गुजरात सरकार ने अपनी नई ‘थ्राइव’ (THRIVE) योजना के तहत एक बड़ा कदम उठाया है। इसके तहत अहमदाबाद नगर निगम सीमा के भीतर चल रहे उद्योगों को शहर से बाहर स्थानांतरित करने का निर्णय लिया गया है। इस रिलोकेशन प्लान के लिए सरकार ने कुल 1,700 एकड़ जमीन आरक्षित कर ली है।
इस योजना से जुड़े अधिकारियों ने बताया कि नए औद्योगिक क्लस्टर स्थापित करने के लिए दो जिलों का चयन किया गया है। इसमें से करीब 1,100 एकड़ जमीन सुरेंद्रनगर जिले में और लगभग 600 एकड़ जमीन खेड़ा जिले में आरक्षित की गई है।
‘थ्राइव’ यानी ‘ट्रांजिशन फॉर हार्मोनाइज्ड रिलोकेशन एंड इंक्लूसिव वाइब्रेंट इकोनॉमी’ मुख्य रूप से एक प्रोत्साहन-आधारित रिलोकेशन नीति है। इसका मुख्य उद्देश्य शहरों की भीड़भाड़ को कम करना और पर्यावरण की स्थिति में व्यापक सुधार लाना है।
एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के अनुसार, अहमदाबाद में जीआईडीसी (GIDC) एस्टेट में मौजूद उद्योगों को इस ट्रांसफर प्रक्रिया में प्राथमिकता दी जाएगी। हालांकि, शहर की सीमा के भीतर निजी जमीन पर चल रही औद्योगिक इकाइयों को भी नए क्लस्टर में जमीन आवंटन के लिए योग्य माना जाएगा।
सरकार वर्तमान जीआईडीसी एस्टेट में प्लॉट के रूपांतरण और हस्तांतरण प्रक्रिया को सरल बनाने पर भी विचार कर रही है। अधिकारियों का कहना है कि उद्योगों के लिए फ्रीहोल्ड भूमि की प्रक्रिया को आसान बनाया जा रहा है ताकि उनके मौजूदा भूखंडों से निकलने में कोई प्रक्रियात्मक अड़चन न आए।
यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि गुजरात उच्च न्यायालय ने कई बार औद्योगिक इकाइयों को शहर की सीमा से बाहर ले जाने की वकालत की है। इसके अलावा, अहमदाबाद में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स-2030 और संभावित ओलंपिक-2036 की मेजबानी से पहले शहरी पर्यावरण को स्वच्छ बनाने के लिए इस अभियान को तेज किया गया है।
थ्राइव नीति में उद्योगों को ट्रांसफर के दौरान होने वाले शुरुआती आर्थिक झटके को कम करने के लिए कई तरह के प्रोत्साहन शामिल हैं। इनमें प्रमुख रूप से छह महीने तक प्रति कर्मचारी 5,000 रुपये प्रति माह की वेतन सहायता सब्सिडी दी जाएगी। साथ ही, इंडस्ट्रियल पार्क और पर्यावरण बुनियादी ढांचा सुविधाएं स्थापित करने के लिए कैपिटल सब्सिडी का भी प्रावधान किया गया है।
हालांकि, उद्योग समूहों ने रिलोकेशन की व्यवहार्यता और लागत, विशेषकर स्थानीय मजदूरों और सप्लाई चेन पर निर्भर इकाइयों को लेकर चिंता जताई है। गुजरात चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (GCCI) की जीआईडीसी समिति के अध्यक्ष अजय पटेल का कहना है कि औद्योगिक इकाइयों को शहर से बाहर ले जाना काफी मुश्किल भरा हो सकता है और इसके अपेक्षित परिणाम नहीं भी मिल सकते हैं।
अजय पटेल ने कहा कि सरकार को उद्योगों को शहर के भीतर ही काम करने की अनुमति देनी चाहिए, क्योंकि पूरी वर्कफोर्स को दूसरी जगह ले जाना बेहद कठिन प्रक्रिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कई केमिकल फैक्ट्रियों ने पिछले कुछ वर्षों में शहर के भीतर ही अपने पर्यावरण अनुपालन मानकों में काफी सुधार किया है और नए स्थानों पर यह बेंचमार्क हासिल करने में लंबा समय लगेगा।
पटेल ने यह भी चेतावनी दी कि अगर रिलोकेशन को जबरन लागू किया गया, तो शायद केवल 10% यूनिट्स ही वास्तव में नए स्थान पर जाएंगी। उन्होंने अंदेशा जताया कि बाकी कंपनियां या तो बंद हो जाएंगी या फिर अपना व्यवसाय बदल लेंगी।
वहीं, एक टेक्सटाइल प्रोसेसिंग एसोसिएशन के सदस्य ने कहा कि आर्थिक शर्तें और बुनियादी ढांचे की तैयारी ही यह तय करेगी कि कंपनियां शिफ्ट होंगी या नहीं। उन्होंने मांग की है कि रिलोकेशन के लिए बहुत ही किफायती दरों पर जमीन दी जानी चाहिए।
टेक्सटाइल एसोसिएशन के सदस्य ने इस बात पर जोर दिया कि सरकार को सामान्य बुनियादी ढांचा विकसित करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि पुरानी फैक्ट्रियों में उत्पादन रोकने से पहले उद्योगों को नई जगह पर अपना उत्पादन शुरू करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए।
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