पीटर राइट, ग्लोबल हॉस्पिटैलिटी ग्रुप के संस्थापक हैं। उनके लिए एशियन गेम्स में खाना परोसना सिर्फ एक प्लेट सजाने जैसा नहीं है। यह एक छोटे अंतरराष्ट्रीय फूड सिस्टम को चलाने जैसा है। राइट कहते हैं कि कोरियाई शेफ को कोरियाई सोया सॉस चाहिए, जापानी को जापानी और चीनी शेफ को चीनी सोया सॉस ही चाहिए।
हर दिन यहां 60 हजार केले, एक टन चावल और दो टन चिकन की खपत होती है। साथ ही 35 हजार ब्रेड के टुकड़े और 30 किलो बादाम भी इस्तेमाल होते हैं। कुल मिलाकर हर दिन 450 अलग-अलग मेनू आइटम तैयार किए जाते हैं।
यह काम सुबह होने से पहले शुरू हो जाता है। अलग-अलग महाद्वीपों से आए एथलीटों के लिए यह रसोई रात 1 बजे तक चलती रहती है। राइट बताते हैं कि शुरुआत में यह काम धीमी गति का पागलपन लगता है, लेकिन अंत तक यह पूरी तरह से एक क्रेजी माहौल में बदल जाता है।
आइची-नागोया एशियन गेम्स में राइट की टीम के पास 25 देशों के 80 शेफ हैं। इस पूरे ऑपरेशन में करीब 200 कर्मचारी शामिल हैं। मेनू दिन में चार बार बदलता है। ब्रेकफास्ट, लंच, डिनर और सपर की व्यवस्था होती है और पहली सर्विंग सुबह 5 बजे ही शुरू हो जाती है।
इस विशाल आयोजन के पीछे की फिलॉसफी बहुत सरल है। मकसद 17 साल के किसी युवा एथलीट को घर जैसा महसूस कराना है। राइट कहते हैं कि जब कोई युवा एथलीट विदेश आता है, तो वह अपनी मां के हाथ का या अपनी कम्युनिटी का खाना ढूंढता है। वह कुछ ऐसा खोजना चाहता है जिससे वह पूरी तरह परिचित हो।
इसका मतलब यह नहीं है कि जापान में होने के कारण डाइनिंग हॉल में सिर्फ सुशी और साशिमी ही मिलेगी। यहां चाइनीज, कोरियन, थाई, मलेशियन, मिडिल ईस्टर्न और भारतीय व्यंजन भी मौजूद हैं। भारतीय खाने में रोगन जोश, दाल, करी, चटनी, नान और बिरयानी शामिल हैं। एशियन गेम्स की विशालता का मतलब है कि यहां अलग-अलग धार्मिक भावनाओं का भी पूरा ध्यान रखना पड़ता है।
सोया सॉस का मामला भी उतना आसान नहीं है जितना लगता है। राइट के पास हॉस्पिटैलिटी में 40 साल से ज्यादा का अनुभव है। वह सिडनी, बीजिंग और रियो ओलंपिक के अलावा वैंकूवर विंटर ओलंपिक और दो राष्ट्रमंडल खेलों में काम कर चुके हैं। उनका कहना है कि आप एक ही सोया सॉस रखकर सबको उसे इस्तेमाल करने के लिए नहीं कह सकते, वरना शेफ आपस में लड़ पड़ेंगे।
बिरयानी के साथ भी कुछ ऐसा ही है। यह बात राइट ने 1992 में सीखी थी। तब मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड में वर्ल्ड कप के फाइनल में पाकिस्तान का मुकाबला इंग्लैंड से था। पाकिस्तान टीम के मैनेजर ने मैच के दिन खाने में बिरयानी मांगी थी। राइट ने तब पूरे आत्मविश्वास से हां कह दिया था, जबकि उन्होंने जिंदगी में कभी बिरयानी का नाम नहीं सुना था।
उस समय इंटरनेट नहीं था, इसलिए राइट ने अपने किचन स्टाफ के एक भारतीय सदस्य से मदद ली। उस कर्मचारी की मां ने एमसीजी आकर शेफ्स को बिरयानी बनाना सिखाया। फिर वही बिरयानी पाकिस्तान टीम को परोसी गई।
बाद में जब राइट ने मैनेजर से खाने के बारे में पूछा, तो जवाब मिला कि स्वाद ठीक था। लेकिन मैनेजर ने कहा कि वह पाकिस्तानी नहीं, बल्कि ‘इंडियन बिरयानी’ थी। राइट ने बहस करते हुए कहा कि दोनों एक ही बात है। मैनेजर ने साफ किया कि यह बिल्कुल एक जैसा नहीं है। राइट कहते हैं कि इस घटना ने उन्हें ‘ऑथेंटिसिटी’ या प्रामाणिकता का एक बहुत बड़ा सबक सिखाया।
आज प्रामाणिकता के साथ-साथ ‘नियंत्रण’ भी उनके लिए उतना ही अहम है। एथलीट हर मील पीरियड में लगभग 110 से 120 आइटम्स में से चुन सकते हैं। खाने को पहले से मिलाने के बजाय अलग-अलग सामग्री के रूप में रखा जाता है। उदाहरण के लिए, सलाद बार में टमाटर, मक्का, मिर्च, गाजर, ककड़ी और किमची जैसे 40 या 50 घटक होते हैं, ताकि एथलीट अपनी प्लेट खुद तैयार कर सकें।
कैलोरी गिनने वालों के लिए हर एक चीज मायने रखती है। ग्रिल्ड चिकन बिना सॉस के मिल सकता है और चावल को सटीकता से बांटा जा सकता है। बादाम और सूरजमुखी के बीज जैसे नट्स पोषक तत्वों का एक और बेहतरीन स्रोत प्रदान करते हैं। राइट कहते हैं कि एक एलीट एथलीट को पता होता है कि उसे क्या खाना है, वे मैक्रोन्यूट्रिएंट्स और एलर्जी पैदा करने वाली चीजों का पूरा ध्यान रखते हैं।
हालांकि कुछ लोग डाइनिंग हॉल में अलग रणनीति के साथ आते हैं। राइट ने देखा है कि नए आए एथलीट अपने कैमरे निकालते हैं, बफे का वीडियो बनाते हैं और प्लेट को ऐसे भरते हैं जैसे उन्होंने पहले कभी खाना न देखा हो। लेकिन एक-दो दिन बाद वे फिर से एथलीट मोड में आ जाते हैं और सादे भोजन पर लौट आते हैं।
यहां खाना शायद सादा हो, लेकिन इसकी मात्रा बहुत बड़ी है। चिकन प्रोटीन का सबसे बड़ा स्रोत है, जिसकी खपत हर दिन करीब दो टन है। बीफ और मछली भी 800-800 किलो इस्तेमाल होती है। एक व्यस्त दिन में चावल की खपत एक टन तक पहुंच जाती है।
सभी वेन्यू को मिलाकर हर दिन करीब 60 हजार केले खाए जाते हैं। ब्रेड, रोल्स, फ्लैटब्रेड, नान और टॉर्टिला के रूप में 35 हजार टुकड़े रोज खपते हैं। फल यहां सबसे बड़ी श्रेणियों में से एक हैं। हर एक एथलीट दिन भर में सात या आठ फल खाता है।
इन आंकड़ों के पीछे की सोर्सिंग पूरी तरह से एक अलग ऑपरेशन है। सप्लायर्स के पास सर्टिफिकेशन होना जरूरी है। मुख्य उत्पादों के लिए बैकअप सोर्स होते हैं और खरीदारी कई दिन पहले की जाती है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि एथलीटों तक पहुंचने से पहले भोजन की गुणवत्ता की सख्ती से जांच की जा सके।
राइट कहते हैं कि बिना उचित सर्टिफिकेशन वाले सप्लायर का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, क्योंकि खेल गांव में फूड पॉइजनिंग एक भयानक सपना होगा। मेनू के साथ-साथ सप्लाई चेन में भी स्थानीय स्वाद नजर आता है।
राइट के शेफ्स ने नागोया के मिसो उत्पादकों और ग्रामीण रेस्तरां का दौरा किया था। उन्होंने स्थानीय रसोइयों से चावल, जड़ी-बूटियों, अदरक और लहसुन के बारे में चर्चा की, ताकि इन चीजों को गेम्स के किचन तक लाया जा सके। जापानी चावल पहले से धुला हुआ खरीदा जाता है। यह एक छोटी सी बात है, लेकिन जब आप लगभग एक टन चावल पका रहे हों, तो यह बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है।
कई बार ऐसी बारीक बातें रसोई के लिए बड़ी अहम होती हैं जो बाहर वालों को नजर नहीं आतीं। एक बार टीम को पता चला कि पेस्ट्री ब्रश रैकून के बालों से बने थे। रैकून के बाल मुलायम होते हैं, लेकिन वे मांसाहारी जानवर हैं, जो हलाल की श्रेणी में नहीं आते।
राइट बताते हैं कि अगर आप उस ब्रश से पाई पर काम करेंगे, तो वह डिश हलाल नहीं रहेगी। इसलिए, टीम को वे सभी ब्रश तुरंत फेंकने पड़े और उनकी जगह सिंथेटिक पेस्ट्री ब्रश खरीदने पड़े।
इस पूरी सटीकता और मेहनत के बावजूद एक समस्या हमेशा बनी रहती है। कोई भी एथलीट हफ्ते में 21 बार एक ही चीज नहीं खाना चाहता। इसलिए, किचन में ‘सरप्राइज एंड डिलाइट’ का कॉन्सेप्ट पेश किया जाता है। इसके तहत लाइव बर्गर स्टेशन, शावरमा, ग्रिल्ड झींगे, पास्ता या आइसक्रीम परोसी जाती है।
जब प्रतियोगिता खत्म हो जाती है, तो नियम फिर से बदल जाते हैं। इन खेलों के लिए सालों तक कड़ी ट्रेनिंग करने वाले एथलीट अक्सर उन चीजों पर टूट पड़ते हैं जिनसे वे सालों तक बचते रहे। राइट हंसते हुए कहते हैं कि प्रतियोगिता खत्म होने के बाद एथलीट बस केक, चीज और बहुत सारा खाना खाते हैं, जो असल में ओलंपिक डाइट का हिस्सा बिल्कुल नहीं है।
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