भारतीय रसोई में स्वाद और सुगंध के लिए इस्तेमाल होने वाली चुटकी भर हींग अब जांच के घेरे में आ गई है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने दो प्रमुख मसाला कंपनियों, एवरेस्ट फूड प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड और लालजी गोधू एंड कंपनी (LG) के खिलाफ कड़े कदम उठाए हैं।
इन दोनों कंपनियों के कंपाउंडेड हींग उत्पादों को खाद्य सुरक्षा नियमों की अनदेखी के चलते प्रतिबंधित कर दिया गया है। नियामक संस्था ने बताया कि यह कार्रवाई खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के तहत की गई है। इस फैसले ने भारतीय बाजार में चल रही निरंतर खाद्य गुणवत्ता जांच को एक बार फिर से सुर्खियों में ला दिया है।

एवरेस्ट के उत्पादों में कंपाउंडेड हींग, येलो हींग पाउडर और ब्लैक हींग पाउडर के नमूने तय मानकों पर खरे नहीं उतरे। नियमों के अनुसार हींग में अल्कोहल-घुलनशील अर्क (alcohol-soluble extract) की न्यूनतम मात्रा 5 प्रतिशत होनी चाहिए। जांच के दौरान एवरेस्ट का एक नमूना तो पूरी तरह से विफल रहा, जिसमें यह मात्रा शून्य प्रतिशत पाई गई।
वहीं, कंपनी के येलो और ब्लैक हींग पाउडर के नमूनों में अल्कोहल-घुलनशील अर्क क्रमशः केवल 3.29 प्रतिशत और 4.4 प्रतिशत ही दर्ज किया गया। इससे पहले की गई अनुपालन समीक्षाओं में एवरेस्ट के अन्य उत्पादों जैसे चिकन मसाला, गरम मसाला और एग करी पाउडर में भी लेबल-घोषणा से जुड़ी कई खामियां पाई गई थीं।

यह जानना दिलचस्प है कि ये दोनों ही मशहूर मसाला कंपनियां मुंबई में स्थित हैं और इनका स्वामित्व गुजरातियों के पास है। लालजी गोधू (LG) का इतिहास बेहद पुराना है और यह कंपनी पिछले 134 वर्षों से देश में हींग बेच रही है। शुरुआत के करीब 80 सालों तक लोगों को हींग के सख्त टुकड़ों को घर पर खुद ही कूटना पड़ता था।
साल 1978 में LG ने बाजार में एक बड़ी क्रांति लाते हुए सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (CFTRI) के साथ साझेदारी की और भारत का पहला रेडी-टू-यूज़ पाउडर हींग पेश किया। दूसरी तरफ, एवरेस्ट मसाला की स्थापना साल 1992 में हुई थी और वर्तमान में इसका नेतृत्व संजीव वाडीलाल शाह कर रहे हैं।
बाजार में बिकने वाली मिलावटी या गलत तरीके से तैयार की गई हींग का सीधा असर आपके स्वास्थ्य पर पड़ता है। असली हींग जहां पाचन को बेहतर बनाती है, वहीं नकली या गुणवत्ताहीन हींग से पेट दर्द, गैस, अपच और ब्लोटिंग जैसी समस्याएं और ज्यादा बढ़ सकती हैं।
अक्सर लागत कम करने के लिए इसमें गेहूं या चावल का आटा, कृत्रिम रंग और अन्य हानिकारक चीजें मिला दी जाती हैं। गेहूं के आटे की मिलावट से सीलिएक रोग या ग्लूटेन सेंसिटिविटी वाले लोगों को गंभीर शारीरिक नुकसान उठाना पड़ सकता है, जबकि मिलावटी रंग और रसायनों के कारण पेट की अंदरूनी परत को भी नुकसान पहुंच सकता है।
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