नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को घेरने वाला मौजूदा भारी विवाद महज किसी प्रशासनिक विफलता या उनके निजी दुराचार तक सीमित नहीं है। चुनाव आयुक्तों की दर्ज की गई आंतरिक असहमति, स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत अपारदर्शी तरीके से मतदाता सूची से नाम हटाना, एक केंद्रीकृत मतदाता डेटाबेस पर नियंत्रण और कार्यपालिका के कब्जे को सुनिश्चित करने वाली नियुक्ति प्रक्रिया—ये सब भारत के चुनाव आयोग (ECI) पर राजनीतिक कब्जे को उजागर करते हैं। एक निष्पक्ष चुनाव संस्था के बिना, चुनावी जीतों का लोकतांत्रिक अर्थ खत्म हो जाता है और भारतीय लोकतंत्र का भविष्य खतरे में पड़ जाता है।
हालिया खुलासे सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकतांत्रिक वैधता को कैसे कमजोर करते हैं, यह समझना जरूरी है। लोकतांत्रिक वैधता इस बात पर निर्भर करती है कि क्या नागरिक एक स्वतंत्र ‘रेफरी’ द्वारा संचालित नियमों के तहत वोट दे सकते हैं। साथ ही, क्या उन्हें मतदान प्रणाली तक समान पहुंच और सूची से बाहर किए जाने पर चुनौती देने का सार्थक अधिकार मिला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक शक्ति उस लोकतांत्रिक वैधता से आती है जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव जीतने से हासिल होती है।
जब चुनाव आयोग के अपने ही सदस्यों ने मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने, बहाली और डेटाबेस तक पहुंच के तरीके पर बार-बार आपत्ति जताई है—और सीईसी पूरी पारदर्शिता बरतने से इनकार करते हैं—तो मोदी के जनादेश को पैदा करने वाली प्रक्रिया की विश्वसनीयता सीधे तौर पर सवालों के घेरे में आ जाती है। ऐसे में उनके चुनावी जनादेश को लोकप्रिय संप्रभुता की प्रामाणिक अभिव्यक्ति नहीं माना जा सकता।
अकादमिक संदर्भ यह स्पष्ट करता है कि निरंकुश प्रवृत्तियों वाले नेता चुनाव खत्म करने के बजाय उन्हें क्यों कराते रहते हैं। एंड्रियास शेडलर और एडम प्रज़ेवोर्स्की जैसे विद्वानों का कहना है कि ऐसे शासनों में चुनाव इस तरह से डिज़ाइन किए जाते हैं कि वे अभिजात वर्ग को अपने पक्ष में कर सकें, विपक्ष की ताकत को माप सकें और घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकतांत्रिक वैधता का एक जरूरी मुखौटा पेश कर सकें।
जब चुनावी मशीनरी को केंद्रीकृत और नियंत्रित कर लिया जाता है, जैसा कि मौजूदा चुनाव आयोग विवाद में देखा जा रहा है, तो चुनाव एक निष्पक्ष मुकाबला नहीं रह जाते। वे सत्ता को बनाए रखने के एक प्रशासनिक अभ्यास में बदल जाते हैं, जो गैर-लोकतांत्रिक सत्ता को कायम रखने के लिए लोकतंत्र के ढांचे को ही हथियार बना लेता है।
विपक्ष की यह चेतावनी कि ‘समझौता की गई’ मतदाता सूचियों से नाजायज विधायी बहुमत पैदा होता है, इस शासन द्वारा पारित हर कार्यकारी आदेश, संवैधानिक संशोधन और कानून की वैधता को सीधे चुनौती देती है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा लगाए गए ‘वोट चोरी’ के आरोपों को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने पहले ‘खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे’ कहकर खारिज कर दिया था, लेकिन हालिया खुलासों से वे आरोप पुष्ट होते दिखते हैं।
एक जनादेश कानूनी रूप से प्रभावी तो रह सकता है, लेकिन वह अपनी लोकतांत्रिक विश्वसनीयता खो देता है जब जनता उस रेफरी पर ही भरोसा न कर सके जिसने इसे प्रमाणित किया है। सीधे शब्दों में कहें तो जब रेफरी पक्षपाती हो, तो विजेता की ट्रॉफी का शून्य नैतिक और संवैधानिक अधिकार रह जाता है। यह स्थिति मोदी को बिना लोकतांत्रिक वैधता के कार्यकारी सत्ता के नियंत्रण में छोड़ देती है।
कई वैश्विक लोकतांत्रिक सूचकांकों ने मोदी को पुतिन और एर्दोगन द्वारा अपनाई गई ‘चुनावी सत्तावाद’ (electoral authoritarianism) की श्रेणी में ही रखा है। भारत के चुनाव पैनल पर राजनीतिक कब्जा व्लादिमीर पुतिन के रूस, रेसेप तैयप एर्दोगन के तुर्की और शेख हसीना के बांग्लादेश जैसे शासनों द्वारा अपनाई गई प्लेबुक से मेल खाता है।
वी-डेम (V-Dem) सूचकांक मोदी के नेतृत्व वाले भारत को एक ‘चुनावी निरंकुशता’ के रूप में वर्गीकृत करता है, जो 2025 के इलेक्टोरल डेमोक्रेसी इंडेक्स में इसे 0.38 के स्कोर के साथ 179 देशों में 106वें स्थान पर रखता है। फ्रीडम हाउस मोदी के भारत को 100 में से 62 अंकों के साथ “आंशिक रूप से स्वतंत्र” मानता है, जिसमें नागरिक स्वतंत्रता के लिए 60 में से केवल 31 अंक शामिल हैं। द इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट ने भारत को एक “त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र” करार दिया है। इन तीनों ने मोदी शासन के तहत लोकतांत्रिक सुरक्षा उपायों को जानबूझकर खत्म करने का दस्तावेजीकरण किया है। अब तक, भारत की चुनावी प्रक्रिया को इन देशों से थोड़ा अलग देखा जाता था, लेकिन मौजूदा खुलासे उस धारणा को बदल देते हैं।
पुतिन का मॉडल मतदान को खत्म करना नहीं था, बल्कि रेफरी पर कब्जा करके, सूचनाओं को सेंसर करके और कानून को सत्ता बचाए रखने के हथियार के रूप में इस्तेमाल करके सार्थक प्रतिस्पर्धा को खोखला करना था। एर्दोगन ने भी इसी तरह का रास्ता अपनाया, जहां चुनाव तो होते रहे, लेकिन राज्य, अदालतें, मीडिया और चुनावी माहौल शासक के हाथों की कठपुतली बन गए।
मोदी का तरीका अब इसी प्लेबुक का पालन करता हुआ प्रतीत होता है। विपक्षी दलों पर प्रतिबंध लगाने या चुनावों को सीधे रद्द करने के बजाय, ऐसा लगता है कि सरकार ने मतदाता पंजीकरण को नियंत्रित करके, डेटाबेस सॉफ्टवेयर को केंद्रीकृत करके और संस्थागत रेफरियों को प्रभावहीन करके चुनावी मशीनरी को ही अपने पक्ष में कर लिया है। यह रणनीति चुनावों को अनिश्चित लोकतांत्रिक मुकाबलों से बदलकर ऐसे प्रशासनिक अनुष्ठानों में तब्दील कर देती है जहां लोकतांत्रिक रूप केवल गैर-लोकतांत्रिक नियंत्रण को छिपाने के लिए बनाए रखे जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय सूचकांक भी वास्तव में उन्हीं प्रशासनिक वास्तविकताओं का संदर्भ दे रहे हैं जो अब चुनाव आयोग के भीतर उजागर हुई हैं।
इसकी शुरुआत 2023 में मोदी सरकार द्वारा चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर नियंत्रण करने से हुई थी। 2023 का कानून इसके लिए उठाया गया एक अहम कदम था। अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) वाली एक अंतरिम चयन समिति बनाई थी। इसका उद्देश्य तत्कालीन सरकार को चुनाव आयोग की नियुक्तियों पर नियंत्रण करने से रोकना था।
मोदी सरकार ने ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023’ के जरिए उस सुरक्षा कवच को पलट दिया। इसने CJI को हटा दिया और उनकी जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल कर लिया। चयन पैनल में अब प्रधानमंत्री, उनके द्वारा चुना गया एक कैबिनेट मंत्री और विपक्ष का नेता शामिल है, जो कार्यपालिका को स्थायी रूप से दो-एक (2-to-1) का बहुमत देता है। मोदी ने एक ऐसा ढांचा तैयार किया जो चुनाव आयोग पर उनके पूर्ण राजनीतिक नियंत्रण की गारंटी देता है, और विपक्ष के नेता को महज एक मूक दर्शक बना देता है।
ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति ने दिखाया कि यह बदलाव क्यों मायने रखता है। हाल ही में सेवानिवृत्त हुए एक आईएएस अधिकारी, जिन्होंने मोदी-शाह की महत्वपूर्ण वैचारिक परियोजनाओं पर काम किया था, उन्हें नए कानून के तहत फरवरी 2025 में मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में पदोन्नत किया गया।
एक नौकरशाह के रूप में, ज्ञानेश का करियर मोदी शासन के साथ एक ऐसी निकटता को दर्शाता है, जिनकी वैचारिक परियोजनाओं को लागू करने में उन्होंने मदद की। उन्होंने गृह मंत्रालय के कश्मीर डिवीजन में काम किया और 2019 में मोदी सरकार के अनुच्छेद 370 को हटाने और जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन की तैयारी और कार्यान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसके बाद उन्होंने मोदी सरकार की एक और अहम वैचारिक परियोजना, राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से जुड़ा काम संभाला और इसके पदेन सदस्य बने। बाद में उन्होंने अमित शाह के नेतृत्व वाले सहकारिता मंत्रालय में सचिव के रूप में कार्य किया। वह जनवरी 2024 में सेवानिवृत्त हुए और दो महीने बाद चुनाव आयुक्त नियुक्त किए गए। फरवरी 2025 में, वह बदले हुए 2023 के नियुक्ति ढांचे के तहत सीईसी बन गए।
भाजपा ज्ञानेश का पुरजोर तरीके से बचाव कर रही है। भाजपा अपने बेधड़क समर्थन और पश्चिम बंगाल में अपने पार्टी प्रमुख द्वारा ज्ञानेश के लिए ‘पद्म भूषण’ की मांग के जरिए व्यवस्था को नुकसान पहुंचा रही है और सीईसी को और भी ज्यादा बेनकाब कर रही है। भाजपा को एक संवैधानिक पदाधिकारी के मामले में चुप रहना चाहिए था, लेकिन वह ज्ञानेश का बचाव इसलिए कर रही है क्योंकि उसके पास कोई विकल्प नहीं है।
यदि ज्ञानेश के आचरण ने मतदाता सूचियों की अखंडता से समझौता किया है या आयोग को राजनीतिक नियंत्रण के अधीन कर दिया है, तो इसका असर भाजपा द्वारा जीते गए और उनके अधिकार क्षेत्र में निगरानी किए गए हर चुनाव, उपचुनाव और मतदाता सूची संशोधन तक पहुंचता है। यह उस जनादेश की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है जिससे मोदी और भाजपा को केंद्र के अलावा 21 राज्यों में शासन करने का दावा मिलता है।
भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने तर्क दिया कि आंतरिक मतभेद लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली को साबित करते हैं, अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से हुए थे, और विपक्ष चुनाव आयोग के खिलाफ बदनाम करने का अभियान चला रहा है। लेकिन अगर दर्ज की गई आपत्तियां सामान्य तकनीकी चर्चा थीं, तो ज्ञानेश को सभी दस्तावेज जारी करने चाहिए। चुनाव आयोग आपत्तियों, मिनट्स, आदेशों, कानूनी सलाह, अंतिम निर्णयों और राज्य-स्तरीय कार्यान्वयन डेटा को प्रकाशित कर सकता है। अगर उनके सभी फैसले कानूनी थे, तो सीईसी को कानूनी आधार प्रकाशित करना चाहिए। अगर मतदाताओं को गलत तरीके से बाहर नहीं किया गया था, तो चुनाव आयोग देश को दिखाने के लिए जिला-स्तरीय डेटा का खुलासा कर सकता है।
यह पहली बार नहीं है जब भाजपा ने ज्ञानेश का बचाव किया है। 193 विपक्षी सांसदों द्वारा हस्ताक्षरित नोटिस लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति—जो दोनों भाजपा नेता हैं—द्वारा औपचारिक जांच शुरू होने से पहले ही खारिज कर दिए गए थे। पद से हटाने के खिलाफ मिलने वाला संवैधानिक संरक्षण चुनाव आयुक्त को सरकारी धमकियों से बचाने के लिए होता है, न कि विपक्ष द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों से बचाने के लिए। संसदीय बहुमत और पीठासीन अधिकारियों का उपयोग करके वैधानिक जांच को रोककर, मोदी ने ज्ञानेश को सार्वजनिक रूप से जवाबदेह ठहराए जाने से बचाया है।
चुनाव आयोग पर मौजूदा कब्जा भारत के बुनियादी लोकतांत्रिक ढांचे को ध्वस्त करने का एक गंभीर प्रयास है। इतिहासकार ओरनिट शानी का शोध यह दर्शाता है कि 1951-52 में भारत के पहले आम चुनाव सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के प्रति एक कट्टर प्रतिबद्धता पर बनाए गए थे, जिसे एक स्वतंत्र नौकरशाही द्वारा अंजाम दिया गया था। दशकों बाद, टी.एन. शेषन ने इस संवैधानिक जनादेश को संस्थागत रूप दिया, आचार संहिता को सख्ती से लागू किया, और चुनाव आयोग को कार्यकारी शक्ति के खिलाफ एक स्वायत्त संतुलन के रूप में स्थापित किया।
मोदी और ज्ञानेश के नेतृत्व में, इस ऐतिहासिक विरासत को व्यवस्थित रूप से उलट दिया गया है। समावेशी दृष्टिकोण के साथ सार्वभौमिक मताधिकार की रक्षा करने के बजाय, वर्तमान आयोग अपारदर्शी आधारों पर मतदाताओं को बाहर करने वाले प्रशासनिक कार्यों की देखरेख करता है। अपनी स्वतंत्रता का दावा करने के बजाय, ज्ञानेश ने चुनाव आयोग की परिचालन प्राथमिकताओं को मोदी शासन की प्राथमिकताओं के साथ जोड़ दिया है। उनकी भूमिका अहम है क्योंकि वह उस निकाय के प्रमुख हैं जो राज्य से मतदाता की रक्षा करने के लिए जिम्मेदार है। लेकिन मोदी की भूमिका इसलिए बड़ी है क्योंकि उन्होंने उन संवैधानिक शर्तों को बदल दिया जिनके तहत उस निकाय को नियुक्त किया जाता है।
एक सीईसी जो साथी आयुक्तों, विपक्षी दलों और जनता के एक बड़े हिस्से का विश्वास खो चुका है, वह राष्ट्रीय चुनावी प्रणाली की निगरानी जारी नहीं रख सकता। लेकिन सिर्फ ज्ञानेश का इस्तीफा चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता को बहाल नहीं करेगा।
इसके लिए एसआईआर को रोकना; एसआईआर से संबंधित सभी आंतरिक चुनाव आयोग रिकॉर्ड का खुलासा करना; स्वतंत्र न्यायिक या संसदीय जांच; किसी भी मतदाता को हटाने से पहले व्यक्तिगत नोटिस की गारंटी; और वास्तव में गैर-कार्यकारी नियुक्ति तंत्र की बहाली की आवश्यकता होगी, जहां मौजूदा सरकार को निकाय की नियुक्ति में बहुमत प्राप्त न हो। इन सुधारों के बिना, भारत में बस एक ऐसी व्यवस्था होगी जिसमें एक निरंकुश शासक अपना रेफरी खुद चुनता है, नियम बनाता है और नागरिकों से उम्मीद करता है कि वे परिणाम को लोकतंत्र कहें।
उक्त लेख मूल रूप से द वायर वेबसाइट द्वारा प्रकाशित किया जा चुका है.
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