राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने गांधीनगर में 2 और 3 सितंबर को अपनी खुली सुनवाई के दौरान गुजरात में पुलिस की भारी लापरवाही और मनमानी कार्रवाई के कई मामले उजागर किए हैं। आयोग के इस विशेष शिविर में राज्य के भीतर प्रशासन और कानून व्यवस्था से जुड़ी कई ऐसी कमियां सामने आईं, जिन्होंने मानवाधिकारों के संरक्षण पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
दो दिनों तक चले इस गहन मंथन में मानवाधिकारों के उल्लंघन, शराबबंदी कानून को लागू करने में पुलिस की विफलता, खाद्य सुरक्षा और पॉक्सो (POCSO) एक्ट से जुड़े मामलों पर चर्चा हुई। इसके साथ ही, असंगठित क्षेत्र में महिलाओं के यौन उत्पीड़न (POSH) और संस्थागत देखभाल के मुद्दों पर भी शिकायतकर्ताओं, राज्य के अधिकारियों और गैर-सरकारी संगठनों के साथ लंबी बातचीत की गई।
आयोग के अध्यक्ष जस्टिस वी. रामासुब्रमण्यन और अन्य सदस्यों ने मिलकर कुल 45 मामलों की सुनवाई की। हालांकि, स्थिति का आकलन करने के बाद आयोग ने स्पष्ट किया कि पुलिस विभाग में कुछ व्यक्तिगत अधिकारियों या टीमों की गलतियां जरूर पाई गई हैं, लेकिन इसे पूरे तंत्र की नाकामी नहीं कहा जा सकता।
सुनवाई के दौरान अधिकारियों द्वारा पेश की गई अनुपालन रिपोर्ट के आधार पर 27 मामलों को बंद कर दिया गया। राहत की बात यह रही कि इन मामलों में अधिकारियों ने पीड़ितों को 3.5 करोड़ रुपये से अधिक का मुआवजा देने की पुष्टि की। वहीं, भावनगर के भीषण जहरीली शराब कांड में, जहां 13 से अधिक लोगों की जान चली गई थी, आयोग ने कड़ा रुख अपनाते हुए ‘एक्शन टेकन रिपोर्ट’ (कार्रवाई रिपोर्ट) तलब की है।
इस शिविर में कई बेहद संवेदनशील मामलों पर भी विचार किया गया। अमरेली में पायल गोटी की गैरकानूनी गिरफ्तारी और उनके साथ हुए सार्वजनिक दुर्व्यवहार के मामले में आयोग ने 7.5 लाख रुपये के मुआवजे की सिफारिश की है।
इसके अलावा हिरासत में मौत, पुलिस अत्याचार, नागरिक लापरवाही और बाल त्रासदियों जैसे मामलों की भी जांच की गई। मानवाधिकार कार्यकर्ता कांतिलाल परमार ने अमरेली सिविल अस्पताल में हनीबेन हरेशभाई की कथित मौत, दाहोद में एक महिला को सरेआम निर्वस्त्र कर पीटने और राजकोट में हिरासत में हुई मौत के मामलों को आयोग के संज्ञान में लाया।
दलित समुदाय के लिए श्मशान घाट की कमी का मुद्दा भी इस सुनवाई में प्रमुखता से छाया रहा। धोल्का के सथल गांव में अनुसूचित जाति के लोगों को अंतिम संस्कार के लिए दशकों से 12 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था। आयोग के सीधे दखल के बाद, गांव की गोचर भूमि को श्मशान में बदलने का प्रस्ताव पारित किया गया, जिससे करीब 80 साल के लंबे इंतजार के बाद गांव में ही अंतिम संस्कार संभव हो सकेगा।
इन महत्वपूर्ण सुनवाइयों के बीच कुछ बेहद गंभीर मामले ऐसे भी रहे जो आयोग की जांच के दायरे से बाहर रह गए। इनमें अहमदाबाद के चिराग वाला का मामला शामिल है, जिसके लापता होने की रिपोर्ट दर्ज होने के बावजूद पुलिस ने उसके शव को “लावारिस” मानकर जला दिया था। इसी तरह, वेजलपुर पुलिस स्टेशन में 64 वर्षीय जहीरुद्दीन शेख की हिरासत में मौत का मामला भी इस बार आयोग की नजरों से बच गया।
इसके अतिरिक्त, अहमदाबाद के रामोल में इस साल अवैध पटाखा फैक्ट्री में हुए धमाके में 10 लोगों की मौत और पिछले साल बनासकांठा के डीसा में ऐसे ही एक विस्फोट में 21 लोगों की मौत के मामले भी आयोग की समीक्षा का हिस्सा नहीं बन पाए।
मजदूरों की सुरक्षा और नागरिक लापरवाही के मुद्दे भी सुनवाई के दौरान उठाए गए। भरूच की एक केमिकल फैक्ट्री में आग और धमाके में जान गंवाने वाले पांच मजदूरों के परिवारों को मुआवजा मिल चुका है।
वहीं, दाहेज के एक प्लांट में जहरीली गैस के रिसाव से मारे गए चार श्रमिकों के परिजनों को 2 करोड़ रुपये से अधिक की राशि प्रदान की गई है। इसके अलावा, अहमदाबाद में एक विज्ञापन होर्डिंग गिरने से तीन मजदूरों की मौत के मामले में आपराधिक कार्यवाही शुरू कर दी गई है।
अंत में, बंधुआ मजदूरी से जुड़े 27 कथित मामलों पर भी गंभीर चर्चा हुई। जस्टिस रामासुब्रमण्यन ने चिंता जताते हुए कहा कि मौसमी और प्रवासी मजदूर अक्सर प्रशासन की कार्रवाई होने से पहले ही तितर-बितर हो जाते हैं, जिससे कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाती।
उन्होंने ईंट भट्टों के लिए बिचौलियों को दिए जाने वाले अग्रिम भुगतान को भी रेखांकित किया और इसे गुजरात में बंधुआ मजदूरी का एक गंभीर लेकिन अनदेखा रूप करार दिया।
यह भी पढ़ें-
गुजरात: जवान बेटे को खोने वाले बुजुर्ग दंपति को हाईकोर्ट से मिली IVF की अनुमति











