भारत की अप्रैल-जून तिमाही में दर्ज की गई 7.8% की जीडीपी ग्रोथ रेट इन दिनों चर्चा और गहन छानबीन का विषय बनी हुई है। देश के पूर्व वित्त और आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने इस आंकड़े की सटीकता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका मानना है कि विकास दर को मापने के लिए इस्तेमाल किए गए सांख्यिकीय आधार (बेस) में बदलाव और पिछले साल के जीडीपी आंकड़ों में हुए भारी संशोधन के कारण इस 7.8% की वृद्धि दर का सही आकलन करना मुश्किल हो गया है।
एक मीडिया इंटरव्यू के दौरान गर्ग ने स्पष्ट किया कि पिछले वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही के वास्तविक जीडीपी आंकड़े मूल रूप से पुरानी सीरीज के तहत जारी किए गए थे। अब साल 2026-27 की पहली तिमाही की वृद्धि की गणना करने के लिए नई सीरीज के आंकड़ों को आधार बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि पहली नज़र में 7.8% की यह वृद्धि बहुत शानदार लगती है, लेकिन यह एक गंभीर मुद्दा है जिसकी गहराई से जांच होनी चाहिए।
पूर्व सचिव के अनुसार, आधार वर्ष में किए गए इस बदलाव की वजह से सीधे तौर पर पिछले साल से तुलना करना उचित नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया कि जीडीपी आंकड़ों का सटीक विश्लेषण वर्तमान कीमतों (करंट प्राइसेस) के आधार पर किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि नए आधार के साथ की जा रही तुलना पर पूरी तरह से आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता है।
गर्ग ने 2025-26 की पहली तिमाही के लिए वर्तमान कीमतों वाले जीडीपी आंकड़ों में हुए एक बड़े संशोधन की ओर भी ध्यान खींचा। सरकार के संशोधित डेटा के अनुसार, इस तिमाही के लिए नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ 10.3% बताई गई है। लेकिन गर्ग का तर्क है कि यदि पिछले साल जारी किए गए वर्तमान कीमतों वाले जीडीपी आंकड़ों को ही आधार माना जाए, तो यह नॉमिनल ग्रोथ 2.5% से भी कम बैठती है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह अंतर बहुत मायने रखता है। इस्तेमाल किए गए बेस (संशोधित डेटा या पिछले साल जारी किया गया डेटा) के आधार पर वर्तमान कीमतों की विकास दर में बहुत बड़ा बदलाव आ जाता है। इन दो बड़े बदलावों ने पूर्व वित्त सचिव के मन में यह संदेह पैदा कर दिया है कि क्या वास्तव में 7.8% की दर देश की आर्थिक गतिविधियों की वास्तविक तस्वीर पेश कर रही है।
एक अन्य बातचीत में गर्ग ने यह स्वीकार किया कि जब भी जीडीपी की कोई नई सीरीज पेश की जाती है, तो डेटा में कुछ बदलाव आना स्वाभाविक है। नई सीरीज में कई नए उत्पादों और कंपनियों को शामिल किया जाता है, जबकि पहले से मौजूद कुछ चीजों को हटाया भी जा सकता है। इससे उत्पादन मूल्य पर असर पड़ता है और इसमें कोई तकनीकी समस्या भी नहीं है।
हालांकि, उनकी असली चिंता इस संशोधन के भारी भरकम आकार और इसके पीछे किसी स्पष्टीकरण की कमी को लेकर है। उन्होंने बताया कि नई सीरीज को अपनाने के बाद 2023-24 की जीडीपी में लगभग 12 लाख करोड़ रुपये की भारी कमी दर्ज की गई है। गर्ग का कहना है कि अगर नई सीरीज से जीडीपी के आंकड़े इतने बड़े पैमाने पर नीचे आते हैं, तो सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वास्तव में क्या-क्या बदला गया है।
इसके अलावा, जीडीपी डेटा के विभिन्न हिस्सों में भी बड़े उलटफेर देखने को मिले हैं। पूर्व सचिव ने बताया कि कृषि और खनन क्षेत्रों के आंकड़ों में बढ़ोतरी दिखाई गई है, जबकि विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) सेक्टर में भारी गिरावट आई है। इसके साथ ही, निवेश व्यय और खपत के आंकड़ों में भी जबरदस्त बदलाव किए गए हैं। उनके अनुसार, देश में खपत (कंजम्पशन) के आंकड़ों को बहुत ही ज्यादा कम कर दिया गया है।
इन तमाम विसंगतियों को देखते हुए गर्ग का मानना है कि पुरानी और नई जीडीपी सीरीज के बीच हुए इन बदलावों की तह तक जाना बेहद जरूरी है। अप्रैल-जून तिमाही की 7.8% जीडीपी वृद्धि दर, नई सीरीज के प्रभाव और पिछले साल के आंकड़ों में किए गए संशोधनों को लेकर अर्थशास्त्रियों के बीच अब एक व्यापक और गंभीर बहस छिड़ गई है।
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