गुजरात हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए साफ किया है कि दांपत्य अधिकारों (कंजुगल राइट्स) को लागू कराने के लिए पुलिस का सहारा नहीं लिया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि कानून के मुताबिक किसी भी जोड़े को पुलिस या कोर्ट के आदेश द्वारा जबरन एक साथ रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।
इस अहम टिप्पणी के साथ ही हाईकोर्ट ने एक फैमिली कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें दांपत्य जीवन की बहाली के निर्देश दिए गए थे। दरअसल, निचली अदालत ने पुलिस को आदेश दिया था कि वह एक महिला को राजकोट स्थित उसके पति के घर छोड़कर आए। पति ने पुलिस के इस तरह के दखल पर कड़ी आपत्ति जताते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
इस कानूनी विवाद की शुरुआत साल 2008 में हुई थी जब इस जोड़े की शादी हुई थी। उनका एक बेटा भी है, लेकिन पिछले 16 सालों से दोनों एक-दूसरे से अलग रह रहे हैं। पति राजकोट के एक कॉलेज में लेक्चरर के पद पर कार्यरत है और उसने अपने पैतृक स्थान राजस्थान के सीमलवाड़ा कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल की हुई है।
दूसरी तरफ, अरावली जिले के मोडासा में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के रूप में काम करने वाली पत्नी ने अपने दांपत्य अधिकारों की बहाली के लिए अर्जी लगा दी। उसने हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 9 के तहत फैमिली कोर्ट में मुकदमा दायर किया था। अदालत ने उसकी याचिका स्वीकार करते हुए जनवरी 2025 में एक डिक्री पारित की और पति को 30 दिनों के भीतर पत्नी को वापस अपने साथ रखने का आदेश दिया।
पति ने एडवोकेट धर्मेश पटेल के जरिए फैमिली कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की। लेकिन यह अपील अभी लंबित ही थी कि पत्नी ने डिक्री के पालन और पुलिस सुरक्षा की मांग को लेकर फैमिली कोर्ट में एक और आवेदन दे दिया। इस पर कार्रवाई करते हुए फैमिली कोर्ट ने राजकोट के संबंधित पुलिस इंस्पेक्टर को निर्देश दिया कि वह महिला को उसके ससुराल लेकर जाए और उसका वहां प्रवेश सुनिश्चित करे।
पुलिस को शामिल करने वाले इस आदेश को पति ने तुरंत चुनौती दी। अदालत में यह तर्क दिया गया कि सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश 21, नियम 32 में दांपत्य अधिकारों की डिक्री के निष्पादन का प्रावधान तो है, लेकिन आदेश न मानने की स्थिति में इसमें केवल संपत्ति कुर्क करने की बात कही गई है। किसी भी स्थिति में पुलिसकर्मियों द्वारा इसे जबरन लागू कराने की कोई व्यवस्था कानून में नहीं है। इन तर्कों के आधार पर एडवोकेट पटेल ने मुख्य डिक्री पर ही रोक लगाने की जोरदार मांग रखी।
इस पूरे मामले और कानूनी दलीलों को सुनने के बाद जस्टिस इलेश वोरा और जस्टिस आर. टी. वच्छानी की पीठ ने अहम आदेश पारित किया। जजों ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए जो अंतरिम राहत मांगी गई है, उसका उचित आधार बनता है। इसी के साथ अदालत ने अपील के अंतिम निपटारे तक पैरा-11(बी) के संदर्भ में मांगी गई अंतरिम राहत मंजूर कर ली।
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