गणेशोत्सव केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि पीढ़ियों के ज्ञान, स्मृतियों और सांस्कृतिक मूल्यों का एक विशाल संग्रह है। इस ऐतिहासिक और मौखिक विरासत को सहेजने के लिए ‘विमएलडीएस पुणे’ ने ‘पीकेसी’ के सहयोग से एक अनूठी सिटिजन-साइंस और सांस्कृतिक शोध पहल शुरू की है।
“गणेशोत्सव कल्चरल कैप्चर चैलेंज 2026” नामक इस वैश्विक आयोजन की शुरुआत 17 सितंबर से हो चुकी है और यह 30 सितंबर 2026 तक चलेगा।
पुणे की निवासी और फर्ग्युसन कॉलेज से शिक्षा प्राप्त कर चुकीं सुचेता ढेरे द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, यह चुनौती दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाले व्यक्ति के लिए खुली है। इसका मुख्य उद्देश्य उन स्थानीय परंपराओं, शंखनाद की कला, गौरी-गणपति के विभिन्न रूपों और पारिवारिक रीति-रिवाजों को सहेजना है जो अब तक केवल मौखिक इतिहास या सीमित समुदायों तक ही सिमटे हुए हैं।
आयोजकों का प्रयास उन बदलावों और लुप्त हो रहे ज्ञान को दर्ज करना है, जिनका पालन लोग आज भी बिना मूल अर्थ जाने कर रहे हैं।
इस अभियान का सबसे दिलचस्प पहलू ‘कॉन्टेक्स्टाथॉन’ (Contextathon) है, जहां नागरिकों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की सांस्कृतिक समझ को चुनौती देने का अनूठा मौका मिल रहा है। प्रतिभागी एआई से गणपति, अनुष्ठानों, स्थानीय वाद्ययंत्रों, कहानियों या विसर्जन प्रक्रियाओं के बारे में सवाल कर सकते हैं। यदि एआई का जवाब अधूरा, गलत या सांस्कृतिक संदर्भ से कटा हुआ होता है, तो लोग अपने प्रामाणिक ज्ञान के आधार पर उसमें सुधार कर सकते हैं।
आयोजन में समाज के हर वर्ग को जोड़ने के लिए विशेष रूपरेखा तैयार की गई है। ‘स्मृतिरंग – सीनियर सिटीजन मेमोरीथॉन’ के तहत वरिष्ठ नागरिकों को अपने पुराने अनुभवों, आवाजों और विलुप्त हो चुकी परंपराओं को किसी भी भाषा या माध्यम (ऑडियो, वीडियो, तस्वीरें) के जरिए साझा करने के लिए आमंत्रित किया गया है।
वहीं, ‘यंग कल्चरल एक्सप्लोरर’ पहल के माध्यम से छात्रों को अपने बुजुर्गों, पुजारियों और कारीगरों का साक्षात्कार लेकर उस अनकहे ज्ञान को खोजने के लिए प्रेरित किया जा रहा है जिससे नई पीढ़ी अब तक पूरी तरह अनजान थी।
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