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चुनाव आयोग के भीतर मचे घमासान ने उठाए गंभीर सवाल: क्या खतरे में है चुनावी प्रक्रिया की साख?

| Updated: September 23, 2026 12:39

नए मतदाताओं के पंजीकरण और IT सिस्टम के केंद्रीकरण को लेकर चुनाव आयोग में अभूतपूर्व मतभेद, दो आयुक्तों ने उठाए चुनावी पारदर्शिता पर बड़े सवाल।

चुनाव आयोग के भीतर असहमति या विवाद कोई नई बात नहीं है। लेकिन मौजूदा विवाद पहले के सभी मामलों से बिल्कुल अलग और बेहद चिंताजनक है। इस बार दो चुनाव आयुक्तों ने जिन आपत्तियों को आधिकारिक तौर पर दर्ज कराया है, वे सीधे तौर पर मतदान प्रक्रिया की मूल भावना से जुड़ी हैं। यह मामला नए मतदाताओं को जोड़ने, नाम हटाने और पूरी मतदाता सूची को सुरक्षित रखने वाले आईटी सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

अब स्थिति यह हो गई है कि कानूनी रूप से वोट देने का अधिकार होने के बावजूद मतदाता सिस्टम की तकनीकी बाधाओं का शिकार हो सकते हैं। एक स्थानीय निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ईआरओ) भी शायद आपके अधिकार की गारंटी न दे सके।

गोवा में बिल्कुल ऐसा ही एक मामला सामने आया। वहां 97 लोगों ने ईआरओ की सभी शर्तें पूरी कीं और अपने जरूरी दस्तावेज पेश किए। ईआरओ ने उन्हें योग्य भी माना, लेकिन दिल्ली स्थित चुनाव आयोग मुख्यालय से नियंत्रित होने वाले सॉफ्टवेयर ने स्थानीय अधिकारी के फैसले को सिस्टम में दर्ज ही नहीं होने दिया।

इसका सीधा मतलब यह है कि एक मतदाता योग्य हो सकता है, वह इसे साबित कर सकता है और कानून द्वारा नियुक्त अधिकारी उसे प्रमाणित भी कर सकता है। फिर भी, चुनाव के दिन उसका नाम सूची से गायब हो सकता है। इसकी वजह वह केंद्रीयकृत प्रणाली है जिसने जमीनी स्तर के अधिकारियों को प्रक्रिया से बाहर कर दिया है।

चुनाव आयुक्तों ने फॉर्म-6 में किए गए उस बदलाव पर भी कड़ी आपत्ति जताई है, जिसमें नए मतदाताओं से पूछा जाता है कि क्या उनके माता-पिता या दादा-दादी पिछली एसआईआर (SIR) सूची में शामिल हैं। अगर किसी विवादित एसआईआर में माता-पिता का नाम कट जाता है, तो उसका सीधा असर अब उनके बच्चे के भविष्य पर पड़ेगा।

हैरानी की बात यह है कि बिना सरकारी नियमों में कानूनी संशोधन किए एक ऐसे महत्वपूर्ण फॉर्म में बदलाव कर दिया गया, जो यह तय करता है कि नया मतदाता कौन होगा। यह कदम भविष्य के मतदाताओं पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है।

चुनाव आयोग की सबसे बड़ी ताकत हमेशा से इसका विकेंद्रीकरण रहा है। दशकों से, आयोग मतदाता सूची में धांधली के आरोपों को यह कहकर खारिज करता रहा है कि इस सूची पर किसी एक व्यक्ति या टीम का नियंत्रण नहीं है। हर निर्वाचन क्षेत्र में हजारों वैधानिक अधिकारी इसकी देखरेख करते हैं।

लेकिन दोनों चुनाव आयुक्तों की शिकायत है कि डिजिटल प्रणाली पर केंद्रीय नियंत्रण ने इस अहम सुरक्षा कवच को कमजोर कर दिया है। अब दिल्ली में बैठी एक टीम जमीनी स्तर के अधिकारियों के फैसलों को रोक सकती है, पलट सकती है या पूरी तरह रद्द कर सकती है।

चुनाव आयोग तीन सदस्यों वाला एक स्वतंत्र और संवैधानिक निकाय है। इसके कानून के अनुसार कामकाज और फैसले यथासंभव सर्वसम्मति से या फिर बहुमत से लिए जाने चाहिए। इसके बावजूद, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने बार-बार रिकॉर्ड पर यह बात रखी है कि आयोग के नाम पर लिए गए कई फैसलों के बारे में उनसे कोई सलाह-मशविरा नहीं किया गया और न ही उन्हें कोई पूर्व जानकारी दी गई।

आयोग के भीतर असहमति का इतिहास काफी पुराना है। जनवरी 2009 में, तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) एन गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर चुनाव आयुक्त नवीन चावला को पक्षपातपूर्ण आचरण के आरोप में हटाने की सिफारिश की थी। गोपालस्वामी को वाजपेयी सरकार ने नियुक्त किया था। हालांकि, तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने 1 मार्च 2009 को इस सिफारिश को खारिज कर दिया था। इसके बाद उसी साल अप्रैल में नवीन चावला ही नए सीईसी बने थे।

इसी तरह, मई 2019 में लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण से कुछ दिन पहले चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने तत्कालीन सीईसी सुनील अरोड़ा को एक कड़ा पत्र लिखा था। लवासा ने कहा था कि वह आदर्श आचार संहिता की शिकायतों पर होने वाली बैठकों में तब तक शामिल नहीं होंगे, जब तक कि अंतिम आदेशों में उनके अल्पमत वाले फैसलों को दर्ज नहीं किया जाता।

लवासा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को दिए गए क्लीन चिट के बहुमत वाले फैसले से असहमति जताई थी। उस समय अरोड़ा ने जवाब दिया था कि तीनों सदस्यों से एक दूसरे का ‘प्रतिरूप’ होने की उम्मीद नहीं की जाती है।

इसके बाद 21 मई 2019 को पूर्ण आयोग की बैठक हुई और 2-1 के बहुमत से यह तय किया गया कि असहमति को सिर्फ फाइल में दर्ज किया जाएगा, लेकिन आदेशों में इसे नहीं लिखा जाएगा। अगले साल अपना सीईसी बनने का नंबर आने से पहले ही लवासा ने एशियाई विकास बैंक जाने के लिए चुनाव आयोग से इस्तीफा दे दिया था। दिलचस्प बात यह है कि अरोड़ा और लवासा दोनों को एनडीए सरकार द्वारा ही नियुक्त किया गया था।

चावला और लवासा, दोनों ही मामलों में असहमति किसी एक व्यक्ति द्वारा उठाए गए विशिष्ट मुद्दे तक सीमित थी। लेकिन इस बार की स्थिति आयोग के इतिहास में अभूतपूर्व है।

इस बार दो आयुक्त, जो कि मिलकर आयोग में बहुमत बनाते हैं, किसी फैसले के खिलाफ असहमति नहीं जता रहे हैं। बल्कि वे लिखित में यह बता रहे हैं कि उनके पीठ पीछे फैसले लिए गए, आदेश जारी किए गए और मामले दर्ज किए गए, जबकि उन्हें अंधेरे में रखा गया। स्पष्ट रूप से, 2023 के अधिनियम के तहत आयोग को ‘यथासंभव सर्वसम्मति से’ काम करना चाहिए, लेकिन वर्तमान हालात गवाही दे रहे हैं कि ऐसा बिल्कुल नहीं हो रहा है।

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