्रा में रिकॉर्ड प्रोसेस करने में सक्षम हर आधुनिक डेटाबेस सिस्टम अपना एक ऑडिट ट्रेल छोड़ता है। इसमें लॉगिन समय, आईपी एड्रेस, रिकॉर्ड बनने का समय, थोक में किए गए कार्य, एपीआई कॉल और अलग-अलग मामलों में किए गए बदलावों की पूरी जानकारी होती है। ये रिकॉर्ड साबित कर सकते हैं कि 16.10 लाख अपीलें मैन्युअली दर्ज की गई थीं, एक साथ थोक में अपलोड की गई थीं, या डेटाबेस से स्वचालित रूप से जनरेट हुई थीं।
इसी हफ्ते सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में ECINet और ERONet के लॉग्स को संरक्षित करने और उनकी फोरेंसिक जांच की मांग करते हुए पश्चिम बंगाल की इन 16.10 लाख अपीलों को चुनौती दी गई है। हालांकि, ये अदालत के सामने लगाए गए आरोप हैं, अभी तक न्यायिक निष्कर्ष नहीं निकले हैं। लेकिन अब तक उपलब्ध दस्तावेज इस सवाल के दायरे को काफी हद तक सीमित कर देते हैं।
अब रहस्य यह नहीं है कि मतदाताओं को हटाने के लिए कोई बड़ी और केंद्रीकृत योजना थी या नहीं। बल्कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस सिस्टम को जनरेट करने का निर्देश कैसे दिया गया, इस निर्देश को किसने अधिकृत किया, और एक सॉफ्टवेयर द्वारा नाम फ्लैग किए जाने से लेकर मतदाता को सूची से हटाने की अपील दायर करने के बीच आखिर कितनी मानवीय जांच (यदि कोई हुई हो) की गई थी।
यह भी पढ़ें-
डिजिटल पेमेंट पर नए चार्ज से भड़के व्यापारी, 2 अक्टूबर को देश भर में मनेगा ‘नो UPI डे’
900 रुपये के रिफंड के लिए लड़के को RTO से लेकर CMO तक लड़नी पड़ी लड़ाई, अंततः टेकने पड़े घुटने









