अहमदाबाद की साठ वर्षीय एक महिला ने लिंफोमा जैसी गंभीर बीमारी को मात दी थी। कैंसर मुक्त घोषित होने के दो साल बाद यह जानलेवा बीमारी फिर से लौट आई। ऐसी निराशाजनक स्थिति में उनके लिए ‘कार-टी’ (CAR-T) सेल थेरेपी एक नई उम्मीद की किरण बनकर सामने आई।
अपोलो अस्पताल के हेमेटो-ऑन्कोलॉजी विभाग के मुख्य सलाहकार डॉ. वेलु नायर ने बताया कि इस मरीज को CAR-T सेल थेरेपी लेने की सलाह दी गई थी। कुछ महीने पहले ही उन्हें यह अत्याधुनिक उपचार दिया गया और अब उनकी हालत पूरी तरह से स्थिर है। डॉ. नायर के अनुसार, उनके केंद्र में अब तक ऐसे दो सफल प्रोसीजर किए जा चुके हैं और कुछ अन्य मामलों पर भी प्रक्रिया चल रही है। उन्होंने इस थेरेपी के नतीजों को बेहद उत्साहजनक बताया है।
काइमेरिक एंटीजन रिसेप्टर (CAR) टी-सेल थेरेपी एक नए जमाने की टार्गेटेड उपचार पद्धति है। यह मुख्य रूप से उन ब्लड (हेमेटोलॉजिकल) कैंसर के मरीजों के लिए काम करती है, जिनकी बीमारी वापस लौट आई है या जिन पर पारंपरिक इलाज का कोई असर नहीं हो रहा है।
हेमेटोलॉजिस्ट्स का कहना है कि इस थेरेपी को शुरू हुए दो साल बीत चुके हैं। शहर के कई निजी अस्पतालों में यह सुविधा उपलब्ध है और अब तक करीब 50 मरीजों का इससे इलाज किया जा चुका है। हालांकि, अन्य पारंपरिक उपचारों की तुलना में इसकी अधिक लागत इसका एक बड़ा नुकसान मानी जा रही है।
इस तकनीक के काम करने के तरीके को समझाते हुए डॉ. नायर बताते हैं कि टी-सेल्स हमारे शरीर के असली सैनिक होते हैं। CAR-T सेल थेरेपी के दौरान, मरीज के शरीर से इन टी-सेल्स को निकाला जाता है और उन्हें बायोइंजीनियर करके वापस शरीर में स्थापित कर दिया जाता है, जिससे वे कैंसर से मजबूती से लड़ सकें।
एचसीजी आस्था कैंसर सेंटर के हेमेटोलॉजी और बीएमटी सलाहकार डॉ. कौमिल पटेल ने हाल ही में एक मरीज पर अपनी पहली CAR-T थेरेपी सफलतापूर्वक की है। यह मरीज प्राइमरी रिफ्रैक्टरी लिंफोमा नामक एक आक्रामक ब्लड कैंसर से जूझ रहा था, जिस पर कोई भी सामान्य इलाज असर नहीं कर रहा था।
डॉ. पटेल के मुताबिक, जिन मरीजों में लिंफोमा वापस लौट आता है या जो रिफ्रैक्टरी कैंसर से पीड़ित हैं, उनके लिए यह थेरेपी एक बहुत बड़ा अवसर प्रदान करती है, खासकर तब जब बाकी सभी विकल्प नाकाम हो चुके हों। उन्होंने बताया कि आमतौर पर ब्लड कैंसर के मरीजों के लिए उपलब्ध पारंपरिक उपचारों में इम्यूनोथेरेपी और कीमोथेरेपी शामिल हैं।
एचओसी वेदांता (HOC Vedanta) के हेमेटो-ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. संदीप शाह ने भी इस नई तकनीक से कई सफल इलाज किए हैं और उन्हें भी इसके परिणाम काफी सकारात्मक मिले हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि डॉक्टर और मरीज दोनों मिलकर इसके फायदे और नुकसान का गहराई से विश्लेषण करते हैं। डॉ. शाह का कहना है कि यह थेरेपी हर किसी के लिए नहीं है, इसलिए प्रत्येक व्यक्तिगत मामले के गुणों और स्थिति का आकलन करने के बाद ही इसे अपनाने का निर्णय लिया जाना चाहिए।
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