अहमदाबाद: गुजरात के कई हिस्सों में लंबे समय से बारिश न होने के कारण सूखे जैसे गंभीर हालात पैदा हो गए हैं। खेतों में खड़ी फसलें अब तेजी से सूख रही हैं, जिससे किसानों की चिंताएं और बेचैनी आसमान छूने लगी हैं।
इस गहराते संकट के बीच विपक्ष ने सरकार पर दबाव बनाते हुए प्रभावित इलाकों को सूखाग्रस्त घोषित करने और तत्काल मुआवजे की मांग की है। वहीं, राज्य सरकार ने भी स्थिति की गंभीरता को स्वीकार करते हुए कम बारिश वाले जिलों में पानी और चारे की पर्याप्त व्यवस्था की समीक्षा शुरू कर दी है।
राज्य के अधिकांश हिस्सों में मानसून की लंबी खामोशी ने मिट्टी की नमी को खतरनाक स्तर तक कम कर दिया है। इसके चलते फसलों पर बर्बादी का गहरा असर साफ दिखने लगा है। खेतों में सूखती इन फसलों को लेकर एक नया सियासी घमासान छिड़ गया है, जहां कांग्रेस पार्टी लगातार सवाल उठा रही है कि संकट की इस भयानक घड़ी में किसानों को फौरी तौर पर क्या राहत दी जा रही है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमित चावड़ा ने स्थिति पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि किसान पहले से ही महंगे बीज, खाद, कीटनाशकों और खेती की अन्य लागतों के कारण भारी आर्थिक दबाव में हैं। अब इस लंबे सूखे ने उनकी कमर तोड़ कर रख दी है और उनकी परेशानियों को कई गुना बढ़ा दिया है।
विपक्षी दल का दावा है कि गुजरात के 34 में से 12 जिलों में लगभग एक महीने से बारिश की एक बूंद नहीं गिरी है और कई तालुकाओं में हालात बद से बदतर हो चुके हैं। पार्टी ने सरकार से पुरजोर मांग की है कि कम बारिश वाले इलाकों की तुरंत पहचान कर उन्हें कमी वाले क्षेत्र घोषित किया जाए और ‘मुख्यमंत्री किसान सहाय योजना’ के तहत राहत कार्य फौरन शुरू किए जाएं।
विपक्ष ने किसानों के फसली ऋण और कृषि बिजली बिल माफ करने की भी जोरदार वकालत की है। इसके अलावा प्रभावित क्षेत्रों में पशुओं के लिए चारे के डिपो खोलने, मनरेगा (विकसित भारत-जी राम जी) के तहत काम का दायरा बढ़ाने, फसलों के नुकसान का तुरंत सर्वे कराने और किसानों को उचित मुआवजा देने की मांग भी उठाई गई है।
किसान कांग्रेस के अध्यक्ष पाल अंबालिया ने स्पष्ट किया कि जब बारिश में कमी एक तय सीमा को पार कर जाती है, तो मौजूदा सरकारी और केंद्रीय दिशा-निर्देशों में हालात से निपटने के स्पष्ट प्रावधान हैं।
उन्होंने कहा कि पार्टी किसी नई नीति की मांग नहीं कर रही है, बल्कि केवल मौजूदा नियमों को ही सख्ती से लागू करने की बात कह रही है। विपक्ष ने खुली चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही राहत उपायों की घोषणा नहीं की गई, तो एक बड़ा आंदोलन खड़ा किया जाएगा।
दूसरी ओर, बनासकांठा की सांसद गेनीबेन ठाकोर ने भी इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री को एक पत्र लिखा है। उन्होंने अपने पत्र में गंभीर रूप से प्रभावित तालुकाओं को सूखाग्रस्त घोषित करने की अपील की है। इसके साथ ही, उन्होंने भारी किल्लत का सामना कर रहे क्षेत्रों में टैंकरों के जरिए पीने का पानी, सिंचाई के लिए जल और पशुओं के लिए चारे की तत्काल व्यवस्था करने की मांग की है।
इस संकट के बीच सामने आ रहे गैर-आधिकारिक अनुमानों ने चिंता को और भी गहरा कर दिया है। ऐसा माना जा रहा है कि अगर सूखे का यह दौर यूं ही जारी रहा, तो राज्य में प्रमुख फसलों के उत्पादन में लगभग 1.8 लाख से 2 लाख मीट्रिक टन तक की भारी गिरावट आ सकती है।
वर्तमान समर्थन मूल्य के आधार पर इस संभावित आर्थिक नुकसान का आकलन करीब 45,000 करोड़ से 55,000 करोड़ रुपये के बीच किया गया है। हालांकि, वास्तविक नुकसान का अंतिम आंकड़ा इस बात पर निर्भर करेगा कि मानसून के शेष दिनों में कितनी बारिश होती है।
दक्षिण गुजरात के इलाके इस मामले में थोड़े भाग्यशाली रहे हैं, जहां अब तक अपेक्षाकृत बेहतर बारिश हुई है, जिससे वहां सूखे का तत्काल प्रभाव कुछ हद तक कम हुआ है। लेकिन राज्य के अन्य क्षेत्र अभी भी बेहद संवेदनशील स्थिति में हैं और अगर बारिश नहीं हुई तो हालात बेकाबू हो सकते हैं।
उधर, राज्य सरकार का कहना है कि वह पूरी स्थिति पर पैनी नजर बनाए हुए है। हाल ही में हुई कैबिनेट की बैठक में कच्छ, जामनगर और देवभूमि द्वारका जैसे कम बारिश वाले इलाकों में सूखे जैसे हालात की बारीकी से समीक्षा की गई। सरकार का मुख्य जोर चारे और पीने के पानी की कमी को दूर करने पर है।
जिला कलेक्टरों को चारे की व्यवस्था के संबंध में जरूरी फैसले लेने के अधिकार सौंप दिए गए हैं। साथ ही, अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे पर्याप्त स्टॉक बनाए रखें और यह सुनिश्चित करें कि प्रभावित क्षेत्रों में पीने के पानी का कोई संकट उत्पन्न न हो।
इन तमाम राजनीतिक और प्रशासनिक हलचलों के बीच गुजरात के किसानों के लिए सबसे बड़ी चिंता यही है कि बारिश का यह सूखा आखिर कब तक चलेगा। अगर आने वाले दिनों में अच्छी बारिश हो जाती है, तो किसानों को बड़ी राहत मिल सकती है। लेकिन अगर मानसून ने इसी तरह लंबा ब्रेक लिया, तो फसल का नुकसान एक भयानक रूप ले लेगा, जो केवल कृषि संकट तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे ग्रामीण अर्थतंत्र के लिए एक बड़ा और गहरा खतरा बन जाएगा।
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