नई दिल्ली: टाइप 2 डायबिटीज का असर पुरुषों और महिलाओं पर एक जैसा नहीं होता है। एक नई रिसर्च में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि जहां पुरुषों में इसके कारण दिल और किडनी से जुड़ी बीमारियों का खतरा काफी बढ़ जाता है, वहीं महिलाओं को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
पीएलओएस मेडिसिन (PLOS Medicine) नामक जर्नल में प्रकाशित इस शोध में लगभग 29,000 मरीजों के स्वास्थ्य आंकड़ों का गहराई से विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने साल 2010 से 2020 के बीच टाइप 2 डायबिटीज का शिकार हुए 28,720 लोगों के प्राइमरी और सेकेंडरी हेल्थकेयर रिकॉर्ड का अध्ययन किया।
ब्रिटेन में हुए इस शोध में औसतन 6.8 वर्षों तक मरीजों को ट्रैक करके उनके ब्लड प्रेशर, हृदय रोग, किडनी फेलियर और मानसिक स्थिति का आकलन किया गया। आंकड़े बताते हैं कि डायबिटीज होने के बाद महिलाओं में एंग्जायटी, डिप्रेशन या सोमाटोफॉर्म डिसऑर्डर जैसी मानसिक बीमारियां होने की आशंका पुरुषों के मुकाबले कहीं अधिक होती है।
रिसर्च के अनुसार, 8.1 प्रतिशत महिलाओं में इस तरह की मानसिक समस्याएं दर्ज की गईं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा महज 5.3 प्रतिशत था। दूसरी ओर, पुरुषों के शरीर पर इस बीमारी का प्रभाव बिल्कुल अलग तरीके से पड़ता है।
डायबिटीज के कारण पुरुषों में कार्डियोवैस्कुलर (हृदय संबंधी) रोग या एंड-स्टेज रीनल (किडनी) डिजीज होने की संभावना ज्यादा होती है। अध्ययन के दौरान 8.4 प्रतिशत पुरुष ऐसी गंभीर बीमारियों के शिकार हुए, जबकि महिलाओं में यह दर 5.3 प्रतिशत देखी गई।
दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के सीनियर एंडोक्रिनोलॉजिस्ट प्रोफेसर रविंदर गोस्वामी भी इस बात से सहमत हैं कि यह बीमारी दोनों वर्गों को अलग-अलग तरह से प्रभावित करती है। उनका कहना है कि पुरुष अक्सर कम उम्र में ही डायबिटीज की चपेट में आ जाते हैं।
प्रोफेसर गोस्वामी ने बताया कि मेनोपॉज से पहले महिलाओं के दिल को जो प्राकृतिक सुरक्षा मिली होती है, वह डायबिटीज होने के कारण छिन जाती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि महिलाओं में सोचने-समझने और याददाश्त से जुड़ी समस्याएं केवल डायबिटीज की वजह से ही नहीं होती हैं। महिलाओं में न्यूरोसाइकिएट्रिक परेशानियां सामान्य तौर पर भी ज्यादा पाई जाती हैं, इसलिए डॉक्टरों को डायबिटीज के इलाज के दौरान इन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
इस पूरी स्टडी में हाइपरटेंशन यानी हाई ब्लड प्रेशर एक ऐसी बीमारी के रूप में सामने आया, जिसने हर उम्र के पुरुषों और महिलाओं को समान रूप से परेशान किया। डायबिटीज के बाद 21.1 प्रतिशत पुरुष और 20.2 प्रतिशत महिलाएं हाई ब्लड प्रेशर के शिकार हुए।
एक खास बात यह भी रही कि पुरुषों में बीमारी से जुड़ी जटिलताएं महिलाओं की तुलना में बहुत पहले ही दिखने लग जाती हैं। रिसर्च ने मानसिक स्वास्थ्य और मृत्यु दर के बीच भी एक गहरा संबंध उजागर किया है। ऐसे मरीज जिन्हें डायबिटीज के बाद मानसिक बीमारियां हुईं, उनकी मृत्यु अपेक्षाकृत जल्दी हो गई।
समान बीमारियों वाले समूह में, पुरुषों की मौत महिलाओं की तुलना में औसतन नौ साल पहले दर्ज की गई। इतनी कम उम्र में जान गंवाने के जोखिम के बावजूद, महिलाएं पुरुषों के मुकाबले स्वास्थ्य सुविधाओं और दवाओं का ज्यादा इस्तेमाल करती पाई गईं। अध्ययन से यह भी पता चला कि हाई-रिस्क वाले पुरुष इलाज को लेकर ज्यादा गंभीर नहीं रहते, जो स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति उनकी दूरी को दर्शाता है।
इन सभी निष्कर्षों से यह साफ हो जाता है कि भविष्य में डायबिटीज के मरीजों के इलाज के लिए लिंग आधारित (सेक्स-स्पेसिफिक) अप्रोच अपनाने की सख्त जरूरत है। शोधकर्ताओं का सुझाव है कि युवा महिलाओं की नियमित रूप से मानसिक स्वास्थ्य जांच होनी चाहिए, जबकि पुरुषों में समय रहते दिल और किडनी की मॉनिटरिंग बेहद जरूरी है।
विशेषज्ञों ने अंत में यह भी जोड़ा कि अगर बीमारियों की टाइमिंग और उनके क्रम पर बारीकी से नजर रखी जाए, तो हाई-रिस्क वाले मरीजों की पहचान कर उनका समय पर इलाज किया जा सकता है। हालांकि, यह एक ऑब्जर्वेशनल स्टडी है, इसलिए यह किसी बीमारी के सटीक कारण और प्रभाव को पूरी तरह से साबित नहीं कर सकती, लेकिन सेहत से जुड़े इन गंभीर खतरों को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।
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