मैं मलाला हूँ। मेरा जन्म 12 जुलाई 1997 को पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के स्वात जिले में मलाला यूसुफजई के रूप में हुआ था। मेरा परिवार निम्न-मध्यम वर्ग का था और हमारी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। मेरे पिता एक शिक्षाविद् थे जो गांव में लड़कियों का स्कूल चलाते थे, और मेरी माँ एक गृहिणी थीं। पैसों की कमी के कारण मेरा जन्म किसी अस्पताल में नहीं, बल्कि पड़ोसियों की मदद से घर पर ही हुआ था। मेरा नाम ‘मलाला’ दक्षिणी अफगानिस्तान की एक प्रसिद्ध पश्तून कवयित्री और योद्धा मलालई के नाम पर रखा गया है, जिसका अर्थ है ‘शोक-संतप्त’।
मैं मलाला हूँ और मेरा शिक्षा में गहरा विश्वास है। एक छोटी बच्ची के तौर पर मुझे स्कूल जाना बहुत पसंद था। लेकिन जब तालिबान ने मेरी स्वात घाटी पर कब्ज़ा किया, तो मेरी ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई। उन्होंने टीवी देखने, संगीत सुनने और लड़कियों के स्कूल जाने पर पाबंदी लगा दी। उनके आदेश न मानने वालों को कड़ी सज़ा दी जाती थी। महज़ ग्यारह साल की उम्र में मुझे अपने दोस्तों और स्कूल से दूर होना पड़ा। उसी उम्र में मैंने कार्यकर्ता के रूप में लड़कियों के शिक्षा के अधिकार के लिए आवाज़ उठानी शुरू की और बीबीसी उर्दू के लिए ब्लॉग लिखना शुरू किया।
मैं मलाला हूँ। तालिबान को मेरी यह बगावत बिल्कुल पसंद नहीं आई। दुनिया के सभी कट्टरपंथियों का डीएनए एक जैसा होता है, चाहे वह अमेरिका का कू क्लक्स क्लान हो, इज़राइल का लेहावा हो, या फिर हिंदुत्ववादी। जब कोई उनके खिलाफ खड़ा होता है और उनके जघन्य अपराधों को उजागर करता है, तो वे खतरा महसूस करने लगते हैं। 9 अक्टूबर 2012 के उस मनहूस दिन, एक नकाबपोश तालिबानी मेरे स्कूल बस में घुसा और मेरे सिर के बायीं ओर गोली मार दी। दस दिन बाद जब मुझे होश आया, तो मैं इंग्लैंड के बर्मिंघम के एक अस्पताल में थी। मेरी ज़िंदगी बदल चुकी थी और मैंने तय कर लिया था कि मुझे अब कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना है।
मैं मलाला हूँ। ‘आई एम मलाला: द स्टोरी ऑफ द गर्ल हू स्टुड अप फॉर एजुकेशन एंड वाज शॉट बाय द तालिबान’ मेरे जन्म से लेकर गोली लगने तक के सफर की कहानी है। क्रिस्टीना लैंब के साथ लिखी गई यह किताब 8 अक्टूबर 2013 को प्रकाशित हुई और दुनिया भर में बेस्टसेलर बन गई। भले ही कुछ जगहों पर इसे प्रतिबंधित कर दिया गया हो, लेकिन इसमें मेरे अपने विचार और ज़िंदगी को देखने का मेरा नज़रिया गहराई से समाहित है।
मैं मलाला हूँ। आप मेरी निराशा का अंदाज़ा लगा सकते हैं जब अहमदाबाद के एक प्रतिष्ठित स्कूल ने अपनी रीडिंग लिस्ट से मेरी किताब और ऐनी फ्रैंक की बहुचर्चित किताब ‘द डायरी ऑफ ए यंग गर्ल’ को हटा दिया। शिक्षा अधिकारियों के आदेश और स्कूल पर लगे जुर्माने के बाद यह फैसला लिया गया। यह बात सिर्फ मेरी किताब की नहीं है, बल्कि उस सड़ी हुई व्यवस्था की है जहां छात्रों को कम उम्र में ही बहुलवादी विचारों से वंचित किया जा रहा है। विडंबना यह है कि इन्हीं बच्चों के माता-पिता आगे चलकर उन्हें उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजने को बेताब रहते हैं।
मैं मलाला हूँ। यह देखकर काफी राहत मिली कि गुजरात और अन्य जगहों के 150 से अधिक नागरिकों के एक समूह ने इन किताबों को हटाए जाने की कड़ी निंदा की। उन्होंने मांग की कि छात्रों को समग्र शिक्षा देने में कोई बाहरी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। उनके बयान में कहा गया कि महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को समझने और नाज़ी शासन के ऐतिहासिक दौर को जानने के लिए ये दोनों किताबें आज के छात्रों के लिए बेहद ज़रूरी संसाधन हैं।
मैं मलाला हूँ। अहमदाबाद के ‘स्टूडेंट एंड यूथ कलेक्टिव’ की सराहना की जानी चाहिए जिन्होंने 27 अगस्त को एक सार्वजनिक पार्क में ‘मौन पठन सत्र’ आयोजित किया। युवा आयोजकों ने सेंसरशिप का विरोध करते हुए पोस्टर बनाए जिनमें डर और हस्तक्षेप से मुक्त शिक्षा की मांग की गई थी। छात्रों और युवाओं ने इस अनूठे विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया और किताबें पढ़कर यह संदेश दिया कि आज के भारत में ऐसी स्वतंत्र सोच को बढ़ावा देना क्यों ज़रूरी है। युवाओं की यह शक्ति सच में अद्भुत थी।
मैं मलाला हूँ। लेकिन तभी वहां हिंदुत्व ब्रिगेड के गुंडे आ धमके। उनकी और तालिबान की मानसिकता में चौंकाने वाली समानताएं हैं। वे बस चीख-चिल्ला रहे थे और कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे। लाठियों और हॉकी स्टिक से लैस होकर उन्होंने निर्दोष नागरिकों को पीटा। उन्होंने साबित कर दिया कि वे महज़ फासीवादी गुंडे हैं जो एक बहुलवादी और धर्मनिरपेक्ष भारत के विचार को नष्ट करने पर तुले हैं।
मैं मलाला हूँ। इस हमले की लगभग सभी ने निंदा की है। पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL-गुजरात) ने लोकतंत्र पर हुए इस प्रहार पर एक कड़ा और विस्तृत बयान जारी किया है। बयान में साफ कहा गया है कि किसी सार्वजनिक पार्क में बैठकर किताब पढ़ने का अधिकार पवित्र है। महिलाओं पर हमला हुआ और सिर्फ इसलिए लोगों को अस्पताल जाना पड़ा क्योंकि उनके हाथों में किताबें थीं और उन्मादी भीड़ को उनके धर्म पर शक था। भीड़ को शांत करने के लिए जब राष्ट्रगान गाया गया, तब भी उनकी हिंसा कम नहीं हुई, बल्कि और बढ़ गई।
मैं मलाला हूँ। मैं जो हूँ, बस वही हूँ। मैंने उन फासीवादी, कट्टरपंथी और सामंती ताकतों से भिड़ने की हिम्मत की है जिन्होंने मेरे विकास को रोकने की कोशिश की। उन्होंने मुझे और बाकियों को डराने की पूरी कोशिश की, लेकिन मैं निडरता से उनके सामने डटी रही। आज मैं उन्हें स्पष्ट रूप से बता देना चाहती हूँ कि मेरा स्वतंत्रता, न्याय और सच्चाई में अटूट विश्वास है। मुझे उनसे डर नहीं लगता। यह दुनिया मेरा घर है। मेरे पास गरिमा है, आज़ादी है! मैं समानता में विश्वास रखती हूँ और हम सभी उसी ईश्वर की संतान हैं।
मैं मलाला हूँ, लेकिन वह मलाला नहीं जो आप सोच रहे हैं। मैं पाकिस्तानी या मुस्लिम मलाला नहीं हूँ, हालांकि वह लाखों लोगों की तरह मेरी भी प्रेरणा है। मैं भारतीय हूँ! मैं भारत के मूल विचार में विश्वास करती हूँ। मैं भारत की युवा पीढ़ी हूँ: जेन जेड (Gen Z) और जेन अल्फा (Gen Alpha)। मैं न तो कायर हूँ और न ही हिंसक। मैं नफरत नहीं करती, लेकिन हां, मेरे दिल और दिमाग में एक ईमानदार गुस्सा ज़रूर उबल रहा है। बहुत कुछ घटित हो रहा है और मुझे दबाने की कोशिश की जा रही है।
आप मुझे जो चाहें कहें: ‘कॉकरोच’, ‘दिमागी नक्सल’, ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’, या कुछ और। मुझे कोई डर नहीं है। आपने भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, जातिवाद और क्रोनी कैपिटलिज्म से हमारे प्यारे देश को बर्बाद कर दिया है। आपने हमें बांटने, नीचा दिखाने और दानव साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मैं कहती हूँ कि ‘बस, अब बहुत हुआ’। आपका समय अब खत्म हो गया है! मैं संविधान के मूल्यों—न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व, और विविधता—में विश्वास करती हूँ। हम नहीं रुकेंगे! मेरे साथ खड़े लाखों लोगों के साथ, मुझे पूरा विश्वास है कि ‘हम होंगे कामयाब’! सत्यमेव जयते!
(इस कॉलम के लेखक फादर सेड्रिक प्रकाश एसजे एक मानवाधिकार, और शांति कार्यकर्ता, लेखक और प्रशिक्षक हैं। संपर्क ईमेल: cedricprakash@gmail.com)
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