गुजरात एक ऐसा राज्य है जो खुद को गर्व से ‘वाइब्रेंट’ और निवेश के बड़े केंद्र के रूप में पेश करता है। लेकिन आर्थिक विकास, निवेश और जीडीपी के बड़े-बड़े आंकड़े हर परिवार के लिए वित्तीय सुरक्षा की गारंटी नहीं बन पाते। अमरेली जिले की एक दिल दहला देने वाली घटना ने इसी कड़वे विरोधाभास को बेहद क्रूर तरीके से उजागर कर दिया है।
आर्थिक तंगी और निराशा से हारकर एक 40 वर्षीय व्यक्ति ने अपनी पांच साल की मासूम बेटी की जान ले ली। उसने बच्ची का शव फ्रिज के अंदर रखा और फिर खुद फांसी लगा ली। पुलिस के मुताबिक, यह खौफनाक घटना एक ऐसे कमरे में घटी जिसे गुब्बारों और मोमबत्तियों से सजाया गया था।
मृतक की पहचान निर्माण स्थल के सुपरवाइजर किशोर धानक के रूप में हुई है। बुधवार के दिन वह अपनी बेटी हिमांशी के साथ घर पर अकेला था। आरोप है कि उसने अपने हाथ से बच्ची का मुंह दबाकर उसकी जान ले ली। राजुला की पुलिस उपाधीक्षक नयना गोरडिया ने बताया कि इसके बाद उसने शव को फ्रिज में रख दिया और खुद फंदे से झूल गया।
पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर के अनुसार, धानक ने तीन सुसाइड नोट लिखे थे जिन्हें उसने बिस्तर पर छोड़ दिया था। एक नोट में उसने अपनी बेटी की हत्या की बात कबूलते हुए माफी मांगी। उसने लिखा कि वह नहीं चाहता था कि उसके मरने के बाद बच्ची को किसी तरह की तकलीफ सहनी पड़े, इसलिए उसने शव को फ्रिज में सुरक्षित रख दिया था।
धानक की पत्नी मंजुबेन ने एफआईआर में बताया कि उनके पति ने पर्सनल लोन लेकर निर्माण कार्य में पैसा लगाया था। उन्हें अपने कारोबारी सहयोगियों से 7.25 लाख रुपये लेने थे, लेकिन किसी ने उन्हें पैसे नहीं दिए। सुसाइड नोट के मुताबिक, उसके पास पैसे नहीं बचे थे और कोई समाधान न दिखने पर उसने बेटी के साथ जान देने का खौफनाक कदम उठाया।
यह वारदात तब सामने आई जब 14 सितंबर को अपने मायके गई मंजुबेन ने धानक को फोन किया। कई बार फोन करने पर भी जब कोई जवाब नहीं मिला, तो बुधवार शाम को उसने अपने भाई को घर भेजा। दरवाजा न खुलने पर जब घर का ताला तोड़ा गया, तो धानक पंखे से लटकता मिला।
पुलिस इंस्पेक्टर पी. एल. चौधरी ने बताया कि कमरे का नजारा बेहद अजीब और विचलित करने वाला था। धानक ने कमरे को गुब्बारों और मोमबत्तियों से सजाया था। उसने अपनी बेटी को सफेद कपड़े पहनाए थे, उसके सिर पर दुपट्टा रखा था और फ्रिज के अंदर कुशन भी लगाए थे। इतना ही नहीं, बच्ची के होठों पर तुलसी के पत्ते भी रखे गए थे।
ऐसा लग रहा था मानो वह अपनी बेटी का आखिरी जन्मदिन मनाना चाहता हो। कमरे में मूर्तियों के साथ बाकायदा पूजा भी की गई थी और फ्रिज व कमरे में चॉकलेट रखी गई थी। हालांकि बच्ची का जन्मदिन नहीं था, फिर भी फ्रिज पर “हैप्पी बर्थडे हिमांशी” लिखा एक कागज चिपकाया गया था। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1) (हत्या) के तहत मामला दर्ज कर आगे की जांच शुरू कर दी है।
यह पूरी घटना राज्य के विकास मॉडल पर एक गंभीर विमर्श की मांग करती है। सरकारी दस्तावेज वाइब्रेंट गुजरात को निवेश बढ़ाने वाली सबसे बड़ी पहल बताते हैं, लेकिन विकास का असली पैमाना यह नहीं है कि कितने एमओयू साइन हुए या मंच कितना भव्य है। असली परीक्षा यह है कि क्या अमरेली के एक कंस्ट्रक्शन सुपरवाइजर के पास इतने संसाधन, कर्ज तक पहुंच और सामाजिक सुरक्षा मौजूद थी कि वह एक सामान्य वित्तीय संकट से उबर सके।
गुजरात एक बड़ा औद्योगिक पावरहाउस होने के साथ-साथ ऐसे कमजोर परिवारों का भी घर हो सकता है, ये दोनों बातें एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। पुलिस के अनुसार इस त्रासदी का तात्कालिक कारण 7.25 लाख रुपये न मिलना था।
यह दुखद घटना हमें एक बेहद मुश्किल सवाल पूछने पर मजबूर करती है कि अगर विकास की कहानी सचमुच इतनी मजबूत है, तो एक आम कामकाजी परिवार के लिए महज एक आर्थिक झटका इतनी गहरी और जानलेवा निराशा का कारण कैसे बन सकता है।
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