अहमदाबाद के रामोल इलाके में चल रही एक अवैध पटाखा फैक्ट्री में हुए भीषण धमाके ने नौ लोगों की जान ले ली है। मरने वालों में तीन मासूम बच्चे भी शामिल हैं। इस दर्दनाक हादसे ने एक बार फिर से बंधुआ बाल मजदूरी के उन गंभीर आरोपों को हवा दे दी है, जो पिछले एक दशक से इस फैक्ट्री से जुड़े हैं। पूर्व में हुई ऐसी ही घटना और पुलिस कार्रवाई के बावजूद इस खौफनाक खेल का जारी रहना कई बड़े सवाल खड़े करता है।
यह पहली बार नहीं है जब इस जगह पर ऐसा कोई जानलेवा हादसा हुआ हो। इससे पहले जुलाई 2014 में भी इसी परिसर में एक बड़ा धमाका हुआ था, जिसमें एक 14 वर्षीय किशोर की मौत हो गई थी। साल 2014 की उस घटना के दौरान 14 साल के उस मृतक और उसके 16 वर्षीय बड़े भाई को इस फैक्ट्री में जबरन काम करने के लिए मजबूर किया गया था। दरअसल, फैक्ट्री मालिक इन दोनों बच्चों से उनके बड़े भाई द्वारा लिए गए 20,000 रुपये के एडवांस को चुकाने के लिए बंधुआ मजदूरी करवा रहे थे।
मृतक के सबसे बड़े भाई नरेंद्र चुनारा ने बताया कि वह पहले खुद इस खतरनाक फैक्ट्री में काम करते थे। लेकिन शादी के बाद उनके ससुर की जिद पर उन्हें यह जानलेवा नौकरी छोड़नी पड़ी। नरेंद्र के अनुसार, उन्होंने फैक्ट्री की एक मालिक रमीला डोडिया से 20,000 रुपये का एडवांस लिया था। उनके काम छोड़ने के बाद मालकिन ने उस पैसे की वसूली के लिए उनके दोनों छोटे भाइयों को काम पर लगा दिया।
नरेंद्र का आरोप है कि रमीला डोडिया स्कूल के बाद उनके दोनों मासूम भाइयों को फैक्ट्री ले जाती थी। वहां उनसे बिना एक भी रुपया दिए रोजाना आठ से दस घंटे तक कड़ी मेहनत करवाई जाती थी। मालकिन का कहना था कि यह काम उस एडवांस रकम के बदले में किया जा रहा है।
नरेंद्र ने बताया कि छोटे भाई की मौत के बाद पुलिस में शिकायत जरूर दर्ज हुई, लेकिन उन्हें कभी न्याय नहीं मिला। साल 2020 में यह फैक्ट्री फिर से चालू हो गई और दोबारा यहां मासूम बच्चों को काम पर रख लिया गया।
बीते शनिवार को हुए ताजा धमाके के बाद स्थानीय लोगों ने भी दावा किया है कि इस फैक्ट्री में नाबालिग बच्चों को लगातार काम करते हुए देखा गया था। रामोल के पुलिस इंस्पेक्टर एम. आर. चौधरी का कहना है कि जांचकर्ता बाल मजदूरी के इन गंभीर आरोपों की बारीकी से जांच कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि परिसर से बच्चों के शव बरामद हुए हैं, ऐसे में यह सवाल बेहद गंभीर हो जाता है कि वे बच्चे वहां काम कर रहे थे या केवल अपने माता-पिता के साथ रह रहे थे।
इंस्पेक्टर चौधरी ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार की ओर से एक बाल श्रम अधिकारी ने इस पूरे मामले की आधिकारिक जांच शुरू कर दी है। वहीं, इलाके के निवासियों का साफ तौर पर आरोप है कि फैक्ट्री में कुछ खास कामों के लिए 11 से 14 साल के बच्चों को ही ज्यादा तरजीह दी जाती थी। स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, बच्चों की उंगलियां छोटी और नाजुक होती हैं, इसलिए उनसे मुख्य रूप से पटाखों के फ्यूज तैयार करवाने का काम लिया जाता था।
अतिरिक्त पुलिस आयुक्त जयपाल सिंह राठौड़ ने कहा कि उन्हें शक है कि शनिवार के धमाके में जान गंवाने वाले बच्चे वहां अपने माता-पिता के साथ ही रह रहे थे। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस फैक्ट्री में बाल मजदूरी होती थी या नहीं, इसका अंतिम सच मुख्य आरोपी मेहुल डोडिया से पूछताछ के बाद ही सामने आ पाएगा।
इस भीषण त्रासदी ने 19 वर्षीय असरार अली सैयद की दर्दनाक कहानी को भी दुनिया के सामने ला दिया है, जिसकी शनिवार के धमाके में मौत हो गई। असरार के एक रिश्तेदार ने बताया कि उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी। अपने परिवार का पेट पालने के लिए असरार ने महज 11 साल की छोटी सी उम्र में ही इस पटाखा फैक्ट्री में काम करना शुरू कर दिया था, और दुर्भाग्य से इसी जगह ने अंततः उसकी जान ले ली।
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